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मैं गुनहगार हूं मंजूर, मुझे करना माफ!
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sun, 24 Jul 2016 02:23 AM IST
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नीलाभ अश्क
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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हिन्दी के नामचीन कवि और अनुवादक नीलाभ बेहद प्रतिभाशाली लेकिन बेहद बेबाक भी थे। जिंदगी जीने का उनका अपना सलीका, अपना उसूल था। इससे उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। सो जिंदगी के सफर में छूपछांव का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा। इस सफर में तमाम गलतियां, गुनाह भी हुए, जिसे उन्होंने न सिर्फ स्वीकार बल्कि कुछ वक्त पहले लिखित रूप से उनके लिए माफी भी मांगी।
लिखित माफीनामे में उन्होंने कहा था, मुझे शिद्दत से इस बात का एहसास है कि इसे सही तरह से लिख कर पेश करने में ऐसी दुश्वारी होने वाली है. कुछ तो बातें ही ऐसी हैं कि काफी उलझी हुई हैं और ऊपर से इसका ताल्लुक किसी एक व्यक्ति से नहीं है, बल्कि यह एक समूचे सम्मानित परिवार के प्रति किये गये अशोभनीय व्यवहार से सम्बन्धित है।
बात को अनावश्यक रूप से लम्बा न खींच कर, संक्षेप में कहूं. जब जून 2013 में भूमिका और मेरी शादी हुई, तब भूमिका के पूरे परिवार, यहां तक उसकी मां को भी, इसकी जानकारी नहीं थी. मुझे तब यह एहसास नहीं था कि दुनिया में भूमिका के लिए उसकी मां देवी से भी ऊपर का दर्जा रखतीं हैं जैसा कि हर बच्चे के दिल में मां का रुतबा होता है। इसी तरह स्वाभाविक रूप से भूमिका की मां के लिए भी भूमिका से बढ़ कर दुनिया में कुछ भी नहीं है, और जब मैं यह कहता हूं कि नहीं है तो इसका मतलब है कि नहीं है। दोनों ही स्त्रियां मय अपने परिवार अपने संघर्ष में एक-दूसरे के साथ कुछ ऐसे जुटी रही हैं, जिसकी मिसाल दुर्लभ है.
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जाहिर है, जब विवाह के तीसरे दिन भूमिका की मां को पता चला तो पहली बार उन्हें जिन्दगी में अत्यन्त अप्रत्याशित धक्का लगा जो बिलकुल स्वाभाविक था। जिस धक्के से वे आज तक उबर नहीं पायीं हैं। ऊपर से मेरा अतीत तमाम तरह की भूल-गलतियों और महान कलंकों से भरा हुआ था, जिससे भूमिका भी पूरी तरह अनभिज्ञ थी। तिस पर भी, जब मैं और भूमिका शादी के बाद इलाहाबाद गये तो मांजी (यही अपनी सास को मैं कहता हूं) मेरे सिविल लाइन्स वाले दफ्तर में भूमिका के भाई शिवम के साथ आयीं और अपने धक्के को कहीं अन्दर छुपा कर उन्होंने वहां सबके सामने मुझे शगुन दिया और एक सोने की अंगूठी भी। उसी यात्रा में मांजी ने भूमिका और सबकी सुख-शान्ति के लिए समयामाई के मन्दिर में सत्यनारायण की कथा भी करवाई।
यहां यह भी बता दूं कि मेरे अतीत के उजागर होने के बाद जाहिरा तौर पर मैं और मेरा काला अतीत भूमिका और मांजी के लिए दुख का एक स्थायी कारण तो बन ही गया है। तो भी भूमिका ने अपने प्रयत्नों और अपने बड़े नामी परिवार के रुतबे के चलते मेरे अतीत के अनेक विपत्तियां, कलंक, झाड़-झंखाड़ साफ कर दिये। उस वक्त भी मांजी इलाहाबाद की एक अत्यन्त प्रतिष्ठित शिक्षण-संस्था में वरिष्ठ अध्यापिका और अपने विभाग की सर्वोच्च भी थीं.
