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240 दिन की निरंतर सेवा साबित करने की प्राथमिक जिम्मेदारी श्रमिक की: हाईकोर्ट
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 240 दिन की निरंतर सेवा साबित करने की प्राथमिक जिम्मेदारी श्रमिक की है। इस टिप्पणी संग कोर्ट ने श्रम अदालत वाराणसी के 22 श्रमिकों की पुनर्बहाली और उन्हें दो तिहाई पिछला वेतन दिए जाने के आदेश को रद्द कर दिया है।
यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने सैम हिगिनबॉटम इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर टेक्नोलॉजी एंड साइंसेज की याचिका पर दिया है। श्रम अदालत ने अपने फैसले में माना था कि 22 श्रमिकों को पांच अक्तूबर 2010 को अवैध रूप से सेवा से हटा दिया गया था, जबकि वे एक वर्ष में 240 दिनों से अधिक समय से लगातार काम कर रहे थे। संस्थान ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
संस्थान के अधिवक्ता ने दलील दी कि श्रमिकों ने ऐसा कोई लिखित साक्ष्य, मास्टर रोल या दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया, जिससे यह साबित हो सके कि उन्होंने एक साल में 240 दिन कार्य किया है। साथ ही बिना ठोस आधार के पिछला वेतन देने का आदेश भी कानून के विपरीत है।
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कोर्ट ने कहा कि यह साबित करने की शुरुआती जिम्मेदारी श्रमिक की होती है कि उसने एक कैलेंडर वर्ष में 240 दिन लगातार काम किया है। केवल लिखित कथन या मौखिक दावों के आधार पर इसे सिद्ध नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने माना कि श्रम अदालत की ओर से यह निष्कर्ष निकालना कि श्रमिकों ने 240 दिन काम किया है, एक त्रुटिपूर्ण निर्णय था। इन आधारों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने लेबर कोर्ट के फैसलों को निरस्त करते हुए संस्थान की याचिकाओं को स्वीकार कर लिया। ब्यूरो
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यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने सैम हिगिनबॉटम इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर टेक्नोलॉजी एंड साइंसेज की याचिका पर दिया है। श्रम अदालत ने अपने फैसले में माना था कि 22 श्रमिकों को पांच अक्तूबर 2010 को अवैध रूप से सेवा से हटा दिया गया था, जबकि वे एक वर्ष में 240 दिनों से अधिक समय से लगातार काम कर रहे थे। संस्थान ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
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संस्थान के अधिवक्ता ने दलील दी कि श्रमिकों ने ऐसा कोई लिखित साक्ष्य, मास्टर रोल या दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया, जिससे यह साबित हो सके कि उन्होंने एक साल में 240 दिन कार्य किया है। साथ ही बिना ठोस आधार के पिछला वेतन देने का आदेश भी कानून के विपरीत है।
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कोर्ट ने कहा कि यह साबित करने की शुरुआती जिम्मेदारी श्रमिक की होती है कि उसने एक कैलेंडर वर्ष में 240 दिन लगातार काम किया है। केवल लिखित कथन या मौखिक दावों के आधार पर इसे सिद्ध नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने माना कि श्रम अदालत की ओर से यह निष्कर्ष निकालना कि श्रमिकों ने 240 दिन काम किया है, एक त्रुटिपूर्ण निर्णय था। इन आधारों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने लेबर कोर्ट के फैसलों को निरस्त करते हुए संस्थान की याचिकाओं को स्वीकार कर लिया। ब्यूरो