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कैनवस पर सज रहे मानसून के रंग

Fri, 14 Aug 2015 02:02 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Fri, 14 Aug 2015 02:02 AM IST
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Paint on canvas are attired monsoon
इलाहाबाद (ब्यूरो)। सावन ऋतु में प्रकृति के रूप को एक चित्रकार जिस तरह से अपने रंगों से सजा सकता है वह कोई और नहीं। खास तौर से युवा चित्रकार मानसून की व्याख्या अपनी रचनात्मकता और रंग संयोजन के साथ जिस तरह से करते हैं उसका अंदाज सबसे जुदा होता है। रचनात्मकता का यही अलग अंदाज इन दिनों इलाहाबाद संग्रहालय में दिख रहा है। युवा चित्रकारों का जमावड़ा सुबह से शाम तक सावन के रंगों को अपने कैनवस पर सजा रहे हैं।
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अंकिता सिंह जहां अपनी पेंटिंग में बिना बारिश वाले मानसून को दिखा रही हैं तो वहीं एमएफए की छात्रा पूजा सावन में झूम कर नाचते हुए मोर के पंखों में जितने भी रंग दिखते हैं, उसे दिखा रही हैं। देवयानी राय बचपन में बारिश में कागज की नाव बनाकर खेलने की धुंधली यादों को पेंटिंग में दर्शा रही हैं। साजिदा खातून धरती और आसमान के मिलन को सिर्फ पेंसिल के शेड और चारू बारिश में एक आम आदमी को बारिश की बौछारों का आनंद लेते हुए दिखा रही हैं। इसी तरह 30 से अधिक युवा चित्रकार प्रकृति के रंगों से कैनवस सजा रहे हैं। कार्यशाला सह संयोजक डॉ. संजू मिश्रा ने बताया कि सप्ताह भर तक युवा चित्रकारों द्वारा बनाई गई पेंटिंग्स से वीथिका को सजाया जाएगा।
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इलाहाबाद संग्रहालय में मानसून उत्सव-4 के तीसरे दिन बृहस्पतिवार को शास्त्रीय और उपशास्त्रीय गायन की प्रस्तुति हुई। डागर घराने के गायक डॉ. विशाल जैन ने भरथरी की बंदीश ‘उमड़ घुमड़ आए बदरा’ से कार्यक्रम की शुरुआत की। पखावज पर अंकित पारीख ने संगत की। दरभंगा घराने के डॉ. विवेक विशाल ने रागदेश में ‘ले झूले हिडोरा राधा-श्याम संग’, ठुमरी में ‘बरसन लागी बदरिया’ और कजरी ‘कईसे खेलन जैबू सावन में’ प्रस्तुत कर सभी का दिल जीत लिया।
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गजल गायक भूपेंद्र शुक्ल ने याद नहीं क्या-क्या देखा था,  होश वालों को खबर क्या और मोहे आई न जग की लाज सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। संग्रहालय निदेशक राजेश पुरोहित ने स्वागत, संयोजन, संचालन डॉ. राजेश मिश्र और सहसंयोजन डॉ. संजू मिश्रा ने किया। कार्यक्रम में प्रो. वीडी मिश्र, प्रो. अमर सिंह, डॉ. राधेश्याम अग्रवाल, डॉ. विभा मिश्रा, डॉ. रुचि मित्तल समेत काफी संख्या में लोग मौजूद रहे।
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