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स्कूलों में इंसपायर अभियान की निकली हवा
प्रयागराज
Updated Sat, 27 Oct 2018 06:56 PM IST
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गजब के अविष्कार
- फोटो : अमर उजाला
केंद्र एवं राज्य सरकार की ओर से इंसपायर कार्यक्रम के जरिये स्कूली छात्र-छात्राओं में विज्ञान के प्रति रुझान उत्पन्न करने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। स्कूलों में विज्ञान की पढ़ाई की सुविधा नहीं होने से बच्चों का रूझान गणित-विज्ञान में नहीं बढ़ रहा है। जिले के माध्यमिक विद्यालयों में प्रयोगशालाएं बदहाल स्थिति में हैं। स्कूली बच्चों को पूरे शैक्षिक सत्र प्रयोगशाला में नहीं भेजा जाता। सरकार से प्रयोगशाला के लिए मिलने वाला अनुदान विद्यालय के प्रधानाचार्य एवं प्रबंधन अपने खर्च में जोड़ रहे हैं। ऐसे में अभियान की हवा निकल गई है।
भारत सरकार के इंसपायर कार्यक्रम के जरिए दसवीं एवं बारहवीं के छात्रों को विज्ञान में शोध के क्षेत्र में आगे लाने की सरकार की मुहिम को विद्यालय ही चूना लगा रहे हैं। इन विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों को प्रयोग की व्यवस्था नहीं होने के कारण बच्चों को उपकरण तक की जानकारी नहीं हो पाती। यह बच्चे दसवीं और बारहवीं की पूरी पढ़ाई के दौरान प्रयोगशाला का मुंह तक नहीं देख पाते हैं। ऐसे में बच्चों को वैज्ञानिक बनाने की मुहिम कैसे सफल होगी, इस बारे में स्कूल के प्रधानाचार्य एवं शिक्षकों के पास कोई जवाब नहीं है। स्कूली बच्चों को पूरे शैक्षिक सत्र प्रयोगशाला में नहीं भेजा जाता।
सरकार से प्रयोगशाला के लिए मिलने वाला अनुदान विद्यालय के प्रधानाचार्य एवं प्रबंधन अपने खर्च में लगाकर मनमानी कर रहे हैं। इसी कारण से छात्र-छात्राओं का विज्ञान के प्रति रूझान विकसित नहीं हो रहा है। सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में पढ़ने वाले इन छात्रों के लिए विद्यालयों में प्रयोगशाला की व्यवस्था नहीं होने से प्रतिभाएं दम तोड़ती नजर आ रही है। शहर एवं गांव के स्कूलों में विज्ञान एवं गणित के शिक्षकों की कमी से विद्यार्थी पूरे शैक्षिक सत्र के दौरान प्रयोगशाला में नहीं जा पाता है। बारहवीं के प्रायोगिक परीक्षा से पहले कुछ गिनती के प्रैक्टिकल पूरे करवाकर स्कूल वाले बच्चों को परीक्षा पास करवा देते हैं। ऐसे में यह विद्यार्थी कैसे शोध के क्षेत्र में आगे आ पाएंगे।
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सीबीएसई-सीआईएससीई में मोटी फीस खर्च करने के बाद पढ़ाई करने वाले बच्चे दसवीं एवं बारहवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद इंजीनियरिंग-मेडिकल, सीए, एलएलबी आनर्स जैसे कोर्स का चुनाव कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त यूपी बोर्ड के स्कूलों से भी अच्छी मेरिट हासिल करने वाले मेधावी छात्र - छात्राएं भी इंजीनियरिंग - मेडिकल में प्रवेश लेकर अलग राह चुन लेते हैं। इसके साथ सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में पढ़ाई करने वाले मध्यम वर्ग के छात्र-छात्राएं ही इंजीनियरिंग - मेडिकल में प्रवेश नहीं पाने के कारण बीएससी - एमएससी की पढ़ाई करके शोध के क्षेत्र में जा रहे है। आरंभिक स्तर पर प्रयोग नहीं करने वाले विद्यार्थी सरकार की मंशा को पूरी नहीं कर पा रहे हैं।
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भारत सरकार के इंसपायर कार्यक्रम के जरिए दसवीं एवं बारहवीं के छात्रों को विज्ञान में शोध के क्षेत्र में आगे लाने की सरकार की मुहिम को विद्यालय ही चूना लगा रहे हैं। इन विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों को प्रयोग की व्यवस्था नहीं होने के कारण बच्चों को उपकरण तक की जानकारी नहीं हो पाती। यह बच्चे दसवीं और बारहवीं की पूरी पढ़ाई के दौरान प्रयोगशाला का मुंह तक नहीं देख पाते हैं। ऐसे में बच्चों को वैज्ञानिक बनाने की मुहिम कैसे सफल होगी, इस बारे में स्कूल के प्रधानाचार्य एवं शिक्षकों के पास कोई जवाब नहीं है। स्कूली बच्चों को पूरे शैक्षिक सत्र प्रयोगशाला में नहीं भेजा जाता।
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सरकार से प्रयोगशाला के लिए मिलने वाला अनुदान विद्यालय के प्रधानाचार्य एवं प्रबंधन अपने खर्च में लगाकर मनमानी कर रहे हैं। इसी कारण से छात्र-छात्राओं का विज्ञान के प्रति रूझान विकसित नहीं हो रहा है। सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में पढ़ने वाले इन छात्रों के लिए विद्यालयों में प्रयोगशाला की व्यवस्था नहीं होने से प्रतिभाएं दम तोड़ती नजर आ रही है। शहर एवं गांव के स्कूलों में विज्ञान एवं गणित के शिक्षकों की कमी से विद्यार्थी पूरे शैक्षिक सत्र के दौरान प्रयोगशाला में नहीं जा पाता है। बारहवीं के प्रायोगिक परीक्षा से पहले कुछ गिनती के प्रैक्टिकल पूरे करवाकर स्कूल वाले बच्चों को परीक्षा पास करवा देते हैं। ऐसे में यह विद्यार्थी कैसे शोध के क्षेत्र में आगे आ पाएंगे।
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सीबीएसई-सीआईएससीई में मोटी फीस खर्च करने के बाद पढ़ाई करने वाले बच्चे दसवीं एवं बारहवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद इंजीनियरिंग-मेडिकल, सीए, एलएलबी आनर्स जैसे कोर्स का चुनाव कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त यूपी बोर्ड के स्कूलों से भी अच्छी मेरिट हासिल करने वाले मेधावी छात्र - छात्राएं भी इंजीनियरिंग - मेडिकल में प्रवेश लेकर अलग राह चुन लेते हैं। इसके साथ सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में पढ़ाई करने वाले मध्यम वर्ग के छात्र-छात्राएं ही इंजीनियरिंग - मेडिकल में प्रवेश नहीं पाने के कारण बीएससी - एमएससी की पढ़ाई करके शोध के क्षेत्र में जा रहे है। आरंभिक स्तर पर प्रयोग नहीं करने वाले विद्यार्थी सरकार की मंशा को पूरी नहीं कर पा रहे हैं।