इस बीच मैंने अंकुर विहार वाले मकान को अपनी इच्छा, सौजन्यता और भूमिका के प्रति प्रेम के कारण दो बार में उसके नाम कर दिया था ताकि वह सम्पत्ति की दृष्टि से सुरक्षित रहे।
इस बीच मेरे बारम्बार के आग्रह को मान कर, ग्रीष्मावकाश में मांजी भूमिका से मिलने हमारे घर आयीं। जैसा मैंने कहा, मांजी के लिए भूमिका की खुशी सर्वोपरि है. अब हुआ यह कि कभी जब वे भूमिका को दुखी देखें तो खुद को रोक न पायें और मुझे कुछ बातें कह दिया करें. वे बातें कई बार बेहद कड़वी भी थी और असहनीय भी।
मैं यह स्वीकार करूंगा कि इन बातों को पूरी तरह समझ न पाने के कारण मैं बजाय मिल-बैठ कर बातें करने के, मन में पूर्वाग्रह पाल बैठा। और एक दिन अपने भतीजे सेतु और वाणी प्रकाशन के मालिक श्री अरुण माहेश्वरी के साथ योजना बना कर पांच कारों में अपने सामान बांध कर बिना बताये घर छोड़ कर निकल भागा। मैंने भूमिका से कहा, ये सामान अश्क-ग्रन्थावली के हैं जो सेतु और मैं वाणी प्रकाशन के दफ्तर में रखने जा रहें हैं. जबकि मैंने वो सारे चुने हुए सामान अंकुर विहार से ले जा कर पहले से तय किराये के मकान पर रख दिये।
यह मेरी एक बड़ी भूल थी। चाहिए तो यह था कि मैं बैठ कर भूमिका और मांजी से बातें साफ कर लेता, घर के मतभेदों को घर ही के अन्दर सुलझा लेता. पर अपने अविवेकी आवेग, कथित रूप से आहत अहम और नासमझी के चलते, मैंने बातों को सार्वजनिक रूप से गलत ढंग से व्यक्त किया. बार-बार व्यक्त किया, हर जगह कहा।
मेरे पलायन के बाद मेरा पता लगाने के लिए स्वाभाविक रूप से भूमिका ने थाने में एक रपट भी लिखायी थी कि मेरा अपहरण हो गया है। इसके जवाब में एक गृहस्थ की तरह व्यवहार करने की बजाय मैंने मांजी पर फिर से एक घृणित, झूठा और गन्दा आरोप लगाया कि वे मुझे जान से मारना चाहतीं हैं फिर जब मैं पुलिस की सहायता से अपनी कार वापस लेने गया तो बजाय मांजी का प्रस्ताव मानने के, कि हम ऊपर घर पर चल कर बैठ कर शिकायतें दूर कर लें, मैंने मुहल्ले भर के सामने एक अच्छा-खासा अभद्र दृश्य उपस्थित किया. जिससे भूमिका का हाथ भी तोड़ बैठा.
यही नहीं, आने वाले महीनों में मैं मांजी पर तमाम तरह के अनर्गल आरोप लगाता रहा कि वे और भूमिका मेरे मकान की इच्छुक थीं। जबकि स्थिति जैसा कि अब मैं सही जानने लगा हूं मांजी के लिए मेरा मकान मिट्टी से ज्यादा कुछ नहीं है, वे सिर्फ एक चीज चाहती हैं, हर कीमत पर भूमिका की खुशी और यह कभी नहीं बदलने वाला. वे तो मेरे घर से भागते ही मेरे उस मकान से, जिसे मैं कानूनी रूप से भूमिका को दे चुका हूं, तत्काल छोड़ कर चलीं गयीं, और आज भी दिल्ली के नाम से ही भड़क उठतीं हैं.
