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High Court : जोड़े पति-पत्नी के रूप में रह रहे हैं तो गुजारा भत्ता के लिए शादी का सबूत बहुत जरूरी नहीं

Wed, 30 Jul 2025 10:50 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Wed, 30 Jul 2025 10:50 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी के रूप में कोई जोड़ा रह रहा है तो गुजारा भत्ता के मामले में शादी का सबूत बहुत जरूरी नहीं है। गुजारा भत्ता पक्षों के अधिकारों और दायित्वों को निर्धारित नहीं करता। यह सिर्फ उपेक्षित पत्नियों को संक्षिप्त राहत प्रदान करता है।

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If the couple is living as husband and wife, then proof of marriage is not very important for alimony
अदालत(सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी के रूप में कोई जोड़ा रह रहा है तो गुजारा भत्ता के मामले में शादी का सबूत बहुत जरूरी नहीं है। गुजारा भत्ता पक्षों के अधिकारों और दायित्वों को निर्धारित नहीं करता। यह सिर्फ उपेक्षित पत्नियों को संक्षिप्त राहत प्रदान करता है।

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कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के द्वारिका प्रसाद सतपथी बनाम विद्युत प्रभा दीक्षित के मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया। कहा कि गुजारा भत्ता की कार्यवाही में शादी का सबूत उतना सख्त नहीं है जितना कि पहली पत्नी या पति के रहते दूसरा विवाह करने के अपराध मामले में है। इस टिप्पणी संग कोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय फतेहपुर की ओर से पत्नी के पक्ष में गुजारा भत्ता देने के आदेश को बरकरार रखते हुए पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी। यह आदेश न्यायमूर्ति अनिल कुमार की पीठ ने फतेहपुर निवासी की याचिका पर दिया।

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याची की कथित पत्नी ने गुजारा भत्ता की मांग कर पारिवारिक न्यायालय में वाद दाखिल किया था। कोर्ट ने उसके पक्ष में 18 मार्च 2025 को आदेश पारित किया। इस आदेश के खिलाफ याची ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दाखिल की। याची के वकील ने दलील दी कि युवती ने शादी के दावे को साबित करने के लिए एक जाली निकाहनामा प्रस्तुत किया। साथ ही निकाह की तारीख बदलने और फर्जी हस्ताक्षर होने का आरोप लगाया।

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युवती के वकील ने दलील दी कि निकाहनामा पर याची के हस्ताक्षर हैं। याचिका में दायर उनकी आपत्तियों पर उनके हस्ताक्षर से मेल खाते हैं। कोर्ट ने कहा कि याची ने हस्ताक्षर को जाली होने का दावा किया है तो उसे साबित करने का दायित्व भी उसी पर था। उसे विशेषज्ञ से हस्ताक्षर की जांच करानी चाहिए थी। वह ऐसा करने में विफल रहे। रिकॉर्ड पर प्रथम दृष्टया पर्याप्त सबूत उपलब्ध थे जो शादी के तथ्य को साबित करते हैं। साथ ही कोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने से इन्कार दिया।

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