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सरस्वती प्रेस की सासें थमीं तो एक निशानी और अतीत
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sun, 31 Jul 2016 02:28 AM IST
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मुंशी प्रेमचंद्र
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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जयंती पर एक बार फिर उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद याद किए जाएंगे लेकिन सच तो यह है कि साहित्य के शहर इलाहाबाद और भरेपूरे परिवार के बीच उनकी विरासत को सहेजने की सुध किसी को नहीं है। उनके नाम पर शहर में न कोई संस्थान, स्मारक है और न ही कोई मूर्ति, सड़क या चौराहा। प्रेमचंद की स्मृतियों को सहेजने के लिए साहित्य से जुड़े संस्थानों, संस्थाओं की ओर से ऐसी कोई पहल याद नहीं आती और कभी की भी गई हो तो उस पर अमल नहीं हुआ। कुल मिलाकर जीवन का ‘मंत्र’ बताने वाले प्रेमचंद की विरासत को सहेजने का सलीका हमें नहीं आया।
बीते दिनों सिविल लाइंस के सुभाष चौराहे के कोने पर घोष बिल्डिंग में बसे सरस्वती प्रेस की सांसें थमीं तो प्रेमचंद की एक निशानी और अतीत हो गई। कभी कथाकारों, रचनाकारों का अड्डा रहे सरस्वती प्रेस से जाने कितनी कहानियां जुड़ी हैं। अब यह इतिहास के पन्नों में सिमट गया। सरस्वती प्रेस की जिम्मेदारी संभाल रहे प्रेमचंद के पौत्र अतुल राय का स्वास्थ्य बिगड़ा तो सरस्वती प्रेस की सेहत भी खराब होती गई। छत से उखड़ी प्लास्टर के नीचे अलमारियों पर धूल फांक रही किताबों का दम घुटने लगा था। इसकी देखभाल कर रहे चंद्रपाल मिश्र पहले ही नहीं रहे। लिहाजा सरस्वती प्रेस का किराए का भवन भी वापस कर दिया गया और वहां ताला जड़ गया। दिल्ली, जयपुर, पटना, लखनऊ आदि जगहों पर सरस्वती प्रेस की शाखाएं पहले ही बंद हो चुकी थीं।
इस बारे में कथालेखिका सारा राय कुछ नहीं बोलीं लेकिन उनके पति प्रो. मोहम्मद असलम ने भी अनभिज्ञता जताई। बोले, इस मामले में अतुल जी से कभी कोई बात नहीं हुई, सो यह बताना मुमकिन नहीं कि सरस्वती प्रेस की किताबें और अन्य धरोहर का क्या हुआ। हो सकता है उन्होंने इसे किसी को दे दिया हो। वहीं प्रेमचंद के पौत्र प्रो. आलोक राय ने कहा, हंस पत्रिका पहले ही राजेंद्र यादव जी को सौंप दी गई थी, हालांकि हंस प्रकाशन मेरे पास है और इससे किताबों का प्रकाशन जारी है।
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प्रेमचंद साहित्य पर कॉपीराइट खत्म होने के बाद से ही सरस्वती प्रेस की सेहत बिगड़ने लगी थी। कॉपीराइट और रायल्टी देने का झंझट खत्म हुआ तो तमाम प्रकाशक प्रेमचंद की किताबें छापने लगे। कापीराइट खत्म होने से पहले प्रेमचंद साहित्य के बंटवारे में सरस्वती प्रेस के पास गोदान बचा था जबकि हंस प्रकाशन के पास गबन चला गया था। बाकी निर्मला, सेवासदन, मानसरोवर आदि के प्रकाशन का अधिकार दोनों के पास रहा लेकिन कॉपीराइट खत्म हुआ तो मूल प्रकाशक का तमगा बेमानी हो गया था।