पर यह तो अब की बात है. उस समय तो मैं तमाम तरह के अविवेकी पूर्वाग्रहों से भरा हुआ था। मैंने यह तक न सोचा कि जब मेरी मां नहीं थी, और पदेन मेरी सास मेरी मां की जगह थीं तो मेरे इस व्यवहार ने उन्हें कितनी चोट पहुंची होगी. क्या उन्हें अपनी मां की जगह बैठाना और वही आदर देना उचित न होता? यह भी एहसास मैं न कर पाया कि दुनिया की कोई भी मां ऐसा ही कहती और करती जैसा मांजी कह कर रही थीं, जब उनकी काबिल बेटी बिना उनसे पूछे और बिना बताये भी मुझ जैसे एक बदनाम वृद्ध से शादी कर लेती. वह बेटी जो रात आठ बजे के बाद हौस्टल से बाहर पांव नहीं निकालती थी और दिल्ली से दूर बैठी उसकी मां इस बात की तस्दीक कर के ही सोने जाती थी। उसकी मां ने तो इस मेधावी बेटी को दिल्ली पढ़ने भी उसकी (पूर्व मन्त्री त्रिवेदी परिवार से) सगाई होने के बाद ही भेजा था। मुझे यह मानने में कोई हिचक नहीं कि अगर मेरी मां जिंदा होतीं और मैंने ऐसा व्यवहार किया होता तो उसने मुझे घर से निकाल दिया होता।
मेरी मां कोई लम्बे-चौड़े कद की औरत नहीं थी. मैंने उसे कभी ऊंचे स्वर में बोलते नहीं सुना. पर जो भी वह कह्ती थी अपने बेहद धीमे स्वर में इस्पात की-सी दृढ़ता से कहती थी. तेरह साल की उम्र में अनाथ हो जाने वाली इस औरत को उसके देवता-तुल्य सबसे छोटे मामा ने पाला था और संस्कार दिये थे. विपदा और जीवन की कठिनाइयों से लड़ कर इस औरत ने सिर्फ 13 साल की उमर से दोबारा पढाई शुरू की, अपने जीवट से प्रधानाध्यापिका और फौज में कमिशन्ड अफसर बनी, पति को टीबी की चंगुलों से छुड़ा लायी और कोई अनुभव न होते हुए भी हिन्दी की पहली महिला प्रकाशक बनी।
इस क्रम में मेरी मां ने जिंदगी के कुछ उसूल बनाये थे, जो वह कड़ाई से लागू करती थी और मुझे बचपन से सिखाती आयी थी. मसलन, अगर किसी ने तुम्हारे साथ तुम्हारे दुर्दिन में दुर्व्यवहार किया हो और संयोग से वह अपने दुर्दिन पर तुम्हारे दुआरे आये तो उसके साथ उपकार करने से बड़ा कोई प्रतिशोध नहीं, क्योंकि उसी के जैसा व्यवहार करना जलन को जीवित रखना है, जिससे कोई प्रतिशोध नहीं होता। अगर आपको किसी से असहमत भी होना है तो सौजन्य-सम्मत परस्पर मनभावन तरीके से असहमत होना चाहिए। और अन्त में वह सुनहरा दोहा ‘देखन को हरसें नहीं, नैनन नहीं सनेह, तुलसी वहां न जाइये, कंचन बरसें मेह।
अब पीछे देखते हुए मुझे हैरत होती है कि अपने अविवेकी आवेग में मैं यह सब कैसे भूल बैठा. क्या यह अपनी मां की स्मृति और सीख के प्रति ?द्दारी नहीं थी, और अक्षम्य भी। इससे भी ज्यादा वह अभद्र, अशोभनीय और अविवेकी व्यवहार था जो मैंने उस निऱ्स्पृह महिला के प्रति किया जिसे मैंने मांजी कहा था.
