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Horticulture : इस्राइली तकनीक से उगा रहे गुलाब, हो रही लाखों की कमाई, दिल्ली, लखनऊ तक भेजे जा रहे फूल

Sun, 04 Jun 2023 05:15 PM IST
विनोद सिंह रजनीश यादव, प्रयागराज
रजनीश यादव, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 04 Jun 2023 05:15 PM IST
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Roses are grown in the plateau with Israeli technology, earning millions, flowers are being sent to Delhi, Lu
गुलाब के फूल की खेती। - फोटो : अमर उजाला।

मेजा विकास खंड के हरवारी लाखापुर गांव के जिज्ञासु मिश्रा तीन एकड़ खेत में इस्राइली तकनीक का प्रयोग कर पठारी क्षेत्र में गुलाब उगा रहे हैं। इसकी बदौलत वह हर साल लाखों की कमाई कर रहे हैं। बंजर पड़े पठार में आज गुलाब खिल रहे हैं। यह किसान जिज्ञासु मिश्रा की मेहनत व लगन का नतीजा है। खाड़ी देशों में तेल निकालने वाली कंपनी में कुछ समय पहले काम छोड़ जिज्ञासु मिश्रा घर लौटे और किसानी में लग गए।

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उन्होंने तीन एकड़ में तीन पॉलीहाउस का निर्माण कराकर फूलों की खेती शुरू की। इनके पॉलीहाउस में 40 से ज्यादा लोगों को रोजगार मिला है। जिज्ञासु बताते हैं कि गुलाब के फूल तैयार होने में 70-80 दिन लग जाते हैं। एक पॉलीहाउस को बनाने में 52 लाख रुपये तक की लागत आती है।
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हालांकि पठारी क्षेत्र होने से पानी का स्तर काफी नीचे है। सात सौ फिट गहरे बोर के बाद ही पानी मिल पाता है। मेजा के गुलाब आढ़तियों के माध्यम से लखनऊ व दिल्ली में बहुतायत मात्रा में भेेजे जा रहे हैं। इसके अलावा प्रयागराज व बनारस में यहां के गुलाब पहुंच रहे हैं। एक गुलाब की कीमत थोक में पांच रुपये तक होती है।

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गुलाब की खेती के लिए खेत तैयर करते जिज्ञासु। - फोटो : अमर उजाला।

जिज्ञासु बताते हैं कि वे हर साल इसमें लगभग 30 ट्राली जैविक खाद डालते हैं। गोबर व गोमूत्र का इस्तेमाल गुलाब की टाप सीक्रेट व डिवाइन प्रजाति की खेती हो रहा है। टाप सीक्रेट गुलाब का प्रयोग बुके में होता है। दस से 12 रंग के गुलाब होते हैं लेकिन बाजार में लाल गुलाब की मांग अधिक है।

वे बताते हैं कि परंपरागत खेती से इतर हमने गुलाब की व्यावसायिक खेती को चुना। जिसमें शुरुआत में पैसे तो लगे लेकिन अब उसका फायदा मिल रहा है। अभी तीन एकड़ में गुलाब की खेती हो रही है, लेकिन कुछ दिनों बाद दो एकड़ क्षेत्रफल और बढ़ाने पर काम चल रहा है। बिचौलियों का दखल खत्म कर अक्तूबर से खुद निर्यात करने की योजना चल रही है।

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गुलाब के फूल का हो रहा उत्पादन। - फोटो : अमर उजाला।

पॉली हाउस से नियंत्रित किया जाता है तापमान

यह होता है पॉलीहाउस स्टील की चादर से शामियाने की तरह बना होता है, जिसके ऊपर प्लास्टिक का चादर चढ़ाया जाता है। पॉलीहाउस तापमान को नियंत्रित करने, उचित मात्रा में खाद को पौधों तक पहुंचाने, सिंचाई के लिए कम पानी की खपत आदि को ध्यान में रखकर बनाया जाता है। इस तकनीक का आविष्कार इस्राइल में हुआ। इस्राइल में रेतीली-पथरीली जमीन होने से वहां के किसान पॉलीहाउस का उपयोग बड़ी संख्या में करते हैं। इसका चलन भारत में भी बढ़ रहा है।

पॉलीहाउस बनाने के लिए सरकार किसानों को 35 फीसदी तक सब्सिडी देती है। इसके लिए यूपी हार्टीकल्चर विभाग की वेबसाइट पर जाकर पंजीकरण कराना होता है। इसके लिए किसानों को सरकार की ओर से कर्ज भी दिया जाता है। पॉलीहाउस आधुनिक तरीके से खेती करने के लिए होता है। - सुरेंद्र कुमार भास्कर, जिला उद्यान अधिकारी।

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