होली आई रे: गुरु मन बउरही पतंग जइसा उड़ै लगा है, लोकनाथ बाबा चल पड़े है भांग अउर सिलौटी लेके
ई शहर तरह-तरह की होली देखिस है। ऐसन-ऐसन होली की तबियतै हरी होय जाए। हरि परसाद चउरसिया भी बहुतै याद करत हैं। जउन बांसुरी की टेर टेरत रहें लोकनाथ, रानीमंडी, अतरसुइया सब गुलजार होइ जात रहा। बामची पतंग जइसा चेहरा लइकर जब ऊ ठहाका लगावत रहे तो बूढ़ा बरगदौ हिल जात रहा।
विस्तार
गुरु मन बउरही पतंग जइसा उड़ै लगा है। देहियां टूटे लगी है। बतिया साफ है, होली आय रही है। लोकनाथ बाबा चल पड़े हैं भांग अउर सिलउटी लेके चउराहे पर। बसंत से ई गुदगुदी चालू होइ जात है। हवा पूरे सरीर में चिकोटी बोय रही है। आपन इलाहाबाद की होली तो जग परसिद्ध है। जावत भई जवानी भी भांय-भांय कर रही है। गली-कूंचन में सांय-सांय कर रही है। चउचक होलिका सजी भई है चारों कैती।
ई शहर तरह-तरह की होली देखिस है। ऐसन-ऐसन होली की तबियतै हरी होय जाए। हरि परसाद चउरसिया भी बहुतै याद करत हैं। जउन बांसुरी की टेर टेरत रहें लोकनाथ, रानीमंडी, अतरसुइया सब गुलजार होइ जात रहा। बामची पतंग जइसा चेहरा लइकर जब ऊ ठहाका लगावत रहे तो बूढ़ा बरगदौ हिल जात रहा। हमारे बच्चन जी कविता-कहानी भुलाइ के गले में ढोल पहिनकर नचनिया अस जीरो रोड पर अगरवाल कालिज के नजदीकै गावत, झूमत, नाचत दिख जात रहैं। अउर गनवा भी कउन सा, अरे वही, सरउता कहां भूल आए प्यारे ननदोइया...।
अब ननदोइया बिचारे का करें। टुकुर-टुकुर मुंह ताकैं अउर कउनों जवाबै न सूझै। जानसेनगंज चउराहे से मुंडा इक्का करके निकले भइया होली की टोली। गाय-भैंस की सानी, पानी वाली चरही लबालब रहै अउर बड़े-बड़े विदवान ओमा गोता लगावैं। कैसन तो होली रही आपन इलाहाबाद की, जौन अब परयागराज बोला जात है। अपनी बड़वार कबितरी महादेवियव एक रंग में रंग जात रहीं। एक बात बताईं, हमार बियाह भी वही कराइन रहीं। हमार सादी का कारड भी वही लिखिन रहीं। एख बार भरी होली में बड़का गोला भांग का जमाइ के उनकर घर हमहूं पहुंच गए अउर भइया कउनो बात पे हंसी आय गई। अब आय गई तो आय गई, रुकबै न करै।
अब महादेवी जी हैरान-परेशान। पूछैं लगलीं कि हम काहे हंसित है। उनके पूछै पर अउर हंसी आवै लगी। हम अउर हंसै लगे तो भइया नाराज होय गईं, अउर बोलीं कि जाने होते कि लरिका ई रंग-ढंग का है तो काहे अपनी बिटिया एसे बियाहते। लेकिन, गुरु महादेवी तो महादेवी, हमरी सास से बोलीं कि जाइके एका इमली की चटनी चटावा, तब एकर नसा उतरी। ई तो संकर जी का परसाद लिए बा।
अइसा गुलाल उड़त रहा हमार सहर में कि सारा मलाल दूर होइ जात रहा। महालंठ सम्मेलन होत रहा, जेमें बड़े-बड़े लंठ आवत रहें। हमार बाबूजी उमाकांत मालवीय अउर बाद में कैलास गौतम ऊ कारकिरम का संचालन करत रहे। जगदीस गुप्त, लक्ष्मीकांत वर्मा, श्यामनाथ कक्कड़, सारे बड़वार मनई ओमा आवत रहे। तेरा का होई कालिया, कहत भए कालिया जी भी आवत रहे। साथ में ममता आंटी भी रहत रहीं। अउर थोड़े दिन बाद तो बूटी जमाय के अखाड़े में बाबा अभय अवस्थी कूद पड़ेन। हुड़दंग शुरू होइ गवा।
जामवंत का भेस धरे चच्चा रफीक सदानी भी आलू, टमाटर की माला पहिने मंच पर बिराजै लगे और पढ़ै लगे- जियो बहादुर खद्दरधारी या फिर जब नगीचे चुनाव आवत है, भात मांगत पुलाव आवत है। एक जने एक बार हमरे रति चाचा से बोले कि आजकल अस्लीलता बहुतै बढ़ गई है, तो रति चाचा जवाब दिहिन कि का भयवा।़होली के कारिकरम में का सुंदरकांड का पाठ होई। चाहे जौन कह लो। फुचाड़े पे फुचाड़ा और बिजली के तार पर इस्टमैन कलर की रउनक देखके जिया गाजर होइ जात है।
एक रहीं हमरी मिसराइन चाची। बड़े-बड़े होरियारन के धोबिया पछाड़ लगाय देत रहीं। गोर-गोर उज्जर-उज्जर रंग पे जब लाल रंग चढ़ै तो हेमा मालिनी फेल। चुनरिया जइसे असमान सिर पर उठाय ले। साली, सलहज, भउजाई, मामी सबकी सब दिलफेंक पर मजाल कि कोई चटौ कर ले। आग बबूला होइ जात रहीं, लेकिन सब जानत रहे कि ई नकली गुस्सा है।
एक बात भुलात रही कि कउनो बुरा नहीं मानत रहा। भले ओकी खटिया तखत सब होलिका में भसम होय जाय। एख जने बसंत पंचमी लगी नहीं कि रसीद काटब शुरू। घर-घर कुंडी खटकावै अउर चंदा मांगै, उनका नामै पड़ गवा रहा चंदा मामा। एक जने रहे तो गली से गुजरैं तो नेम पलेट पढ़-पढ़ के सात पुश्तन से नाता जोड़ैं, तब तो कउनौ बुरा न मानै। सब कहैं कि भाई होली में तो ई सब चलतै है। पर आजकर होलियौ में लोगन के नाक पर सुपाड़ी फूटै लगी है। लोग लोहे के फाटक पर अलीगढ़ी ताला लगाय के अंडरगराउंड होय जात हैं, फिर संझै के निकलत हैं सजे-धजे।
कुच्छौ हो, लोकनाथ आजव आपन ससहर की होली जगाए भवा है। अउर तो अउर ठठेरी बाजार में तिरसके दिन भी रंग चलत है। हम तो यही कामना करित है कि हमार सहर की होली का विकास-पिकास की नजर ना लगै। जय होलिका मइया...।