विडम्बना देखिए कि जिसके प्रति मैंने यह अक्षम्य व्यवहार किया और उसके और उसकी जान से प्यारी बेटी के बीच दीवार बना, वह मेरी बीमारी में दूर बैठी दुर्गाकवच और कई विघ्नहर्ता पाठ कर रही है कि मैं स्वस्थ हो जाऊं, बेहतरीन खड़ाऊं भेज रही है कि मुझे नंगे पैर न चलना पड़े या असुविधापूर्ण जूते न पहनने पड़े। और यह सब इसलिए कि मांजी के लिए भूमिका की खुशी केन्द्र में है और शायद भूमिका की खूशी मैं हूं।
पर अक्षम्य अपराध, अक्षम्य होते हैं, उनका कोई दण्ड भी नहीं होता, सिवा अपराधी के पछतावे की आग में जलने के, क्योंकि जो अशोभनीयताएं हो चुकी है, उन्हें ब्लैक बोर्ड पर लिखे हुए की तरह मिटाया नहीं जा सकता. मैं मांजी से कई बार जबानी फोन पर माफी मांग चुका हूं और हर बार उन्होंने यही कहा है कि वे मुझसे नाराज नहीं, पर मैं जानता हूं कि चोट मैंने उन्हें बेहिसाब पहुंचायी है। चूंकि मैंने मांजी को चोट सार्वजनिक रूप से पहुंचायी है, इसलिए पछतावे और अपने अपराध-बोध का पहला तरीका यही है कि मैं सार्वजनिक माफी मांगूं और यह अर्जी उनके चरणों में रख दूं. सो कर रहा हूं. इलाहाबाद जा कर भी मैं उन्हें मनाने की हरसम्भव कोशिश करूंगा. क्योंकि यह उन्हीं की बेटी और उन्हीं का दिया संस्कार है जो इस वक्त मेरी बुरी बीमारी और बुरे हाल में भी मेरा साथ दे रहा है, मेरी इतनी सेवा कर रहा है।
आगे के कदमों के बारे में मैं अभी कुछ सोच नहीं पाया हूं. मेरी मां की तरह मांजी का जीवन भी संघर्षों से भरा रहा है और वैसी ही इस्पाती दृ?ता उनमें भी है. चुनांचे, यह अर्जी उनके चरणों में पड़ी रहेगी। वैसे मैं उनसे एकाधिक बार अनुरोध और आग्रह कर चुका हूं कि वे हमारे साथ आ कर रहें , लेकिन उन्होंने यह अनुरोध स्वीकार नहीं किया. कारण प्रकट है, मुझ पर उनका भरोसा टूट चुका है और टूटा भरोसा टूटे कांच की तरह होता है. समूचा कांच ही बदलना पड़ता है. मुझे खुद को ही बदलना पडे़गा। फिलहाल पहले कदम के तौर पर यह सार्वजनिक क्षमा याचना पेश है. अगले कदमों के बारे में सोचता रहूंगा।
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लिखित माफीनामे में उन्होंने कहा था, मुझे शिद्दत से इस बात का एहसास है कि इसे सही तरह से लिख कर पेश करने में ऐसी दुश्वारी होने वाली है. कुछ तो बातें ही ऐसी हैं कि काफी उलझी हुई हैं और ऊपर से इसका ताल्लुक किसी एक व्यक्ति से नहीं है, बल्कि यह एक समूचे सम्मानित परिवार के प्रति किये गये अशोभनीय व्यवहार से सम्बन्धित है।
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बात को अनावश्यक रूप से लम्बा न खींच कर, संक्षेप में कहूं. जब जून 2013 में भूमिका और मेरी शादी हुई, तब भूमिका के पूरे परिवार, यहां तक उसकी मां को भी, इसकी जानकारी नहीं थी. मुझे तब यह एहसास नहीं था कि दुनिया में भूमिका के लिए उसकी मां देवी से भी ऊपर का दर्जा रखतीं हैं जैसा कि हर बच्चे के दिल में मां का रुतबा होता है। इसी तरह स्वाभाविक रूप से भूमिका की मां के लिए भी भूमिका से बढ़ कर दुनिया में कुछ भी नहीं है, और जब मैं यह कहता हूं कि नहीं है तो इसका मतलब है कि नहीं है। दोनों ही स्त्रियां मय अपने परिवार अपने संघर्ष में एक-दूसरे के साथ कुछ ऐसे जुटी रही हैं, जिसकी मिसाल दुर्लभ है.
