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High Court : नामांतरण प्रक्रिया केवल टैक्स वसूली के लिए, यह मालिकाना हक तय नहीं करती
Mon, 20 Apr 2026 04:55 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Mon, 20 Apr 2026 04:55 PM IST
सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक फैसले में स्पष्ट किया है कि नगर निगम की ओर से की जाने वाली नामांतरण (दाखिल-खारिज) की कार्यवाही केवल टैक्स वसूली के उद्देश्य से संक्षिप्त प्रक्रिया है।
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कोर्ट का आदेश।
- फोटो : अमर उजाला।
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक फैसले में स्पष्ट किया है कि नगर निगम की ओर से की जाने वाली नामांतरण (दाखिल-खारिज) की कार्यवाही केवल टैक्स वसूली के उद्देश्य से संक्षिप्त प्रक्रिया है। यह किसी भी व्यक्ति के संपत्ति पर मालिकाना हक का निर्धारण नहीं करती है। न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने वाराणसी नगर निगम के तत्कालीन जोनल अधिकारी रामेश्वर दयाल की बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया। कहा कि नामांतरण प्रविष्टियां केवल वित्तीय उद्देश्यों की पूर्ति करती हैं, ताकि राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज व्यक्ति से कर वसूला जा सके। इन्हें मालिकाना हक का प्रमाण नहीं माना जा सकता है।
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मामला वाराणसी के दशाश्वमेध क्षेत्र स्थित एक मकान के नामांतरण से जुड़ा है। याचिकाकर्ता रामेश्वर दयाल ने जोनल अधिकारी के पद पर रहते हुए एक पंजीकृत बैनामे के आधार पर नामांतरण मंजूर किया था। विभाग ने आरोप लगाया था कि यह संपत्ति एक सार्वजनिक देवोत्तर (मूर्तियों को समर्पित) थी। इसके सेवायतों को इसे बेचने का अधिकार नहीं था। याची को कर्तव्यों के निर्वहन में लापरवाही और कदाचार का दोषी मानते हुए सेवा से हटा दिया गया था। याची ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने पाया कि जिस बैनामे के आधार पर नामांतरण किया गया, उसे किसी भी सक्षम सिविल कोर्ट में चुनौती नहीं दी गई थी।
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कोर्ट ने कहा कि नामांतरण की कार्यवाही के दौरान अधिकारी पंजीकृत बैनामे की वैधता की जांच उस सीमा तक नहीं कर सकता कि विक्रेता को बेचने का अधिकार है या नहीं। यह दीवानी न्यायालय का क्षेत्राधिकार है। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि उक्त संपत्ति से मूर्तियां पहले ही जिला मजिस्ट्रेट की अनुमति से स्थानांतरित की जा चुकी थीं। हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता के खिलाफ भ्रष्टाचार या किसी बाहरी प्रभाव का कोई सबूत नहीं था। केवल एक कानूनी त्रुटि या प्रक्रियात्मक चूक के आधार पर सेवा से बर्खास्तगी जैसा कठोर दंड देना अनुचित है। अदालत ने इस अनुशासनात्मक कार्यवाही को दोषपूर्ण करार देते हुए बर्खास्तगी आदेश को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है।
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