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अमवसा के मेले में ‘मूड़ै मूड़’
ब्यूरो/अमर उजाला, इलाहाबाद
Updated Wed, 21 Jan 2015 12:00 AM IST
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माघ मेले के तीसरे स्नानपर्व मौनी अमावस्या पर मंगलवार को संगम की रेती पर अद्भुत नजारा रहा। अमवसा के मेले में बस ‘मूड़ै मूड़’ दिखे। बीते दो स्नानपर्वों की अपेक्षा मौनी अमावस्या पर जहां संगम की रेती भरी पूरी रही, वहीं संगम की ओर जाने वाले सभी रास्तों पर श्रद्धालुओं का रेला रेंगता रहा। संगम सहित गंगा और यमुना के विभिन्न घाटों पर लाखों श्रद्धालुओं ने डुबकी लगाई। शंकराचार्यों, प्रमुख संतों और कल्पवासियों से इतर देश के कोने-कोने से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु डुबकी लगाकर पुण्यार्जन के लिए पहुंचे।
प्रशासन ने 90 लाख श्रद्धालुओं के स्नान करने का दावा किया। सवा नौ बजे के बाद मकर राशि में चंद्रमा के संचरण से बने शुभ मुहूर्त और मेहरबान मौसम का संयोग श्रद्धालुओं के लिए अनुकूल रहा। खिली धूप के साथ श्रद्धालुओं का सैलाब भी बढ़ता गया। भोर से ही शुरू हुआ स्नान का क्रम देर शाम तक जारी रहा। संगम सहित गंगा और यमुना पट्टी में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। घाटों की सुरक्षा पुलिस के अतिरिक्त आरएएफ और कमांडों के जिम्मे रही। संगम क्षेत्र सहित यमुना पट्टी में नावों का संचालन भी खूब हुआ जिससे श्रद्धालुओं विशेषकर बुजुर्गों या दूर दराज से आने वालों को सुविधा रही।
श्रद्धालुओं ने स्नान के बाद जल में ही खड़े होकर अर्घ्य और दुग्धदान के बाद घाट किनारे ही पूजा अर्चना की । गंगापुत्र घाटियों के यहां गोदान सहित यथाशक्ति दान-दक्षिणा दिया और तिलक-चंदन लगवाया। पूजा के बाद मन तृप्त हुआ तो घाट किनारे ही श्रद्धालुओं ने लाई लड्डू या हलुआ पूड़ी का प्रसाद लिया। साड़ी का छोर पकड़कर कपड़े सुखाते और मंगलगीत गाते हुए महिलाओं की टोली लौटी। संगम किनारे बने वाच टॉवर से तरह-तरह की सूचनाएं देकर स्नानार्थियों को सजग और नियंत्रित किया गया। अनेक श्रद्धालुओं ने गंगापुत्र घाटियों और तीर्थपुरोहितों की देखरेख में कई तरह के कर्मकांड भी कराए। श्रद्धालुओं ने बड़े हनुमान सहित घाट किनारे के मंदिरों में दर्शन और दान भी किया। वापसी में श्रद्धालु ‘पर्व के गंगाजल’ सहित लाई, इलाइचीदाना, कलाईनारा आदि संगम का प्रसाद ले जाना नहीं भूले।
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प्रशासन ने 90 लाख श्रद्धालुओं के स्नान करने का दावा किया। सवा नौ बजे के बाद मकर राशि में चंद्रमा के संचरण से बने शुभ मुहूर्त और मेहरबान मौसम का संयोग श्रद्धालुओं के लिए अनुकूल रहा। खिली धूप के साथ श्रद्धालुओं का सैलाब भी बढ़ता गया। भोर से ही शुरू हुआ स्नान का क्रम देर शाम तक जारी रहा। संगम सहित गंगा और यमुना पट्टी में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। घाटों की सुरक्षा पुलिस के अतिरिक्त आरएएफ और कमांडों के जिम्मे रही। संगम क्षेत्र सहित यमुना पट्टी में नावों का संचालन भी खूब हुआ जिससे श्रद्धालुओं विशेषकर बुजुर्गों या दूर दराज से आने वालों को सुविधा रही।
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श्रद्धालुओं ने स्नान के बाद जल में ही खड़े होकर अर्घ्य और दुग्धदान के बाद घाट किनारे ही पूजा अर्चना की । गंगापुत्र घाटियों के यहां गोदान सहित यथाशक्ति दान-दक्षिणा दिया और तिलक-चंदन लगवाया। पूजा के बाद मन तृप्त हुआ तो घाट किनारे ही श्रद्धालुओं ने लाई लड्डू या हलुआ पूड़ी का प्रसाद लिया। साड़ी का छोर पकड़कर कपड़े सुखाते और मंगलगीत गाते हुए महिलाओं की टोली लौटी। संगम किनारे बने वाच टॉवर से तरह-तरह की सूचनाएं देकर स्नानार्थियों को सजग और नियंत्रित किया गया। अनेक श्रद्धालुओं ने गंगापुत्र घाटियों और तीर्थपुरोहितों की देखरेख में कई तरह के कर्मकांड भी कराए। श्रद्धालुओं ने बड़े हनुमान सहित घाट किनारे के मंदिरों में दर्शन और दान भी किया। वापसी में श्रद्धालु ‘पर्व के गंगाजल’ सहित लाई, इलाइचीदाना, कलाईनारा आदि संगम का प्रसाद ले जाना नहीं भूले।
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