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टाट पट्टी पर बैठ तारे तोड़ने के अरमान
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sun, 09 Oct 2016 02:33 AM IST
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allahabad
इलाहाबाद। प्राथमिक विद्यालयों की बदहाली और मूलभूत सुविधाओं की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक जांच कमेटी बनाई है। यह कमेटी बहुत जल्द ही विद्यालयों की स्थिति की जांच के लिए जिले का दौरा करने वाली है। अमर उजाला की ओर से जिले के मेजा, करछना, मांडा के प्राथमिक विद्यालयों की जांच के बाद पता चला कि यहा बच्चे जमीन पर टाट-पट्टी बिछाकर बैठते हैं। शासन की ओर से बार-बार बेंच-डेस्क की व्यवस्था किए जाने की घोषणा के बाद भी स्कूलों में अभी बच्चे जमीन पर बैठने को मजबूर हैं। इन बच्चों के लिए बदलते दौर में कंप्यूटर शिक्षा की बात कौन करे, स्कूलों में बिजली का कनेक्शन तक नहीं है।
स्कूल खुलने के छह महीने बाद भी किताबें नहीं
अमर उजाला की ओर से स्कूलों में मूलभूत आवश्यकता से जुड़ी सुविधाओं की जांच के बाद पता चला कि बच्चों को शासन की ओर से उपलब्ध कराई जाने वाली किताबें नहीं पहुंची हैं। सीबीएसई और आईसीएसई के पैटर्न पर शैक्षिक सत्र अप्रैल से शुरू करने की घोषणा के बाद स्कूलों दशा बिगड़ गई है। स्कूल खुले छह महीने बीत जाने के बाद भी जिले के बड़ी संख्या में स्कूलों में बच्चों को किताबें नहीं मिल सकी हैं। ऐसे में बच्चों को मौलिक शिक्षा की बात करना बेमानी लगती है।
स्कूलों में बिजली कनेक्शन नहीं
मेजा विकास खंड के प्राथमिक विद्यालय ऊंचडीह, लेहड़ी, उरूवा, हुल्का सहित कई अन्य विद्यालयों में बच्चों को मिलने वाली मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। शौचालय हैं तो साफ-सफाई नहीं है, पीने के पानी के लिए हैडपंप लगा है परंतु साफ पानी नहीं आता। बिजली कनेक्शन नहीं है, जिस विद्यालय में कनेक्शन है, वहां सामान्य बल्ब के अतिरिक्त कुछ नहीं है। पंखे भी नहीं लगे हैं। कई स्कूलों में कनेक्शन न होने से कटिया लगाकर बिजली जलाई जा रही है।
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0 शौचालयों में पानी की व्यवस्था नहीं
करछना विकास खंड के प्राथमिक विद्यालयों की दशा जिले के दूसरे विद्यालयों से अलग नहीं है। विद्यालयों में शौचालय तो बने हैं परंतु साफ-सफाई की व्यवस्था नहीं है। शौचालय में पानी की व्यवस्था नहीं होने से वह गंदगी से पटे हैं। बच्चे बाहर शौच के लिए जाते हैं, कुछ विद्यालयों में प्रधानाध्यापक एवं अध्यापक शौचालय में अपने उपयोग के लिए ताला लगा रखे हैं।
0 बैठने के लिए घर से बोरी लेकर आते हैं बच्चे
मांडा विकास खंड के दिघिया, बरहा कला, बामपुर सहित कई अन्य प्राथमिक विद्यालयों की हालत बहुत खराब है। बिजली की व्यवस्था नहीं है, बच्चे जमीन पर बैठते हैं, कई विद्यालय ऐसे मिले जहां टाट-पट्टी की भी व्यवस्था नहीं है। ऐसे में बच्चे घर से बोरी लेकर आते हैं, वह स्कूल में घर से लाई गई बोरी पर बैठते हैं। पीने के पानी की व्यवस्था भी ठीक नहीं है। स्कूलों में मिड-डे मील की गुणवत्ता मानक के अनुरूप नहीं है।
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स्कूल खुलने के छह महीने बाद भी किताबें नहीं
अमर उजाला की ओर से स्कूलों में मूलभूत आवश्यकता से जुड़ी सुविधाओं की जांच के बाद पता चला कि बच्चों को शासन की ओर से उपलब्ध कराई जाने वाली किताबें नहीं पहुंची हैं। सीबीएसई और आईसीएसई के पैटर्न पर शैक्षिक सत्र अप्रैल से शुरू करने की घोषणा के बाद स्कूलों दशा बिगड़ गई है। स्कूल खुले छह महीने बीत जाने के बाद भी जिले के बड़ी संख्या में स्कूलों में बच्चों को किताबें नहीं मिल सकी हैं। ऐसे में बच्चों को मौलिक शिक्षा की बात करना बेमानी लगती है।
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स्कूलों में बिजली कनेक्शन नहीं
मेजा विकास खंड के प्राथमिक विद्यालय ऊंचडीह, लेहड़ी, उरूवा, हुल्का सहित कई अन्य विद्यालयों में बच्चों को मिलने वाली मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। शौचालय हैं तो साफ-सफाई नहीं है, पीने के पानी के लिए हैडपंप लगा है परंतु साफ पानी नहीं आता। बिजली कनेक्शन नहीं है, जिस विद्यालय में कनेक्शन है, वहां सामान्य बल्ब के अतिरिक्त कुछ नहीं है। पंखे भी नहीं लगे हैं। कई स्कूलों में कनेक्शन न होने से कटिया लगाकर बिजली जलाई जा रही है।
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0 शौचालयों में पानी की व्यवस्था नहीं
करछना विकास खंड के प्राथमिक विद्यालयों की दशा जिले के दूसरे विद्यालयों से अलग नहीं है। विद्यालयों में शौचालय तो बने हैं परंतु साफ-सफाई की व्यवस्था नहीं है। शौचालय में पानी की व्यवस्था नहीं होने से वह गंदगी से पटे हैं। बच्चे बाहर शौच के लिए जाते हैं, कुछ विद्यालयों में प्रधानाध्यापक एवं अध्यापक शौचालय में अपने उपयोग के लिए ताला लगा रखे हैं।
0 बैठने के लिए घर से बोरी लेकर आते हैं बच्चे
मांडा विकास खंड के दिघिया, बरहा कला, बामपुर सहित कई अन्य प्राथमिक विद्यालयों की हालत बहुत खराब है। बिजली की व्यवस्था नहीं है, बच्चे जमीन पर बैठते हैं, कई विद्यालय ऐसे मिले जहां टाट-पट्टी की भी व्यवस्था नहीं है। ऐसे में बच्चे घर से बोरी लेकर आते हैं, वह स्कूल में घर से लाई गई बोरी पर बैठते हैं। पीने के पानी की व्यवस्था भी ठीक नहीं है। स्कूलों में मिड-डे मील की गुणवत्ता मानक के अनुरूप नहीं है।