प्रलेस, जलेस और जसम की ओर से महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विवि के विस्तार केंद्र में दोपहर दो बजे प्रेमचंद जयंती समारोह के तहत सोजे वतन पर संगोष्ठी होगी। प्रस्तावना प्रणय कृष्ण की रहेगी जबकि आशुतोष पार्थेश्वर, शकील सिद्दीकी और प्रो.एए फातमी वक्ता होंगे। इसी क्रम में साहित्य भंडार की ओर से प्रकाशित शकील सिद्दीकी की दो पुस्तकों ‘रशीद जहां की संपूर्ण कहानियां’ और ‘औरत-कांटेवाला तथा अन्य नाटक’ का लोकार्पण वरिष्ठ कथाकार दूधनाथ सिंह, प्रो.राजेंद्र कुमार तथा आलोक राय करेंगे जबकि प्रो. संतोष भदौरिया पुस्तक का परिचय देंगे।
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बीते दिनों सिविल लाइंस के सुभाष चौराहे के कोने पर घोष बिल्डिंग में बसे सरस्वती प्रेस की सांसें थमीं तो प्रेमचंद की एक निशानी और अतीत हो गई। कभी कथाकारों, रचनाकारों का अड्डा रहे सरस्वती प्रेस से जाने कितनी कहानियां जुड़ी हैं। अब यह इतिहास के पन्नों में सिमट गया। सरस्वती प्रेस की जिम्मेदारी संभाल रहे प्रेमचंद के पौत्र अतुल राय का स्वास्थ्य बिगड़ा तो सरस्वती प्रेस की सेहत भी खराब होती गई। छत से उखड़ी प्लास्टर के नीचे अलमारियों पर धूल फांक रही किताबों का दम घुटने लगा था। इसकी देखभाल कर रहे चंद्रपाल मिश्र पहले ही नहीं रहे। लिहाजा सरस्वती प्रेस का किराए का भवन भी वापस कर दिया गया और वहां ताला जड़ गया। दिल्ली, जयपुर, पटना, लखनऊ आदि जगहों पर सरस्वती प्रेस की शाखाएं पहले ही बंद हो चुकी थीं।
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इस बारे में कथालेखिका सारा राय कुछ नहीं बोलीं लेकिन उनके पति प्रो. मोहम्मद असलम ने भी अनभिज्ञता जताई। बोले, इस मामले में अतुल जी से कभी कोई बात नहीं हुई, सो यह बताना मुमकिन नहीं कि सरस्वती प्रेस की किताबें और अन्य धरोहर का क्या हुआ। हो सकता है उन्होंने इसे किसी को दे दिया हो। वहीं प्रेमचंद के पौत्र प्रो. आलोक राय ने कहा, हंस पत्रिका पहले ही राजेंद्र यादव जी को सौंप दी गई थी, हालांकि हंस प्रकाशन मेरे पास है और इससे किताबों का प्रकाशन जारी है।
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प्रेमचंद साहित्य पर कॉपीराइट खत्म होने के बाद से ही सरस्वती प्रेस की सेहत बिगड़ने लगी थी। कॉपीराइट और रायल्टी देने का झंझट खत्म हुआ तो तमाम प्रकाशक प्रेमचंद की किताबें छापने लगे। कापीराइट खत्म होने से पहले प्रेमचंद साहित्य के बंटवारे में सरस्वती प्रेस के पास गोदान बचा था जबकि हंस प्रकाशन के पास गबन चला गया था। बाकी निर्मला, सेवासदन, मानसरोवर आदि के प्रकाशन का अधिकार दोनों के पास रहा लेकिन कॉपीराइट खत्म हुआ तो मूल प्रकाशक का तमगा बेमानी हो गया था।
प्रलेस, जलेस और जसम की ओर से महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विवि के विस्तार केंद्र में दोपहर दो बजे प्रेमचंद जयंती समारोह के तहत सोजे वतन पर संगोष्ठी होगी। प्रस्तावना प्रणय कृष्ण की रहेगी जबकि आशुतोष पार्थेश्वर, शकील सिद्दीकी और प्रो.एए फातमी वक्ता होंगे। इसी क्रम में साहित्य भंडार की ओर से प्रकाशित शकील सिद्दीकी की दो पुस्तकों ‘रशीद जहां की संपूर्ण कहानियां’ और ‘औरत-कांटेवाला तथा अन्य नाटक’ का लोकार्पण वरिष्ठ कथाकार दूधनाथ सिंह, प्रो.राजेंद्र कुमार तथा आलोक राय करेंगे जबकि प्रो. संतोष भदौरिया पुस्तक का परिचय देंगे।