{"_id":"7d339b6546f97c4ff7563f204fafe310","slug":"lalla-urge-to-look-at-the-line-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"‘लल्ला’ की ललक में लग गई लाइन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
‘लल्ला’ की ललक में लग गई लाइन
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sat, 29 Aug 2015 01:45 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
इलाहाबाद। धर्म के आधार पर जारी जनसंख्या के ताजा आंकड़ों ने समाज की बदली हुई सोच पर नई बहस छेड़ दी है। बेटे और बेटी को लेकर तरह-तरह के तर्क और अलग-अलग सोच वाले समाज में थोड़ा बदलाव जरूर आया है लेकिन समाज के बड़े हिस्से में बतौर कुलदीपक बेटे की लालसा अब भी बनी हुई है। सौ परिवारों के सर्वे में ऐसे परिवारों की संख्या तकरीबन सत्तर फीसदी रही जिनमें या तो एक बेटे के बाद बेटी की चाह नहीं रही या फिर एक बेटे की चाह में कई बेटियों जन्मती रहीं।
अधिकतर हिन्दू परिवारों की इसी सोच का तकाजा है कि धार्मिक आधार पर जारी नए आंकड़ों के मुताबिक बेटी बचाने के मामले में हिन्दुओं की तुलना में देश के मुसलमान आगे हैं। राष्ट्रीय औसत के मुकाबले मुसलमानों में लिंगानुपात ज्यादा जबकि हिन्दुओं का कम है। मुसलमानों में लिंगानुपात प्रति हजार पुरुष पर 951 है जो वर्ष 2011 के प्रति पुरुष पर 940 महिलाओं के अनुपात के राष्ट्रीय औसत से 11 अधिक है। वहीं हिन्दुओं में यह अनुपात प्रति एक हजार पर 939 है, जो राष्ट्रीय औसत से एक कम है।
कई अभिभावकों ने संकोच के साथ तो कई ने दो टूक कहा, परिवार को आगे बढ़ाने केलिए एक बेटा तो चाहिए ही। किसी ने कहा, बेटियां तो पराया धन हैं। बुढ़ापे की सेवा, सुरक्षा और सहारा आखिर बेटा ही कर सकता है। कई परिवारों ने कहा, बेटियां घर का गहना हैं लेकिन वंश और परंपरा को बढ़ाने केलिए बेटा जरूरी है। मुखाग्नि देने से लेकर पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और अन्य धार्मिक अनुष्ठान तो बेटा ही करेगा। बस, यही वजहे हैं कि बेटे की चाहत में बेटियां जन्म लेती रहीं और परिवार बढ़ता गया। कई परिवारों ने तो एक बेटे के बाद ही ‘बस’ कह दिया।
विज्ञापन
मां-बाप में बेटे की चाहत की कई वजहें हैं। इसमें सबसे अहम कारण पारिवारिक संस्कार है। लोगों का मानना है कि बेटा ही उसे पूरा कर पाएगा। बुढ़ापे का सहारा बनने सहित वंश, परंपरा को आगे बढ़ाएगा। इसी तरह बेटियों को पराया धन मानने की सोच खत्म नहीं हुई है। दहेज और दूसरे के घर जाने जैसे कारण भी अहम हैं। बदलते समय के साथ ऐसी सोच में कमी आई है। नए मानक ने अवधारणाओं को तोड़ने में मदद की है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह अंतर धीरे-धीरे करके खत्म हो जाएगा।
0 प्रो.ए.सत्यनारायण
जाने-माने समाजशास्त्री और कुलपति, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
मां-बाप को सहारे की जरूरत
अक्सर लोग कहते हैं कि बेटे और बेटी में कोई अंतर नहीं है, यह तभी तक अच्छा लगता है कि जब तक बेटियों की शादी नहीं हो जाती। बेटियां तो शादी करके अपने घर चली जाती हैं इसके बाद मां-बाप को भी तो सहारे की जरूरत होती है। यही वजह है कि तीन बेटियों के बाद तक मेरे एक बेटा हो गया तो मैंने परिवार आगे नहीं बढ़ाया।
0 सुनील कुमार, प्रीतमनगर
बेटियों को जाना है ससुराल
इसमें कोई दो राय नहीं है कि आजकल बेटियों बेटों के बराबर खड़ी है। हर क्षेत्र में अपना नाम रोशन कर रहीं हैं, लेकिन एक न एक दिन तो बेटियों को ससुराल जाना ही पड़ता है। यह समाज की ही तो बनाई हुई रीति है। आप बेटियों से भले ही कितना पढ़ा लिखा लें, अपने से दूर तो उन्हें करना हो होगा। यही सोचकर दो बेटियां हो जाने के बाद भी परिवार आगे बढ़ाया।
0 अनवरी बेगम, मोहित्समगंज
क्या करें, समाज ही ऐसा है
हमारा सामाजिक ढांचा ही ऐसा है कि जिनके बेटे नहीं होते उन्हें देखने का लोगों के प्रति नजरिया ही अलग होता है। परिवार में अगर बेटे न हो तो यहीं कहा जाता है कि वंश आगे कौन बढ़ाएगा, एक बेटा तो होना ही चाहिए। समाज के इसी रवैये से परेशान होकर दो बेटियां होने के बाद भी हमने एक बेटे के लिए परिवार को आगे बढ़ाया।
