मालिनी अवस्थी ने कहा : लोक विधाओं के संरक्षण बिना कला-संस्कृति की बात अधूरी
एनसीजेडसीसी में 12 दिवसीय राष्ट्रीय शिल्प मेले के उद्घाटन के बाद बातचीत में लोक गायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने अपने अनुभवों को इसी तरह साझा किया। उन्होंने सांस्कृतिक गरिमा को धरोहर के रूप में सहेजने की जिम्मेदारी भी याद दिलाई।
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गंगा, यमुना, अदृश्य सरस्वती के संगम पर बसा प्रयागराज शहर नहीं एक संस्कार नगरी है। यह मिलन की भूमि अपने आप में एक अनूठी संस्कृति है। लोक संस्कृति की मिठास की जो बात यहां की माटी में है, वह कहीं और नहीं मिलती। यहां गलियों में बिताए पुराने दिनों की यादें ताजा कर लोक गायिका मालिनी अवस्थी भावुक हो उठीं। उन्होंने लोक विधाओं के लालित्य का जहां बखान किया, वहीं इनके संरक्षण के लिए ठोस कार्ययोजना बनाने की भी बात कही।
एनसीजेडसीसी में 12 दिवसीय राष्ट्रीय शिल्प मेले के उद्घाटन के बाद बातचीत में लोक गायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने अपने अनुभवों को इसी तरह साझा किया। उन्होंने सांस्कृतिक गरिमा को धरोहर के रूप में सहेजने की जिम्मेदारी भी याद दिलाई। साथ ही गायकी के अंदाज, दमकशी और जिंदादिली के साथ ही रागों की मलिका विद्याधरी बाई और ठमरी की मलिका रसूलन बाई को भी याद किया। उनका कहना था कि जब बिजली और साउंड का दौर नहीं था, तब भी कलाकारों ने राग और राज को अपनी दमकशी के बल पर ऊंचे मानकों पर स्थापित किया था।
उनका कहना था कि लोक संस्कृति की मिठास की तुलना किसी ने नहीं की जा सकती। ऐसे में कजरी, चैैती, बिरहा, आल्हा और कव्वाली जैसी विधाओं के संरक्षण पर ठोस काम किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि पहली बार 1989 में शादी के कुछ दिन बाद ही वह इसी शहर में आई थीं। तब उनके पति आईएएस अफसर अवनीश अवस्थी की पहली तैनाती इसी शहर में हुई थी। पति के साथ जार्ज टाउन में रहने और यहां की संस्कृति से जुड़ने, जीने का उन्हें भरपूर अवसर मिला।
मालिनी ने पुराने संस्मरणों को भी साझा करते हुए इस शहर की संस्कृति को रेखांकित किया। बताया कि शादी के बाद पहली बार जब वह अपने पति के साथ संगम पर नाव से गंगा दर्शन के लिए जा रही थीं, तब किसी बच्चे के मुंडन के लिए आए एक परिवार की महिलाओं ने उनके पांव की ताजी महावर देखकर पूछा था कि बिटिया हाल में ही शादी हुई है क्या? हां में सिर हिलाने पर उसी नाव पर उस परिवार की महिलाओं ने फिर से उनके पांव में महावर रचाकर मां गंगा से उनके लिए प्रार्थना की थी। उनका कहना था कि प्रयागराज शहर नहीं एक सुंदर संस्कृति है। इसे जितनी गहराई में उतर कर जिएंगे, उतना ही सुख मिलेगा।