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आखिरी नहीं है ‘कलाम’
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Mon, 17 Oct 2016 01:52 AM IST
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allahabad
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इलाहाबाद। हिन्दी कथा के अप्रतिम हस्ताक्षर दूधनाथ सिंह अस्सी बरस के हुए। उम्र के इस पड़ाव पर पूरी सक्रियता के साथ निरंतर रचनाकर्म से जुड़े दूधनाथ जी शहर की शान हैं। कथा, उपन्यास, आलोचना, नाटक, संस्मरण सहित साहित्य की अन्य विधाओं में भी समान रूप से रचते हुए पूरी साफगोई से अपने समय की पड़ताल और सार्थक संवाद करते हैं। हालांकि ‘आखिरी कलाम’ उनका चर्चित उपन्यास भले ही हो लेकिन वह जिस सक्रियता से सृजनरत हैं, उससे यह कहना बेमानी नहीं कि उनके लिए कोई भी ‘कलाम’ आखिरी नहीं है।
वह नए से नए संदर्भों को सुनते, सहेजते और कागज पर उतारते तो हैं ही, देश के विभिन्न मंचों से समाज और राजनीति के तमाम मुद्दों पर बेबाकी से तर्कपूर्ण राय भी रखते रहे हैं। जरूरत हुई तो प्रतिरोध के साथ सोशल एक्टिविस्ट की भूमिका में भी सहज ही उपलब्ध और उपस्थित होते हैं। मार्कण्डेय, अमरकांत, रवींद्र कालिया के हमसे विदा होने और शेखर जोशी, ममता कालिया, बद्री नारायण आदि के शहर के दूर होने के साथ धीरे-धीरे करके खाली होते इलाहाबाद को दूधनाथ जी संबल देते हैं। इलाहाबाद को सांसें और संजीवनी देते दूधनाथ जी की हंसी बहुत कुछ कहती है क्योंकि वह मानीखेज़ है।
वह जितने सहज, सरल हैं, उतने ही मुखर भी। जो मन में रहा, वह मंच पर भी उतरा। इस दौरान उन्होंने कभी इस बात की परवाह नहीं कि सामने वाले के अनुकूल है या प्रतिकूल। उनसे असहमति को सुनने का सलीका सीखा जा सकता है। पत्नी निर्मला ठाकुर सहित सृजन के सहयात्रियों को खोने के साथ वह असहज जरूर हुए पर हौसले से रचना की राह पर बढ़ते रहे। उन्होंने बतौर अध्यापक कई-कई पीढ़ियों को गढ़ा, संवारा। उन्होंने संगमनगरी और साहित्य से जो कुछ लिया, उससे ज्यादा उसे लौटने की कोशिश की।
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वर्ष 1959 में धर्मयुग में छपी पहली कहानी ‘तुमने तो कुछ नहीं कहा’ से हुई उनके सृजन की शुरुआत का सिलसिला अब तक जारी है। लहर में प्रकाशित दूसरी कहानी ‘सपाट चेहरे वाला आदमी’ से चर्चित हुए। उन्होंने और रीछ, रक्तपात जैसी कहानियों से साठ के दशक की कहानी की सूरत और ‘धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे, काशी नरेश से पूछो, माई का शोकगीत’ से फैंटेसी लेखक की छवि बदली। उन्होंने बस बत्तीस बरस की उम्र में ही निराला की संपूर्ण कविताओं पर प्रामाणिक पुस्तक ‘निराला: आत्महंता आस्था’ लिखी। संस्मरण ‘लौट आ, ओ धार!’ में अद्भुत गद्य और प्रयोग के साथ ‘तू-फू’ के बहाने कहानी के शिल्प में शिद्दत से दखल देते हैं।
राजकमल की ओर से तैयार साठ वर्ष में साठ महत्वपूर्ण पुस्तकों की सूची में ‘आखिरी कलाम’ को भी जगह मिली। इसे पाठकों ने ऐसा हाथोंहाथ लिया कि एक वर्ष के भीतर ही तीन संस्करण निकले। इसी तरह पौराणिक आख्यान पर आधारित नाटक ‘यमगाथा’ सात भाषाओं में प्रकाशित हुई। इसे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय सहित देश के अनेक मंचों पर जगह मिली। वहीं ‘धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे’ पर डाक्यूमेंट्री भी बनी। वह पुरस्कारों की परवाह किए बगैर ईमानदारी से अपना काम करते रहे। इस बीच छोटे-मझोले पुरस्कारों से लेकर भारत भारती सम्मान तक उनकी झोली में आया। अब भी उम्मीद से उनकी ओर देख रहा साहित्य कामना कर रहा है, शतायु हों दूधनाथ।
000
अध्यापन
कोलकाता, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन
रचनाएं:
आखिरी कलाम, निष्कासन, सपाट चेहरे वाला आदमी, माई का शोक गीत, धर्मक्षेत्र-कुरुक्षेत्र, कथा समग्र, और भी आदमी हैं, सुरंग से लौटते हुए, महादेवी और भुवनेश्वर समग्र सहित संपादन और अनुवाद में काम।
0 कहानी संग्रह ‘तू-फू’,
0 शमशेर पर ‘एक शमशेर भी है’,
0 मुक्तिबोध पर ‘अंत:करण का आयतन’
0 भुवनेश्वर की समग्र रचनाओं पर ‘भुवनेेश्वर रचनावली’,
0 केदार की कविताओं का संकलन ‘ओट में खड़ा मैं बोलता हूं’,
फिलहाल
उपन्यास ‘शाश्वत से पतन’ और बस्तर के आदिवासियों पर ‘अबूझ माड़’ का लेखन
