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छपे छपाए आदेश पत्रक पर सम्मन भेजना अवैध: हाईकोर्ट
Thu, 01 Oct 2020 08:23 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Thu, 01 Oct 2020 08:23 PM IST
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इलाहाबाद हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पहले से छपे छपाए आदेश पत्र पर रिक्त स्थान भर कर सम्मन जारी करना अवैध है। कोर्ट ने कहा कि अपराध का संज्ञान लेना और अभियुक्त को सम्मन जारी करना एक गंभीर न्यायिक प्रक्रिया है।
आदेश में यह दिखाई देना चाहिए कि मजिस्ट्रेट ने तथ्यों व विधिक प्रावधानों के आधार पर आदेश पारित किया है। पहले से मुद्रित प्रपत्र के खाली स्थान को भरकर न्यायिक विवेक का प्रयोग किए बगैर जारी सम्मन आदेश विधि विरुद्ध एवं न्यायिक मानदंडों के विपरीत है। कोर्ट ने कहा है कि ऐसे आदेश जारी करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। ऐसी प्रथा तत्काल रोक देनी चाहिए।
कोर्ट ने गाजियाबाद के न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा 20 जून 20 को जारी सम्मन को निरस्त कर दिया है और पत्रावली वापस करते हुए नए सिरे से आदेश पारित करने का निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने कविनगर थाना क्षेत्र के आशू रावत की याचिका पर दिया है। कोर्ट ने हिंदी में दिए गए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित विधि सिद्धांतों का उल्लेख किया है। कोर्ट ने कहा है कि मजिस्ट्रेट को आदेश पारित करते समय अपने न्यायिक विवेक का प्रयोग करना चाहिए।
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पहले से मुद्रित आदेश की खाली जगह भरकर दिए गए आदेश को विवेक का प्रयोग कर पारित आदेश नहीं माना जा सकता।
याची के खिलाफ सूचना तकनीकी कानून की धारा 67 व 67ए के तहत इस्तगासा दाखिल किया गया है। जिस पर मजिस्ट्रेट ने पहले से मुद्रित आदेश के खाली स्थान भर कर सम्मन जारी किया था। याचिका में मुकदमे व सम्मन दोनों को अवैध करार देते हुए रद्द करने की मांग की गई थी। कोर्ट ने अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग कर सम्मन आदेश को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया है।
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आदेश में यह दिखाई देना चाहिए कि मजिस्ट्रेट ने तथ्यों व विधिक प्रावधानों के आधार पर आदेश पारित किया है। पहले से मुद्रित प्रपत्र के खाली स्थान को भरकर न्यायिक विवेक का प्रयोग किए बगैर जारी सम्मन आदेश विधि विरुद्ध एवं न्यायिक मानदंडों के विपरीत है। कोर्ट ने कहा है कि ऐसे आदेश जारी करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। ऐसी प्रथा तत्काल रोक देनी चाहिए।
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कोर्ट ने गाजियाबाद के न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा 20 जून 20 को जारी सम्मन को निरस्त कर दिया है और पत्रावली वापस करते हुए नए सिरे से आदेश पारित करने का निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने कविनगर थाना क्षेत्र के आशू रावत की याचिका पर दिया है। कोर्ट ने हिंदी में दिए गए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित विधि सिद्धांतों का उल्लेख किया है। कोर्ट ने कहा है कि मजिस्ट्रेट को आदेश पारित करते समय अपने न्यायिक विवेक का प्रयोग करना चाहिए।
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पहले से मुद्रित आदेश की खाली जगह भरकर दिए गए आदेश को विवेक का प्रयोग कर पारित आदेश नहीं माना जा सकता।
याची के खिलाफ सूचना तकनीकी कानून की धारा 67 व 67ए के तहत इस्तगासा दाखिल किया गया है। जिस पर मजिस्ट्रेट ने पहले से मुद्रित आदेश के खाली स्थान भर कर सम्मन जारी किया था। याचिका में मुकदमे व सम्मन दोनों को अवैध करार देते हुए रद्द करने की मांग की गई थी। कोर्ट ने अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग कर सम्मन आदेश को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया है।