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यहां यह भी बता दूं कि मेरे अतीत के उजागर होने के बाद जाहिरा तौर पर मैं और मेरा काला अतीत भूमिका और मांजी के लिए दुख का एक स्थायी कारण तो बन ही गया है। तो भी भूमिका ने अपने प्रयत्नों और अपने बड़े नामी परिवार के रुतबे के चलते मेरे अतीत के अनेक विपत्तियां, कलंक, झाड़-झंखाड़ साफ कर दिये। उस वक्त भी मांजी इलाहाबाद की एक अत्यन्त प्रतिष्ठित शिक्षण-संस्था में वरिष्ठ अध्यापिका और अपने विभाग की सर्वोच्च भी थीं.
इस बीच मैंने अंकुर विहार वाले मकान को अपनी इच्छा, सौजन्यता और भूमिका के प्रति प्रेम के कारण दो बार में उसके नाम कर दिया था ताकि वह सम्पत्ति की दृष्टि से सुरक्षित रहे।
इस बीच मेरे बारम्बार के आग्रह को मान कर, ग्रीष्मावकाश में मांजी भूमिका से मिलने हमारे घर आयीं। जैसा मैंने कहा, मांजी के लिए भूमिका की खुशी सर्वोपरि है. अब हुआ यह कि कभी जब वे भूमिका को दुखी देखें तो खुद को रोक न पायें और मुझे कुछ बातें कह दिया करें. वे बातें कई बार बेहद कड़वी भी थी और असहनीय भी।
मैं यह स्वीकार करूंगा कि इन बातों को पूरी तरह समझ न पाने के कारण मैं बजाय मिल-बैठ कर बातें करने के, मन में पूर्वाग्रह पाल बैठा। और एक दिन अपने भतीजे सेतु और वाणी प्रकाशन के मालिक श्री अरुण माहेश्वरी के साथ योजना बना कर पांच कारों में अपने सामान बांध कर बिना बताये घर छोड़ कर निकल भागा। मैंने भूमिका से कहा, ये सामान अश्क-ग्रन्थावली के हैं जो सेतु और मैं वाणी प्रकाशन के दफ्तर में रखने जा रहें हैं. जबकि मैंने वो सारे चुने हुए सामान अंकुर विहार से ले जा कर पहले से तय किराये के मकान पर रख दिये।
यह मेरी एक बड़ी भूल थी। चाहिए तो यह था कि मैं बैठ कर भूमिका और मांजी से बातें साफ कर लेता, घर के मतभेदों को घर ही के अन्दर सुलझा लेता. पर अपने अविवेकी आवेग, कथित रूप से आहत अहम और नासमझी के चलते, मैंने बातों को सार्वजनिक रूप से गलत ढंग से व्यक्त किया. बार-बार व्यक्त किया, हर जगह कहा।
मेरे पलायन के बाद मेरा पता लगाने के लिए स्वाभाविक रूप से भूमिका ने थाने में एक रपट भी लिखायी थी कि मेरा अपहरण हो गया है। इसके जवाब में एक गृहस्थ की तरह व्यवहार करने की बजाय मैंने मांजी पर फिर से एक घृणित, झूठा और गन्दा आरोप लगाया कि वे मुझे जान से मारना चाहतीं हैं फिर जब मैं पुलिस की सहायता से अपनी कार वापस लेने गया तो बजाय मांजी का प्रस्ताव मानने के, कि हम ऊपर घर पर चल कर बैठ कर शिकायतें दूर कर लें, मैंने मुहल्ले भर के सामने एक अच्छा-खासा अभद्र दृश्य उपस्थित किया. जिससे भूमिका का हाथ भी तोड़ बैठा.
