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साढ़े तीन रुपये में एमडीएम, कैसे मिलेगा फल
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Thu, 30 Jun 2016 01:19 AM IST
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- फोटो : अमर उजाला
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बढ़ती महंगाई के दौर में परिषदीय विद्यालयों के बच्चों को मिड-डे मील का वितरण कठिन हो गया है। सरकार की ओर से रोज-रोज बढ़ती कीमतों के बीच कनवर्जन कास्ट में बिना कोई वृद्धि के मेन्यू में दूध एवं मौसमी फल को भी शामिल कर दिया गया है। सरकार की ओर से खाद्य पदार्थों के हर दिन बढ़ते कीमत के बाद भी कनवर्जन कास्ट में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है। ऐसे में बढ़ती महंगाई केदौर में सरकार की ओर से स्कूलों में पौष्टिक भोजन देने का दावा हवा-हवाई साबित हो रहा है।
प्रदेश सरकार की ओर से जुलाई में स्कूल खुलने के साथ मिड-डे मील में सप्ताह में एक दिन दूध दिए जाने के निर्णय लिया गया है। ऐसे में परिषदीय विद्यालयों के बच्चों को मिलने वाला मिड डे मील बच्चों की थाली से दूर होता जाएगा। सरकार की ओर से दो वर्ष पूर्व कनवर्जन कास्ट में मात्र 7.5 फीसदी की वृद्धि की गई थी। उस समय प्राथमिक के लिए 3.34 रुपये से 3.59 रुपये एवं उच्च प्राथमिक के लिए 5.00 रुपये से 5.38 पैसे करने की घोषणा की गई थी। इस बीच महंगाई तेजी से बढ़ने के बाद भी केंद्र एवं प्रदेश सरकार की ओर से मिड-डे मील की कनवर्जन कास्ट में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई। सब्सिडी वाले सिलेंडर की संख्या भी सीमित होने के कारण अब भोजन पकाने के लिए अतिरिक्त धन खर्च करना पड़ रहा है। ऐसे में प्रधान एवं स्कूल वाले महंगाई के कारण मिड डे मील में पैष्टिक तत्वों की कटौती कर रहे हैं। दाल, सोयाबीन और हरी सब्जी के बदले बच्चों को मात्र दाल का घोल और खिचड़ी देकर काम चलाते हैं।
सरकार की ओर से एक बच्चे के लिए मात्र 3.59 रुपये कनवर्जन मनी मिलती है। इसी पैसे से ग्राम प्रधान और प्रधानाध्यापक को दाल, सब्जी, नमक, मशाला, तेल-घी, दूध, मेवे आदि की व्यवस्था करनी पड़ती है। मिड डे मील के लिए खाद्य सामग्री चावल, गेहूं की व्यवस्था प्रदेश सरकार खाद्य एवं रसद विभाग करता है। खाना पकाने के लिए लकड़ी अथवा गैस सिलेंडर तथा रसोइये की व्यवस्था भी 3.59 रुपये
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प्रदेश सरकार की ओर से मिड-डे मील में बुधवार को मेन्यू में दूध शामिल करने के बाद शुरुआती दिनों में तो ठीक परंतु बाद में स्कूलों में बिना किसी आदेश के दूध वितरण पर अघोषित बंदी लगा दी गई थी। अब स्कूल खुलने पर प्रदेश सरकार ने मिड-डे मील में सप्ताह में एक दिन मौसमी फल देने की घोषणा की है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि इतने कम पैसे में बच्चों को हरी सब्जी, दूध-दही तथा पौष्टिक तत्व कैसे मिलेंगे। मिड-डे मील के मेन्यू में दिन के अनुसार 100 प्रति बच्चों के हिसाब से वांछित सामग्री तय की जाती है। प्राथमिक विद्यालयों के 100 बच्चों के लिए तैयार होने वाले भोजन में स्कूलों को मानक के अनुसार एक दिन के लिए 359 रुपये मिलते हैं।
मिड डे मील के मेन्यू में शामिल बुधवार को स्कूलों में बनने वाले कढ़ी चावल के खर्च सरकार की ओर से मिलने वाले पैसे बहुत अधिक होता है। कढ़ी चावल के लिए चावल सरकार की ओर से मिलता है, कढ़ी के लिए 10 लीटर दूध की दही, 2.5 किलोग्राम बेसन तथा 500 ग्राम तेल-घी का सरकार ने निर्धारण किया है। इसमें 10 लीटर दूध की कीमत शहर और कस्बों में तो एक लीटर दूध की कीमत 50 रुपये है, ग्रामीण क्षेत्र में इसे 40-45 रुपये लीटर माना जाए तो 10 लीटर दूध 400 से 450 रुपये में आएगा। 500 ग्राम तेल की कीमत 75 रुपये आती है, 2.5 किलोग्राम बेसन का मूल्य 100 रुपये से अधिक आता है।
