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बच्चे के पिता की कस्टडी में होने मात्र से बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करने पर नहीं लग सकती रोक : हाईकोर्ट

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 25 Apr 2026 03:04 AM IST
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Merely being in the custody of the child's father cannot bar filing of a habeas corpus petition: High Court
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी बच्चे के पिता की कस्टडी में होने मात्र से बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करने पर रोक नहीं लगाई जा सकती। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण पहलू बच्चे का कल्याण और उसका सुरक्षित भविष्य होता है। इसी के साथ हाईकोर्ट ने एकलपीठ के फैसले को रद्द कर दिया। साथ ही बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को उसके मूल नंबर पर बहाल करते हुए संबंधित पीठ के समक्ष पुनः सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है।
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यह आदेश न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति कुनाल रवि सिंह की खंडपीठ ने दिया है। आजमगढ़ निवासी अवयस्क व उसकी माता ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर बच्चे की अभिरक्षा की गुहार लगाई थी। एकल पीठ ने याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि बच्चा अपने पिता के पास है। इसलिए उसकी कस्टडी को अवैध नहीं माना जा सकता।
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साथ ही, मां को हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम, 1956 के तहत वैकल्पिक कानूनी प्रक्रिया अपनाने की सलाह दी गई थी। मां ने एकलपीठ के फैसले के खिलाफ विशेष अपील दायर की। सुनवाई के दौरान अपीलकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि बच्चा मात्र 18 महीने का है और इस उम्र में उसे मां की देखभाल की विशेष आवश्यकता होती है। यह भी आरोप लगाया गया कि पिता ने बच्चे को जबरन मां से अलग कर लिया था, जिसके संबंध में आजमगढ़ के बिलरियागंज थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी।
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मामले की सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के कई पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि असाधारण परिस्थितियों में हाईकोर्ट अपने रिट क्षेत्राधिकार का उपयोग कर सकता है, ताकि बच्चे के सर्वोत्तम हित को सुनिश्चित किया जा सके। अदालत ने ‘श्रीमती रिंकू राम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले के फैसले पर भरोसा जताते हुए कहा कि जब बच्चा अपनी पसंद व्यक्त करने की आयु का नहीं होता, तब अदालत का कर्तव्य है कि उसकी सुरक्षा और उचित कस्टडी सुनिश्चित की जाए।
हाईकोर्ट ने एकल पीठ की ओर से 18 मार्च 2026 को दिए गए आदेश को रद्द कर दिया और मामले को वापस एकल पीठ के पास पुनः सुनवाई के लिए भेज दिया।
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