‘तू अगर परिंदा है तो आसमान तेरा है’
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पहले दिन काव्य संध्या मुख्य आकर्षण रही और पद्मश्री प्रोफेसर अशोक चक्रधर, अलीगढ़ के डॉ.विष्णु सक्सेना, श्लेष गौतम जैसे प्रख्यात कवियों ने रचनाओं से सभी को मुग्ध किया। प्रोफेसर अशोक चक्रधर ने ‘तू अगर दरिंदा है तो मसान तेरा है, तू अगर परिंदा है तो आसमान तेरा है’ के माध्यम से विद्यार्थियों में जोश भरा तो ‘संतरी के आखिरी अल्फाज थे जब बम फटा, मुफ्त में भी दे तो मत लेना किसी से संतरा’ के जरिए आतंक के दर्द को बयां किया। डॉ.विष्णु सक्सेना ने ‘रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा इक लहर आएगी कुछ बचेगा नहीं, तुमने पत्थर का दिल हमको कह तो दिया पत्थरों पर लिखोगे मिटेगा नहीं’,।
बड़ौदा के कर्नल वीपी सिंह ने ‘जहां-जहां उड़े तिरंगा वहां-वहां तक घर मेरा है, जब तक ये झंडा ऊंचा है तब तक ऊंचा सर मेरा है’, संचालन कर रहे डॉ.श्लेश गौतम ने ‘लिखा किया रह जाएगा रहता नहीं शरीर इसीलिए मरते नहीं तुलसी सूर कबीर’, राजस्थान की कविता किरण ने ‘नजर के जाम की खुशबू हसीं पैगाम की खुशबू, तेरे कांधे पे रखके सर गुजारी शाम की खुशबू, बिछड़ते वक्त जो तूने कभी लिखा था होंठों से मेरे हाथों में है अब तक वो तेरे नाम की खुशबू’, कानपुर के डॉ.कमलेश द्विवेदी ने ‘मेरी खातिर नींबू-पानी अपनी खातिर जाम किया, पर पीने वालों में उसने मेरा पहला नाम लिखा। किसके हिन्दू से मतलब है किसको मुस्लिम से मतलब, कुर्सी की खातिर ही इसने अल्लाह उसने राम लिखा।’ आदि रचनाएं पढ़ीं।