0 रजनी पांडेय, नैनी
ससुरालवालों को चाहिए पोता
मेरे लिए बेटा-बेटी सभी बराबर है, लेकिन ससुराल वालों की चाहत थी कि बेटा भी होना चाहिए। इसलिए दो जुड़वा बेटियां होने के बाद भी ससुरालवालाेें की खातिर हमने परिवार को आगे बढ़ाया। तीसरा बच्चे के रूप में एक बेटी हुई, इसके बाद बेटा हुआ। ससुरालवालों की चाहत भी पूरी हो गई।
0 पूनम निगम, कीडगंज
विज्ञापन
अधिकतर हिन्दू परिवारों की इसी सोच का तकाजा है कि धार्मिक आधार पर जारी नए आंकड़ों के मुताबिक बेटी बचाने के मामले में हिन्दुओं की तुलना में देश के मुसलमान आगे हैं। राष्ट्रीय औसत के मुकाबले मुसलमानों में लिंगानुपात ज्यादा जबकि हिन्दुओं का कम है। मुसलमानों में लिंगानुपात प्रति हजार पुरुष पर 951 है जो वर्ष 2011 के प्रति पुरुष पर 940 महिलाओं के अनुपात के राष्ट्रीय औसत से 11 अधिक है। वहीं हिन्दुओं में यह अनुपात प्रति एक हजार पर 939 है, जो राष्ट्रीय औसत से एक कम है।
विज्ञापन
कई अभिभावकों ने संकोच के साथ तो कई ने दो टूक कहा, परिवार को आगे बढ़ाने केलिए एक बेटा तो चाहिए ही। किसी ने कहा, बेटियां तो पराया धन हैं। बुढ़ापे की सेवा, सुरक्षा और सहारा आखिर बेटा ही कर सकता है। कई परिवारों ने कहा, बेटियां घर का गहना हैं लेकिन वंश और परंपरा को बढ़ाने केलिए बेटा जरूरी है। मुखाग्नि देने से लेकर पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और अन्य धार्मिक अनुष्ठान तो बेटा ही करेगा। बस, यही वजहे हैं कि बेटे की चाहत में बेटियां जन्म लेती रहीं और परिवार बढ़ता गया। कई परिवारों ने तो एक बेटे के बाद ही ‘बस’ कह दिया।
विज्ञापन
मां-बाप में बेटे की चाहत की कई वजहें हैं। इसमें सबसे अहम कारण पारिवारिक संस्कार है। लोगों का मानना है कि बेटा ही उसे पूरा कर पाएगा। बुढ़ापे का सहारा बनने सहित वंश, परंपरा को आगे बढ़ाएगा। इसी तरह बेटियों को पराया धन मानने की सोच खत्म नहीं हुई है। दहेज और दूसरे के घर जाने जैसे कारण भी अहम हैं। बदलते समय के साथ ऐसी सोच में कमी आई है। नए मानक ने अवधारणाओं को तोड़ने में मदद की है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह अंतर धीरे-धीरे करके खत्म हो जाएगा।
0 प्रो.ए.सत्यनारायण
जाने-माने समाजशास्त्री और कुलपति, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
मां-बाप को सहारे की जरूरत
अक्सर लोग कहते हैं कि बेटे और बेटी में कोई अंतर नहीं है, यह तभी तक अच्छा लगता है कि जब तक बेटियों की शादी नहीं हो जाती। बेटियां तो शादी करके अपने घर चली जाती हैं इसके बाद मां-बाप को भी तो सहारे की जरूरत होती है। यही वजह है कि तीन बेटियों के बाद तक मेरे एक बेटा हो गया तो मैंने परिवार आगे नहीं बढ़ाया।
0 सुनील कुमार, प्रीतमनगर
बेटियों को जाना है ससुराल
इसमें कोई दो राय नहीं है कि आजकल बेटियों बेटों के बराबर खड़ी है। हर क्षेत्र में अपना नाम रोशन कर रहीं हैं, लेकिन एक न एक दिन तो बेटियों को ससुराल जाना ही पड़ता है। यह समाज की ही तो बनाई हुई रीति है। आप बेटियों से भले ही कितना पढ़ा लिखा लें, अपने से दूर तो उन्हें करना हो होगा। यही सोचकर दो बेटियां हो जाने के बाद भी परिवार आगे बढ़ाया।
0 अनवरी बेगम, मोहित्समगंज
क्या करें, समाज ही ऐसा है
हमारा सामाजिक ढांचा ही ऐसा है कि जिनके बेटे नहीं होते उन्हें देखने का लोगों के प्रति नजरिया ही अलग होता है। परिवार में अगर बेटे न हो तो यहीं कहा जाता है कि वंश आगे कौन बढ़ाएगा, एक बेटा तो होना ही चाहिए। समाज के इसी रवैये से परेशान होकर दो बेटियां होने के बाद भी हमने एक बेटे के लिए परिवार को आगे बढ़ाया।
0 रजनी पांडेय, नैनी
ससुरालवालों को चाहिए पोता
मेरे लिए बेटा-बेटी सभी बराबर है, लेकिन ससुराल वालों की चाहत थी कि बेटा भी होना चाहिए। इसलिए दो जुड़वा बेटियां होने के बाद भी ससुरालवालाेें की खातिर हमने परिवार को आगे बढ़ाया। तीसरा बच्चे के रूप में एक बेटी हुई, इसके बाद बेटा हुआ। ससुरालवालों की चाहत भी पूरी हो गई।
0 पूनम निगम, कीडगंज