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प्रयागराज में मां काली के रौद्र रूप की बंद कमरे में बचाई गई परंपरा
Wed, 21 Oct 2020 12:06 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Wed, 21 Oct 2020 12:06 PM IST
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नवरात्रि 2020
- फोटो : अमर उजाला
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कोविड-19 की वजह से सड़कों पर होने वाले कार्यक्रमों के स्थगित होने के बावजूद मंगलवार को आस्था, भक्ति और विश्वास के संगम में मां काली के प्राकट्य की परंपरा बचाने को लोग आगे आए। प्रतिबंधों के बीच जगविख्यात मां काली के प्राकट्य व रौद्र रूप प्रदर्शन की लीला देखते बनी। करीब 18 किमी तक शहर की सड़कों पर होने वाले मां काली के रौद्र रूप प्रदर्शन को नए रूप में मंचित कर परंपरा बचाई गई। पहले जहां इस लीला को देखने और मां की भुजाली से चोट खाने की भक्तों में होड़ रहती थी, वहीं इस बार दर्शकों को दूर रखा गया। सड़क मार्ग से प्रदर्शन करते हुए निकलने की बजाए काली मां का मुखौटा इस बार लीला स्थल से कार ले जाया गया। प्रयागराज में काली लीला का यह 105वां वर्ष था।
शृंगार भवन में खर-दूषण के वध की लीला के साथ ही शाम छह बजे मां काली का प्राकट्य हुआ। मां के प्रगट होते ही लीला कमेटी के पुरोहित और पुजारियों ने नींबू, नारियल और जायफल की बलि चढ़ाकर से विश्व शांति की कामना से उनकी पूजा की। पहले जहां प्राकट्य के बाद 18-20 किमी तक मां काली सड़कों पर भुजाली के साथ नृत्यमयी मुद्रा में भक्तों को दर्शन देती थीं।
यह लीला दारागंज की सड़कों पर रात भर होती थी, लेकिन इस बार शृंगार भवन के बंद कमरे में ही काली का प्रदर्शन बिना दर्शकों केही हुआ। काली नृत्य के बाद मां का मुखौटा कार से माधव यादव पहलवान के घर लाया गया। लीला के अन्य पात्र भी कार से ही पहुंचे। वहां, माधव पहलवान के पुत्र सोनू यादव ने मां काली को रक्त की बलि दी। इसके बाद मां काली के मुखौटे को नर मुंडों की माला पहनाई गई। फिर पुजारी ने मुंडों की माला और खप्पर, भुजाली, अस्त्र- शस्त्र पर अपने हाथ की उंगली काट कर रक्त अर्पित किया।
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शृंगार भवन में खर-दूषण के वध की लीला के साथ ही शाम छह बजे मां काली का प्राकट्य हुआ। मां के प्रगट होते ही लीला कमेटी के पुरोहित और पुजारियों ने नींबू, नारियल और जायफल की बलि चढ़ाकर से विश्व शांति की कामना से उनकी पूजा की। पहले जहां प्राकट्य के बाद 18-20 किमी तक मां काली सड़कों पर भुजाली के साथ नृत्यमयी मुद्रा में भक्तों को दर्शन देती थीं।
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यह लीला दारागंज की सड़कों पर रात भर होती थी, लेकिन इस बार शृंगार भवन के बंद कमरे में ही काली का प्रदर्शन बिना दर्शकों केही हुआ। काली नृत्य के बाद मां का मुखौटा कार से माधव यादव पहलवान के घर लाया गया। लीला के अन्य पात्र भी कार से ही पहुंचे। वहां, माधव पहलवान के पुत्र सोनू यादव ने मां काली को रक्त की बलि दी। इसके बाद मां काली के मुखौटे को नर मुंडों की माला पहनाई गई। फिर पुजारी ने मुंडों की माला और खप्पर, भुजाली, अस्त्र- शस्त्र पर अपने हाथ की उंगली काट कर रक्त अर्पित किया।
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