ऐसे में एक दिन का खर्च 359 रुपये मिलता है, जबकि खर्च लगभग 600 रुपये आता है। इसमें खाना पकाने वाले और खाना पकाने के लिए लकड़ी का खर्च शमिल नहीं है। इनका भी खर्च कम से कम 100 रुपये जोड़ दिया जाए तो यह 700 रुपये से अधिक आता है। इसमें सब्जी मशाला, हल्दी आदि का खर्च शामिल नहीं है, इसे भी जोड़ देने से खर्च 800 रुपये तक पहुंच जाएगा।
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प्रदेश सरकार की ओर से जुलाई में स्कूल खुलने के साथ मिड-डे मील में सप्ताह में एक दिन दूध दिए जाने के निर्णय लिया गया है। ऐसे में परिषदीय विद्यालयों के बच्चों को मिलने वाला मिड डे मील बच्चों की थाली से दूर होता जाएगा। सरकार की ओर से दो वर्ष पूर्व कनवर्जन कास्ट में मात्र 7.5 फीसदी की वृद्धि की गई थी। उस समय प्राथमिक के लिए 3.34 रुपये से 3.59 रुपये एवं उच्च प्राथमिक के लिए 5.00 रुपये से 5.38 पैसे करने की घोषणा की गई थी। इस बीच महंगाई तेजी से बढ़ने के बाद भी केंद्र एवं प्रदेश सरकार की ओर से मिड-डे मील की कनवर्जन कास्ट में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई। सब्सिडी वाले सिलेंडर की संख्या भी सीमित होने के कारण अब भोजन पकाने के लिए अतिरिक्त धन खर्च करना पड़ रहा है। ऐसे में प्रधान एवं स्कूल वाले महंगाई के कारण मिड डे मील में पैष्टिक तत्वों की कटौती कर रहे हैं। दाल, सोयाबीन और हरी सब्जी के बदले बच्चों को मात्र दाल का घोल और खिचड़ी देकर काम चलाते हैं।
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सरकार की ओर से एक बच्चे के लिए मात्र 3.59 रुपये कनवर्जन मनी मिलती है। इसी पैसे से ग्राम प्रधान और प्रधानाध्यापक को दाल, सब्जी, नमक, मशाला, तेल-घी, दूध, मेवे आदि की व्यवस्था करनी पड़ती है। मिड डे मील के लिए खाद्य सामग्री चावल, गेहूं की व्यवस्था प्रदेश सरकार खाद्य एवं रसद विभाग करता है। खाना पकाने के लिए लकड़ी अथवा गैस सिलेंडर तथा रसोइये की व्यवस्था भी 3.59 रुपये
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प्रदेश सरकार की ओर से मिड-डे मील में बुधवार को मेन्यू में दूध शामिल करने के बाद शुरुआती दिनों में तो ठीक परंतु बाद में स्कूलों में बिना किसी आदेश के दूध वितरण पर अघोषित बंदी लगा दी गई थी। अब स्कूल खुलने पर प्रदेश सरकार ने मिड-डे मील में सप्ताह में एक दिन मौसमी फल देने की घोषणा की है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि इतने कम पैसे में बच्चों को हरी सब्जी, दूध-दही तथा पौष्टिक तत्व कैसे मिलेंगे। मिड-डे मील के मेन्यू में दिन के अनुसार 100 प्रति बच्चों के हिसाब से वांछित सामग्री तय की जाती है। प्राथमिक विद्यालयों के 100 बच्चों के लिए तैयार होने वाले भोजन में स्कूलों को मानक के अनुसार एक दिन के लिए 359 रुपये मिलते हैं।
मिड डे मील के मेन्यू में शामिल बुधवार को स्कूलों में बनने वाले कढ़ी चावल के खर्च सरकार की ओर से मिलने वाले पैसे बहुत अधिक होता है। कढ़ी चावल के लिए चावल सरकार की ओर से मिलता है, कढ़ी के लिए 10 लीटर दूध की दही, 2.5 किलोग्राम बेसन तथा 500 ग्राम तेल-घी का सरकार ने निर्धारण किया है। इसमें 10 लीटर दूध की कीमत शहर और कस्बों में तो एक लीटर दूध की कीमत 50 रुपये है, ग्रामीण क्षेत्र में इसे 40-45 रुपये लीटर माना जाए तो 10 लीटर दूध 400 से 450 रुपये में आएगा। 500 ग्राम तेल की कीमत 75 रुपये आती है, 2.5 किलोग्राम बेसन का मूल्य 100 रुपये से अधिक आता है।
ऐसे में एक दिन का खर्च 359 रुपये मिलता है, जबकि खर्च लगभग 600 रुपये आता है। इसमें खाना पकाने वाले और खाना पकाने के लिए लकड़ी का खर्च शमिल नहीं है। इनका भी खर्च कम से कम 100 रुपये जोड़ दिया जाए तो यह 700 रुपये से अधिक आता है। इसमें सब्जी मशाला, हल्दी आदि का खर्च शामिल नहीं है, इसे भी जोड़ देने से खर्च 800 रुपये तक पहुंच जाएगा।