यही नहीं, आने वाले महीनों में मैं मांजी पर तमाम तरह के अनर्गल आरोप लगाता रहा कि वे और भूमिका मेरे मकान की इच्छुक थीं। जबकि स्थिति जैसा कि अब मैं सही जानने लगा हूं मांजी के लिए मेरा मकान मिट्टी से ज्यादा कुछ नहीं है, वे सिर्फ एक चीज चाहती हैं, हर कीमत पर भूमिका की खुशी और यह कभी नहीं बदलने वाला. वे तो मेरे घर से भागते ही मेरे उस मकान से, जिसे मैं कानूनी रूप से भूमिका को दे चुका हूं, तत्काल छोड़ कर चलीं गयीं, और आज भी दिल्ली के नाम से ही भड़क उठतीं हैं.
पर यह तो अब की बात है. उस समय तो मैं तमाम तरह के अविवेकी पूर्वाग्रहों से भरा हुआ था। मैंने यह तक न सोचा कि जब मेरी मां नहीं थी, और पदेन मेरी सास मेरी मां की जगह थीं तो मेरे इस व्यवहार ने उन्हें कितनी चोट पहुंची होगी. क्या उन्हें अपनी मां की जगह बैठाना और वही आदर देना उचित न होता? यह भी एहसास मैं न कर पाया कि दुनिया की कोई भी मां ऐसा ही कहती और करती जैसा मांजी कह कर रही थीं, जब उनकी काबिल बेटी बिना उनसे पूछे और बिना बताये भी मुझ जैसे एक बदनाम वृद्ध से शादी कर लेती. वह बेटी जो रात आठ बजे के बाद हौस्टल से बाहर पांव नहीं निकालती थी और दिल्ली से दूर बैठी उसकी मां इस बात की तस्दीक कर के ही सोने जाती थी। उसकी मां ने तो इस मेधावी बेटी को दिल्ली पढ़ने भी उसकी (पूर्व मन्त्री त्रिवेदी परिवार से) सगाई होने के बाद ही भेजा था। मुझे यह मानने में कोई हिचक नहीं कि अगर मेरी मां जिंदा होतीं और मैंने ऐसा व्यवहार किया होता तो उसने मुझे घर से निकाल दिया होता।
मेरी मां कोई लम्बे-चौड़े कद की औरत नहीं थी. मैंने उसे कभी ऊंचे स्वर में बोलते नहीं सुना. पर जो भी वह कह्ती थी अपने बेहद धीमे स्वर में इस्पात की-सी दृढ़ता से कहती थी. तेरह साल की उम्र में अनाथ हो जाने वाली इस औरत को उसके देवता-तुल्य सबसे छोटे मामा ने पाला था और संस्कार दिये थे. विपदा और जीवन की कठिनाइयों से लड़ कर इस औरत ने सिर्फ 13 साल की उमर से दोबारा पढाई शुरू की, अपने जीवट से प्रधानाध्यापिका और फौज में कमिशन्ड अफसर बनी, पति को टीबी की चंगुलों से छुड़ा लायी और कोई अनुभव न होते हुए भी हिन्दी की पहली महिला प्रकाशक बनी।
इस क्रम में मेरी मां ने जिंदगी के कुछ उसूल बनाये थे, जो वह कड़ाई से लागू करती थी और मुझे बचपन से सिखाती आयी थी. मसलन, अगर किसी ने तुम्हारे साथ तुम्हारे दुर्दिन में दुर्व्यवहार किया हो और संयोग से वह अपने दुर्दिन पर तुम्हारे दुआरे आये तो उसके साथ उपकार करने से बड़ा कोई प्रतिशोध नहीं, क्योंकि उसी के जैसा व्यवहार करना जलन को जीवित रखना है, जिससे कोई प्रतिशोध नहीं होता। अगर आपको किसी से असहमत भी होना है तो सौजन्य-सम्मत परस्पर मनभावन तरीके से असहमत होना चाहिए। और अन्त में वह सुनहरा दोहा ‘देखन को हरसें नहीं, नैनन नहीं सनेह, तुलसी वहां न जाइये, कंचन बरसें मेह।
अब पीछे देखते हुए मुझे हैरत होती है कि अपने अविवेकी आवेग में मैं यह सब कैसे भूल बैठा. क्या यह अपनी मां की स्मृति और सीख के प्रति ?द्दारी नहीं थी, और अक्षम्य भी। इससे भी ज्यादा वह अभद्र, अशोभनीय और अविवेकी व्यवहार था जो मैंने उस निऱ्स्पृह महिला के प्रति किया जिसे मैंने मांजी कहा था.
