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Prayagraj News: भारतीय जनमानस के लिए नई शिक्षा नीति क्यों जरूरी?
Thu, 10 Sep 2020 03:55 PM IST
इलाहाबाद ब्यूरो
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: इलाहाबाद ब्यूरो
Updated Thu, 10 Sep 2020 03:55 PM IST
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यूपीआरटीओयू
- फोटो : UPRTOU
प्रयागराज। उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विवि के समाज विज्ञान विद्या शाखा की ओर से बुधवार को ‘नई शिक्षा नीति की प्रासंगिकता एवं विशेषताएं’ पर वेबिनार का आयोजन किया गया। इस मौके पर कुलपति प्रो. केएन सिंह ने कहा कि जब भी कोई नई नीति आती है तो जनमानस में उसके प्रति संदेह और जानने की इच्छा होती है। उन्होंने कहा कि शिक्षा समाज में कितनी पहुंच रही है यह महत्वपूर्ण है।
वेबिनार के मुख्य अतिथि बालमुकुंद पांडेय ने कहा कि शिक्षा नीति भारतीय जनमानस से अधिकाधिक संख्या में संवाद स्थापित करके बनाई गई है। इसलिए इसमें आध्यात्मिकता का सुर मिलता है। विशिष्ट अतिथि प्रो. के रत्नम ने कहा कि भारतीय चिंतन में शिक्षा सदैव समाज का ही दायित्व रहा है, यह कभी भी राज्य का दायित्व नहीं रहा है। मुख्य वक्ता उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग के अध्यक्ष प्रो. ईश्वर शरण विश्वकर्मा ने कहा कि भारत प्राचीन काल में शिक्षा का केंद्र था परंतु कालांतर में परिस्थितियां वैश्विक रूप से यूरोप केंद्रित हो गई और हम अपने मूल से भटक गए। इस अवसर पर डॉ. त्रिविक्रम तिवारी, प्रो. सुधांशु त्रिपाठी, डॉ. संतोष कुमार, रमेश चंद्र यादव, डॉ. अरुण कुमार गुप्ता आदि मौजूद रहे।
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वेबिनार के मुख्य अतिथि बालमुकुंद पांडेय ने कहा कि शिक्षा नीति भारतीय जनमानस से अधिकाधिक संख्या में संवाद स्थापित करके बनाई गई है। इसलिए इसमें आध्यात्मिकता का सुर मिलता है। विशिष्ट अतिथि प्रो. के रत्नम ने कहा कि भारतीय चिंतन में शिक्षा सदैव समाज का ही दायित्व रहा है, यह कभी भी राज्य का दायित्व नहीं रहा है। मुख्य वक्ता उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग के अध्यक्ष प्रो. ईश्वर शरण विश्वकर्मा ने कहा कि भारत प्राचीन काल में शिक्षा का केंद्र था परंतु कालांतर में परिस्थितियां वैश्विक रूप से यूरोप केंद्रित हो गई और हम अपने मूल से भटक गए। इस अवसर पर डॉ. त्रिविक्रम तिवारी, प्रो. सुधांशु त्रिपाठी, डॉ. संतोष कुमार, रमेश चंद्र यादव, डॉ. अरुण कुमार गुप्ता आदि मौजूद रहे।
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