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सिविल विवाद में दर्ज आपराधिक केस दर्ज करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग

Fri, 23 Jul 2021 09:22 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 23 Jul 2021 09:22 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सिविल प्रकृति के विवाद में दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया है और कहा है कि न्याय हित में कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए आपराधिक केस रद्द किया जाना जरूरी है।

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Misuse of judicial process to register criminal cases in civil disputes
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सिविल प्रकृति के विवाद में दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया है और कहा है कि न्याय हित में कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए आपराधिक केस रद्द किया जाना जरूरी है। कोर्ट ने न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा सिविल विवाद में एफआईआर दर्ज करने का निर्देश जारी करने पर आश्चर्य व्यक्त किया है।
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कोर्ट ने कहा है कि इस आदेश का असर नियमानुसार कायम सिविल या राजस्व कार्यवाही पर नहीं पड़ेगा। यह आदेश न्यायमूर्ति एसपी केसरवानी तथा न्यायमूर्ति पीयूष अग्रवाल की खंडपीठ ने गोविन्द उर्फ राधे लाल की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है। मालूम हो कि याची के खिलाफ कपट, धोखाधड़ी के आरोप में कन्नौज की छिबरामऊ कोतवाली में सुमेर साक्य (बाद में मृत) ने एफआईआर दर्ज कराई। यह प्राथमिकी मजिस्ट्रेट के आदेश पर दर्ज हुई, जिसे चुनौती दी गई थी।
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याची का कहना था कि शिकायत कर्ता की पत्नी रामवती, लाल सहाय की पुत्री है। लाल सहाय के चाचा छिद्दन ने 5 दिसंबर 59 को याची को गोद लिया और गोदनामा पंजीकृत करा लिया। 9 सितंबर 60 को याची के नाम तहसीलदार छिबरामऊ ने वरासत दर्ज कर दी। चकबंदी के समय रामवती ने गोदनामे पर आपत्ति की, जो खारिज हो गई। अपील और पुनरीक्षण भी खारिज हो गई। मुंसिफ मजिस्ट्रेट की अदालत में सिविल वाद दायर किया। उसमें हुए समझौते में गोदनामा स्वीकार कर लिया गया। इसके बाद एफआईआर दर्ज कराई गई, जिसे कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करार देते हुए रद्द कर दिया है।
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