प्रशांत भूषण से पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता वीसी मिश्र भी कर चुके हैं अवमानना का सामना
सुप्रीमकोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण को सुप्रीमकोर्ट ने अदालत की अवमानना (कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट) का दोषी ठहराया है। मगर इससे पूर्व भी कई वकील अदालत की अवमानना में सजा पा चुके हैं। इनमें देश का सबसे चर्चित कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट का केस इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता वीसी मिश्र (विनय चंद्र ) का रहा है। सजा सुनाने के समय वीसी मिश्र बार कौंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन जैसे महत्वपूर्ण पद को सुशोभित कर रहे थे।
वीसी मिश्र के खिलाफ नौ मार्च 1994 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक खंडपीठ के जज एसके कोशेटे ने अवमानना पूर्ण व्यवहार की शिकायत करते हुए तत्कालीन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश वीके खन्ना को पत्र लिखा था। पत्र में कहा गया कि उनकी कोर्ट में एक फ्रेश मुकदमे की सुनवाई के दौरान वीसी मिश्र ने उनसे अपमानजनक भाषा में बात की और ट्रांसफर करा देने तथा संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाने की धमकी दी। जस्टिस कोशेटे ने पत्र में कहा कि वीसी मिश्र ने उनको बुरी तरह से अपमानित किया है। जस्टिस खन्ना ने यह पत्र भारत के मुख्य न्यायाधीश को संदर्भित कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश ने इस प्रकरण पर सुनवाई के लिए जस्टिस पीबी सावंत, जस्टिस कुलदीप सिंह और जस्टिस जगदीश शरण वर्मा की तीन सदस्यीय पीठ गठित की। पीठ ने वीसी मिश्र को नोटिस जारी कर उनको पक्ष रखने का निर्देश दिया। अपनी सफाई में वीसी मिश्र में आरोपों का खंडन किया। उन्होंने क्षमा याचना प्रस्तुत की मगर, तीन सदस्यीय पीठ ने वीसी मिश्र की क्षमा याचना को सशर्त की गई क्षमा याचना मानते हुए अस्वीकार कर दिया।
उनको छह सप्ताह के साधारण कारावास की सजा के अलावा वकालत करने पर तीन साल के प्रतिबंध की सजा सुनाई गई। इसके साथ ही पीठ ने वीसी मिश्र की उन सभी पदवियों को छीन लिया जो उनको निर्वाचन या मनोनयन से प्राप्त हुई थीं। वीसी मिश्र उस समय बार कौंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन के अलावा लीगल एजूकेशन कमेटी के चेयरमैन, बंगलौर लॉ यूनिवर्सिटी के फाउंडर मेंबर और चेयरमैन सहित करीब सात अति महत्वपूर्ण पदों पर थे।
हालांकि, छह सप्ताह की साधारण कैद की सजा को पीठ ने चार साल के लिए निलंबित कर दिया था।
तीन सदस्यीय पीठ के फैसले को सुप्रीमकोर्ट बार एसोसिएशन ने सुप्रीमकोर्ट में ही चुनौती दी। इस मामले को पांच सदस्यीय संविधान पीठ को सौंप दिया गया। संविधान पीठ ने 17 अप्रैल 1998 को फैसला सुनाते हुए कहा कि सुप्रीमकोर्ट को अनुच्छेद 142 और 129 में प्राप्त शक्तियों के तहत वकालत का लाइसेंस निलंबित करने का आदेश देने का अधिकार नहीं है। यह अधिकार राज्य बार कौंसिल या बार कौंसिल ऑफ इंडिया के पास है। यह निर्णय आने तक वीसी मिश्र की वकालत पर लगाए गए तीन साल के प्रतिबंध की अवधि बीत चुकी थी।
अवमानना कानून में होना चाहिए संशोधन : वीसी मिश्र
वरिष्ठ अधिवक्ता वीसी का कहना है कि अवमानना कानून में संशोधन की आवश्यकता है। यदि किसी कोर्ट की अवमानना का प्रकरण सामने आता है तो उसकी सुनवाई उसी कोर्ट द्वारा किए जाने के बजाए एक स्वतंत्र कमेटी गठित होनी चाहिए जो मामले की सुनवाई कर निर्णय करे। उनका मानना है कि संस्था में यदि खामियां हैं तो उसको उजागर अदालत की अवमानना नहीं है।खुद अपने मामले में उनका कहना है कि मैने न्यायापालिका में सुधार को लेकर कई महत्वपूर्ण मामले उठाए थे। मैने सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय की जगह राज्य न्यायालय और केंद्रिय न्यायालय बनाने की वकालत की थी। सर्वोच्च और उच्च न्यायालय जैसे शब्द मेरी समझ से लोकतांत्रिक व्यवस्था में उचित नहीं है। इसके अलावा हमारी न्याय प्रणाली साक्ष्य पर आधारित है। इसकी वजह से अदालत में निर्णय तो होता मगर न्याय नहीं होता है। इससे हमारी अदालतें एक प्रकार से साक्ष्यालय हैं न कि न्यायालय, इस विसंगति को भी मैने उठाया था।