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High Court : कफ सिरप से बच्चों की मौत मामले में कंपनी और निदेशकों को नहीं मिली राहत, जारी रहेगा मुकदमा

Fri, 16 Jan 2026 05:53 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 16 Jan 2026 05:53 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कफ सिरप मामले में मेसर्स मैरियन बायोटेक प्राइवेट लिमिटेड और उसके निदेशकों को राहत देने से इन्कार कर दिया। कोर्ट ने समन व संज्ञान आदेश को चुनौती देने वाली पुनरीक्षण अर्जी खारिज कर दी।

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No relief to company and directors in case of children death due to cough syrup, trial to continue
इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कफ सिरप मामले में मेसर्स मैरियन बायोटेक प्राइवेट लिमिटेड और उसके निदेशकों को राहत देने से इन्कार कर दिया। कोर्ट ने समन व संज्ञान आदेश को चुनौती देने वाली पुनरीक्षण अर्जी खारिज कर दी। अब कंपनी व निदेशकों के खिलाफ मुकदमा जारी रहेगा। यह आदेश न्यायमूर्ति हरवीर सिंह ने दिया है।

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गौतमबुद्ध नगर के थाना फेज-तीन में वर्ष 2024 में मेसर्स मैरियन बायोटक प्राइवेट लिमिटेड व उसके निदेशकों के खिलाफ ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक एक्ट की धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। आरोप था कि कंपनी की ओर से निर्मित कफ सिरप में जहरीले तत्व की वजह से उज्बेकिस्तान में इसके सेवन से 18 से अधिक बच्चों की मौत हुई। पुलिस ने मामले में आरोप पत्र दाखिल किया। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 19 जनवरी 2024 को आरोप पत्र का संज्ञान लेकर समन आदेश जारी किया। इस फैसले को याची कंपनी व निदेशकों ने हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए पुनरीक्षण अर्जी दायर की।
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याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि केवल पद के आधार पर निदेशकों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। शिकायत में निदेशकों की सीधी संलिप्तता या लापरवाही के कोई साक्ष्य नहीं है। प्रयोगशाला परीक्षण में दवा की गुणवत्ता मानक के अनुसार नहीं थी। कहीं भी नमूना नकली या मिलावटी नहीं पाया गया है। नमूना गोदाम से लिया गया था, बिक्री केंद्रों से नहीं। अन्य कई दलीलें देते हुए संज्ञान व समन आदेश को रद्द करने की मांग की।
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कोर्ट ने कहा कि निदेशकों की सीधी भूमिका स्पष्ट नहीं है। लेकिन निदेशक और वरिष्ठ अधिकारी कंपनी के दैनिक कामकाज से निकटता से जुड़े होते हैं और वह अधिनियम की धारा-34 के तहत वे उत्तरदायी हैं। कोर्ट ने कहा कि समन के चरण में केवल प्रथम दृष्टया मामला देखा जाता है, सबूतों की विस्तृत जांच ट्रायल के दौरान होगी। हाईकोर्ट ने पाया कि मजिस्ट्रेट की ओर से पारित आदेश में कोई अवैधता नहीं है। इसी के साथ पुनरीक्षण अर्जी खारिज कर दी।

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