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मानसून ने तोड़ी सरकारी नीतियों के मारे किसानों की कमर

Sat, 02 Jul 2016 01:27 AM IST
अविनाशी श्रीवास्तव, अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अविनाशी श्रीवास्तव, अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Sat, 02 Jul 2016 01:27 AM IST
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Monsoon broke the back of government policy, the farmers killed
मानसून - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
सरकारी नीतियों और मानसून की बेरूखी के मारे किसानों के अच्छे दिन अब भी आते नहीं दिख रहे। वैज्ञानिकों के दावों के विपरीत शुरुआती दिनों में इस बार भी मानसून ने दगा दे दिया है। इसकी वजह से खेती के साथ उनकी स्थिति भी बदतर होती दिख रही है। आलम यह है कि जून बीतने के बावजूद खेतों में अब भी दरारें दिख रही हैं। महंगी होती खेती तथा सरकार की गलत नीतियों की वजह से किसानों के लिए लागत निकाल पाना पहले ही मुश्किलों से भरा रहा है, बेमौसम बारिश और सूखे ने अन्नदाताओं को अनाज के लिए मोहताज बना दिया है। उनके सामने परिवार को पालने की चुनौती है। मानसून की मेहरबानी के बिना भूमिपुत्रों की और क्या दुर्दशा होगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है।
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हालांकि सच्चाई भयावह है लेकिन किसानों के भूखे पेट का दर्द बयां करने के लिए सरकारी आंकड़ें ही काफी हैं। गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रोफेसर प्रदीप भार्गव ने नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) के हवाले से बताया कि जिन किसानों के पास चार बीघा खेती योग्य भूमि है, उनक ी आमदनी भी महीने में 5400 रुपये ही है। चार बीघा जमीन वाला किसान खेती और पशुपालन से तो मात्र 26 हजार रुपये ही कमा पाता है। हालांकि वह मजदूरी या दूसरे कामों में मिली आय मिलाकर साल में 60 से 65 हजार रुपये कमाता है।
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किसानाें का कहना है कि धान की खेती के प्रत्येक बीघे में बीज, दवा और खाद पर तकरीबन साढ़े तीन हजार रुपये खर्च आते हैं। सिंचाई पर तकरीबन पांच हजार रुपये और निराई, रोपाई, कटाई आदि में मजदूरी पर छह से सात हजार रुपये खर्च होते हैं। मेजा के हुलका गांव के राजा पांडेय कहते हैं, एक बीघा धान की खेती में तकरीबन 16 हजार रुपये खर्च होते हैं। हाइब्रिड धान की बुआई पर एक बीघा में तकरीबन 15 क्विंटल धान का उत्पादन होता है। यदि सरकारी क्रय केंद्र पर धान की बिक्री की जाए तो 1425 रुपये प्रति क्ंिवटल के हिसाब से 21,375 रुपये मिलेंगे। सुजली गांव के सरदार सिंह कहते हैं, हाइब्रिड धान के चावल में टूटन की शिकायत ज्यादा होती है। इसलिए मानक का हवाला देकरसरकारी क्रय केंद्रों पर यह धान नहीं लिया जाता है। इसकी वजह से व्यापारियों को उनकी तय कीमत पर धान बेचना पड़ता है। व्यापारियों ने पिछले साल एक हजार से 1100 रुपये प्रति क्विंटल में धान लिया था। इस तरह से किसानों की लागत भी नहीं मिल पाई।
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यह तो सामान्य स्थितियों का हाल है। विगत तीन वर्षों से बेमौसम बारिश और सूखे की वजह से किसानों की स्थिति और खराब हुई है। बड़ी संख्या में किसान क्रेडिट कार्ड के तहत लिया गया कर्जा नहीं चुका पाए। वसूली के डर से उन्हें कई बार घर छोड़कर भागना पड़ा। मौसम विभाग ने इस साल अच्छी बारिश की घोषणा की थी। इससे किसानों में उम्मीदें जगी हैं लेकिन शुरुआती दिनों में बड़ा झटका लगा है। राजा पांडेय कहते हैैं, बेहन पीली पड़ने लगी है। ऐसे में अब उम्मीदें दम तोड़ने लगी हैं। प्रोफेसर प्रदीप भार्गव कहते हैं, सरकारी मदद के अंतर्गत कुछ हद तक फसल बीमा और मुआवजे की व्यवस्था है लेकिन उसका लाभ किन्हें एवं कितना मिलता है, इसकी सच्चाई सबके सामने है। अब इसका एक ही हल है कि किसानों के उत्पाद की कीमत बढ़ाई जाए। खेती की लागत तथा अन्य पहलुओं को देखते हुए गेहूं का समर्थन मूल्य 70 रुपये प्रति किलोग्राम किया जाना चाहिए।
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