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High Court: बिना सूचना स्कूल से 1220 दिन गैरहाजिर रही शिक्षिका को नहीं मिली राहत, सेवा में बहाली की मांग खारिज

Sat, 17 May 2025 03:56 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 17 May 2025 03:56 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बिना सूचना स्कूल से 1,220 दिन गैरहाजिर रही सहायक अध्यापिका की सेवा बहाली की मांग खारिज कर दी। कहा, विभागीय जांच में प्रक्रियागत चूक होने पर भी यह साबित करने का भार कर्मचारी पर ही होता है कि उसके साथ पूर्वाग्रह के कारण अन्याय हुआ है।

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It is the responsibility of the employee to prove bias despite lapses in departmental investigation
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बिना सूचना स्कूल से 1,220 दिन गैरहाजिर रही सहायक अध्यापिका की सेवा बहाली की मांग खारिज कर दी। कहा, विभागीय जांच में प्रक्रियागत चूक होने पर भी यह साबित करने का भार कर्मचारी पर ही होता है कि उसके साथ पूर्वाग्रह के कारण अन्याय हुआ है।

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यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की अदालत ने जालौन के प्राथमिक विद्यालय में तैनात रहीं सहायक अध्यापिका कृष्ण कांत गुप्ता की याचिका पर दिया है। याची 2004 से 2009 के बीच कुल 1,220 दिन तक बिना किसी स्वीकृत अवकाश के विद्यालय से अनुपस्थित रहीं। इस कारण दो जून 2010 को जालौन के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने उन्हें बर्खास्त कर दिया था।

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इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में उन्होंने दलील दी कि उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन और अपील) नियम, 1999 के तहत आरोप पत्र की जांच में उचित प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ। न जांच रिपोर्ट उपलब्ध कराई गई और न गवाहों के बयान दर्ज किए गए। लिहाजा, पूर्वाग्रह से ग्रसित बर्खास्तगी आदेश अवैध है। इसे रद्द किया जाना चाहिए।

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हाईकोर्ट ने शिक्षिका के कृत्य को माना गैरजिम्मेदाराना

राज्य सरकार के स्थायी अधिवक्ता ने तर्क दिया कि याची 2004 से 2009 के बीच 1,220 दिन बिना अवकाश स्वीकृत कराए अनुपस्थित रही। उसे जवाब देने के कई अवसर दिए गए। समाचार पत्र में नोटिस प्रकाशित किया गया। लेकिन, याची विभाग में न पेश हुई और न ही अनुपस्थिति का कोई स्पष्टीकरण दिया।

कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए सेवा समाप्ति के आदेश को रद्द करने से इन्कार कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्वाग्रह के परीक्षण के सिद्धांत का जिक्र किया। कहा कि यदि जांच में प्रक्रियात्मक चूक हुई हो तो भी याची को ही अपने साथ हुए अन्याय को साबित करना होता है। उसे ही साबित करना होगा कि पूर्वाग्रह के चलते उसे निष्पक्ष सुनवाई का अवसर नहीं मिला।

मौजूदा मामले में याची ने आरोपों का खंडन न किया और न ही गैरहाजिरी का संतोषजनक कारण बताया। इससे यह साबित होता है कि याची जानबूझकर अवकाश स्वीकृत कराए बिना करीब पांच साल तक विद्यालय से गायब रही। यह एक गैरजिम्मेदाराना हरकत है। लिहाजा, याची को शिक्षक के पद पर बने रहने का कोई हक नहीं है।

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