उपलब्धियां
0 महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विवि की साहित्य पीठ के लिए आवासीय लेखक ‘राइटर इन रेजीडेंस’ नामित किए गए।
0 शिमला स्थित भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के दो वर्ष तक फेलो भी रहे
0 भोपाल की निराला सृजन पीठ के निदेशक रहे पर सात माह बाद लौट आए
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वह नए से नए संदर्भों को सुनते, सहेजते और कागज पर उतारते तो हैं ही, देश के विभिन्न मंचों से समाज और राजनीति के तमाम मुद्दों पर बेबाकी से तर्कपूर्ण राय भी रखते रहे हैं। जरूरत हुई तो प्रतिरोध के साथ सोशल एक्टिविस्ट की भूमिका में भी सहज ही उपलब्ध और उपस्थित होते हैं। मार्कण्डेय, अमरकांत, रवींद्र कालिया के हमसे विदा होने और शेखर जोशी, ममता कालिया, बद्री नारायण आदि के शहर के दूर होने के साथ धीरे-धीरे करके खाली होते इलाहाबाद को दूधनाथ जी संबल देते हैं। इलाहाबाद को सांसें और संजीवनी देते दूधनाथ जी की हंसी बहुत कुछ कहती है क्योंकि वह मानीखेज़ है।
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वह जितने सहज, सरल हैं, उतने ही मुखर भी। जो मन में रहा, वह मंच पर भी उतरा। इस दौरान उन्होंने कभी इस बात की परवाह नहीं कि सामने वाले के अनुकूल है या प्रतिकूल। उनसे असहमति को सुनने का सलीका सीखा जा सकता है। पत्नी निर्मला ठाकुर सहित सृजन के सहयात्रियों को खोने के साथ वह असहज जरूर हुए पर हौसले से रचना की राह पर बढ़ते रहे। उन्होंने बतौर अध्यापक कई-कई पीढ़ियों को गढ़ा, संवारा। उन्होंने संगमनगरी और साहित्य से जो कुछ लिया, उससे ज्यादा उसे लौटने की कोशिश की।
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वर्ष 1959 में धर्मयुग में छपी पहली कहानी ‘तुमने तो कुछ नहीं कहा’ से हुई उनके सृजन की शुरुआत का सिलसिला अब तक जारी है। लहर में प्रकाशित दूसरी कहानी ‘सपाट चेहरे वाला आदमी’ से चर्चित हुए। उन्होंने और रीछ, रक्तपात जैसी कहानियों से साठ के दशक की कहानी की सूरत और ‘धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे, काशी नरेश से पूछो, माई का शोकगीत’ से फैंटेसी लेखक की छवि बदली। उन्होंने बस बत्तीस बरस की उम्र में ही निराला की संपूर्ण कविताओं पर प्रामाणिक पुस्तक ‘निराला: आत्महंता आस्था’ लिखी। संस्मरण ‘लौट आ, ओ धार!’ में अद्भुत गद्य और प्रयोग के साथ ‘तू-फू’ के बहाने कहानी के शिल्प में शिद्दत से दखल देते हैं।
राजकमल की ओर से तैयार साठ वर्ष में साठ महत्वपूर्ण पुस्तकों की सूची में ‘आखिरी कलाम’ को भी जगह मिली। इसे पाठकों ने ऐसा हाथोंहाथ लिया कि एक वर्ष के भीतर ही तीन संस्करण निकले। इसी तरह पौराणिक आख्यान पर आधारित नाटक ‘यमगाथा’ सात भाषाओं में प्रकाशित हुई। इसे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय सहित देश के अनेक मंचों पर जगह मिली। वहीं ‘धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे’ पर डाक्यूमेंट्री भी बनी। वह पुरस्कारों की परवाह किए बगैर ईमानदारी से अपना काम करते रहे। इस बीच छोटे-मझोले पुरस्कारों से लेकर भारत भारती सम्मान तक उनकी झोली में आया। अब भी उम्मीद से उनकी ओर देख रहा साहित्य कामना कर रहा है, शतायु हों दूधनाथ।
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अध्यापन
कोलकाता, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन
रचनाएं:
आखिरी कलाम, निष्कासन, सपाट चेहरे वाला आदमी, माई का शोक गीत, धर्मक्षेत्र-कुरुक्षेत्र, कथा समग्र, और भी आदमी हैं, सुरंग से लौटते हुए, महादेवी और भुवनेश्वर समग्र सहित संपादन और अनुवाद में काम।
0 कहानी संग्रह ‘तू-फू’,
0 शमशेर पर ‘एक शमशेर भी है’,
0 मुक्तिबोध पर ‘अंत:करण का आयतन’
0 भुवनेश्वर की समग्र रचनाओं पर ‘भुवनेेश्वर रचनावली’,
0 केदार की कविताओं का संकलन ‘ओट में खड़ा मैं बोलता हूं’,
फिलहाल
उपन्यास ‘शाश्वत से पतन’ और बस्तर के आदिवासियों पर ‘अबूझ माड़’ का लेखन
उपलब्धियां
0 महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विवि की साहित्य पीठ के लिए आवासीय लेखक ‘राइटर इन रेजीडेंस’ नामित किए गए।
0 शिमला स्थित भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के दो वर्ष तक फेलो भी रहे
0 भोपाल की निराला सृजन पीठ के निदेशक रहे पर सात माह बाद लौट आए