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मूलभूत सुविधाएं नहीं, कैसे बसेंगे कल्पवासी
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Thu, 28 Dec 2017 01:12 AM IST
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इलाहाबाद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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संगम की रेती पर बसने वाले माघ मेले की शुरुआत में सिर्फ पांच दिन ही बचे हैं लेकिन कल्पवासियों के लिए मुकम्मल इंतजाम नहीं हो सका है। ज्यादातर कल्पवासियों का प्रथम स्नानपर्व पौषपूर्णिमा से दो दिन पहले ही मेला क्षेत्र में आना शुरू हो जाता है, लेकिन अधूरी व्यवस्था से कल्पवासियों की बड़ी संख्या अब तक सांसत में है। माघ मेला संतों, आचार्यों, तीर्थपुरोहितों, गंगापुत्र घाटियों, संस्थाओं आदि से आबाद होता है लेकिन मेले की मुख्य शान तो कल्पवासी हैं। ये कल्पवासी तीर्थपुुरोहितों के ही यजमान होते हैं, ऐसे में तीर्थपुरोहितों को अब तक भूमि आवंटित न होने से कल्पवासी प्रभावित हो रहे हैं। अबकी गंगा की विशेष स्थिति के कारण महावीर और अक्षयवट मार्ग पर जमीन कम हो गई है, वहीं बीते वर्षों की अपेक्षा ‘सर्कुलेटिंग एरिया’ का दायरा भी बढ़ाया गया है।
ऐसे में जिन तीर्थपुरोहितों को महावीर और अक्षयवट मार्ग पर बसाया जाता था, उन्हें अबकी दारागंज के सामने भेज दिया गया है। इस विस्थापन में तकरीबन पचास बीघे पर बसने वाले सत्तर तीर्थपुरोहित प्रभावित हैं। इनके यहां तकरीबन डेढ़ हजार कल्पवासी परिवारों को बसना है। प्रशासन ने जिस नई जगह पर उन्हें बसाने को कहा है, वहां की जमीन अब तक गीली है। यहां बिजली, पानी के अतिरिक्त चकर्ड प्लेट भी नहीं बिछी है।
तीर्थपुरोहितों हीरामणि भारद्वाज, संतोष भारद्वाज, राजेश पांडेय, सुभाष पांडेय आदि का आरोप है कि जमीन देर से मिलने पर शिविर को बसाने में देरी होगी जबकि यजमानों का आना मेले के दो दिन पहले ही शुरू हो जाता है। ऐसे में प्रशासन के रवैये से तीर्थपुरोहितों के साथ ही कल्पवासियों की दिक्कतें भी बढ़ गई हैं। परंपरा के अनुसार पहले स्नान पर्व पौष पूर्णिमा से ही कल्पवास शुरू हो जाएगा, सो उन्हें आधी-अधूरी तैयारियों से जूझना पड़ सकता है। परेशानी में प्रयागवाल तख्त ये ऐसे तीर्थपुरोहित हैं, जिन्हें प्रयागवाल तख्त कहते हैं। संगम के किनारे अक्षयवट और महावीर पर जमीन मिलने से ये एक ओर जहां घाट पर श्रद्धालुओं को पूजा-अनुष्ठान कराते थे, वहीं पास में लगने वाले शिविर में रुकने वाले कल्पवासियों को भी सुविधाएं मुहैया कराते थे, अबकी इस तालमेल में दिक्कत होगी।
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ऐसे में जिन तीर्थपुरोहितों को महावीर और अक्षयवट मार्ग पर बसाया जाता था, उन्हें अबकी दारागंज के सामने भेज दिया गया है। इस विस्थापन में तकरीबन पचास बीघे पर बसने वाले सत्तर तीर्थपुरोहित प्रभावित हैं। इनके यहां तकरीबन डेढ़ हजार कल्पवासी परिवारों को बसना है। प्रशासन ने जिस नई जगह पर उन्हें बसाने को कहा है, वहां की जमीन अब तक गीली है। यहां बिजली, पानी के अतिरिक्त चकर्ड प्लेट भी नहीं बिछी है।
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तीर्थपुरोहितों हीरामणि भारद्वाज, संतोष भारद्वाज, राजेश पांडेय, सुभाष पांडेय आदि का आरोप है कि जमीन देर से मिलने पर शिविर को बसाने में देरी होगी जबकि यजमानों का आना मेले के दो दिन पहले ही शुरू हो जाता है। ऐसे में प्रशासन के रवैये से तीर्थपुरोहितों के साथ ही कल्पवासियों की दिक्कतें भी बढ़ गई हैं। परंपरा के अनुसार पहले स्नान पर्व पौष पूर्णिमा से ही कल्पवास शुरू हो जाएगा, सो उन्हें आधी-अधूरी तैयारियों से जूझना पड़ सकता है। परेशानी में प्रयागवाल तख्त ये ऐसे तीर्थपुरोहित हैं, जिन्हें प्रयागवाल तख्त कहते हैं। संगम के किनारे अक्षयवट और महावीर पर जमीन मिलने से ये एक ओर जहां घाट पर श्रद्धालुओं को पूजा-अनुष्ठान कराते थे, वहीं पास में लगने वाले शिविर में रुकने वाले कल्पवासियों को भी सुविधाएं मुहैया कराते थे, अबकी इस तालमेल में दिक्कत होगी।
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