विडम्बना देखिए कि जिसके प्रति मैंने यह अक्षम्य व्यवहार किया और उसके और उसकी जान से प्यारी बेटी के बीच दीवार बना, वह मेरी बीमारी में दूर बैठी दुर्गाकवच और कई विघ्नहर्ता पाठ कर रही है कि मैं स्वस्थ हो जाऊं, बेहतरीन खड़ाऊं भेज रही है कि मुझे नंगे पैर न चलना पड़े या असुविधापूर्ण जूते न पहनने पड़े। और यह सब इसलिए कि मांजी के लिए भूमिका की खुशी केन्द्र में है और शायद भूमिका की खूशी मैं हूं।
पर अक्षम्य अपराध, अक्षम्य होते हैं, उनका कोई दण्ड भी नहीं होता, सिवा अपराधी के पछतावे की आग में जलने के, क्योंकि जो अशोभनीयताएं हो चुकी है, उन्हें ब्लैक बोर्ड पर लिखे हुए की तरह मिटाया नहीं जा सकता. मैं मांजी से कई बार जबानी फोन पर माफी मांग चुका हूं और हर बार उन्होंने यही कहा है कि वे मुझसे नाराज नहीं, पर मैं जानता हूं कि चोट मैंने उन्हें बेहिसाब पहुंचायी है। चूंकि मैंने मांजी को चोट सार्वजनिक रूप से पहुंचायी है, इसलिए पछतावे और अपने अपराध-बोध का पहला तरीका यही है कि मैं सार्वजनिक माफी मांगूं और यह अर्जी उनके चरणों में रख दूं. सो कर रहा हूं. इलाहाबाद जा कर भी मैं उन्हें मनाने की हरसम्भव कोशिश करूंगा. क्योंकि यह उन्हीं की बेटी और उन्हीं का दिया संस्कार है जो इस वक्त मेरी बुरी बीमारी और बुरे हाल में भी मेरा साथ दे रहा है, मेरी इतनी सेवा कर रहा है।
आगे के कदमों के बारे में मैं अभी कुछ सोच नहीं पाया हूं. मेरी मां की तरह मांजी का जीवन भी संघर्षों से भरा रहा है और वैसी ही इस्पाती दृ?ता उनमें भी है. चुनांचे, यह अर्जी उनके चरणों में पड़ी रहेगी। वैसे मैं उनसे एकाधिक बार अनुरोध और आग्रह कर चुका हूं कि वे हमारे साथ आ कर रहें , लेकिन उन्होंने यह अनुरोध स्वीकार नहीं किया. कारण प्रकट है, मुझ पर उनका भरोसा टूट चुका है और टूटा भरोसा टूटे कांच की तरह होता है. समूचा कांच ही बदलना पड़ता है. मुझे खुद को ही बदलना पडे़गा। फिलहाल पहले कदम के तौर पर यह सार्वजनिक क्षमा याचना पेश है. अगले कदमों के बारे में सोचता रहूंगा।