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जिंक फॉस्फाइड जैसा जहर पिलाने के दौरान विरोध न हो और संघर्ष के निशान न मिलें, कैसे हो सकता : कोर्ट

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 06 Jul 2026 02:14 AM IST
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How is it possible to administer a poison like zinc phosphide without encountering resistance or leaving signs of a struggle. Court
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जिंक फॉस्फाइड का स्वाद बेहद कड़वा होता है। इसे आसानी से नहीं पिलाया जा सकता है। यदि जबरन दिया गया होता तो मरने या पिलाने वाले के शरीर पर संघर्ष के निशान होते, लेकिन रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा, न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने दहेज हत्या के तीन आरोपियों को बरी कर दिया।
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कानपुर नगर निवासी विजय लक्ष्मी की 1984 में राकेश से शादी हुई थी। महाराजपुर थाने में 13 जनवरी 1986 को विवाहिता के भाई ने एफआईआर दर्ज कराई। आरोप लगाया कि ससुरालवाले जहरीला पदार्थ पिलाकर विवाहिता की हत्या कर दी। बाद में विसरा जांच में जिंक फॉस्फाइड मिलने की बात सामने आई थी।
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ट्रायल कोर्ट ने पति राकेश कुमार, ससुर राम औतार, जेठ लड्डन उर्फ महेश और सास राजदेई को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। अपील लंबित रहने के दौरान सास राजदेई की मृत्यु हो गई।
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हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन के प्रमुख गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खाते। पोस्टमार्टम के बाद विसरा किसकी अभिरक्षा में रहा, उसे सुरक्षित कैसे रखा गया और फॉरेंसिक प्रयोगशाला तक किस प्रकार पहुंचाया गया। इसकी पूरी शृंखला अभियोजन साबित नहीं कर सका। कोर्ट ने यह भी कहा कि जिस विसरा रिपोर्ट के आधार पर अभियोजन ने हत्या का आरोप साबित करने का प्रयास किया, उसे सुनवाई के दौरान आरोपियों के समक्ष धारा-313 सीआरपीसी के तहत रखा ही नहीं गया। ऐसी स्थिति में उस रिपोर्ट को उनके विरुद्ध साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
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