Holi 2024 : उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में होलिका दहन मंगलकारी, रंगों का त्योहार सोमवार को
रविवार की सुबह 9:55 बजे ही पूर्णिमा लग जाएगी। फाल्गुन पूर्णिमा 25 मार्च की दोपहर 12:30 बजे तक है। जबकि, रविवार की रात 10:30 बजे भद्रा उतरेगा। ज्योतिषाचार्य पं. ब्रजेंद्र मिश्र के मुताबिक भद्राकाल में होलिका दहन वर्जित है। ऐसे में भद्रा उतरने के बाद ही होलिका दहन करना फलदायी रहेगा। इस बार उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में होलिका दहन मंगलकारी माना जा रहा है।
विस्तार
अरसा बाद इस बार रविवार को फाल्गुन मास की पूर्णिमा देर रात तक भद्राकाल से युक्त रहेगी। भद्राकाल के बाद पूर्णिमा में होलिका दहन होगा। शहर से ग्राम्यांचलों तक तिराहों, चौराहों से लेकर सार्वजनिक स्थानों पर स्थापित होलिकाओं में वर्ष भर के कष्टों, विकारों को जलाने की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। इस बार होलिका में लोग विकारों-कष्टों की पोटलियां जलाएंगे। शुभ मुहूर्त में हवन-पूजन के साथ होलिका दहन किया जाएगा। सोमवार को रंगोत्सव पर्व पर संगमनगरी में रंगों की बौछार मचेगी।
रविवार की सुबह 9:55 बजे ही पूर्णिमा लग जाएगी। फाल्गुन पूर्णिमा 25 मार्च की दोपहर 12:30 बजे तक है। जबकि, रविवार की रात 10:30 बजे भद्रा उतरेगा। ज्योतिषाचार्य पं. ब्रजेंद्र मिश्र के मुताबिक भद्राकाल में होलिका दहन वर्जित है। ऐसे में भद्रा उतरने के बाद ही होलिका दहन करना फलदायी रहेगा। इस बार उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में होलिका दहन मंगलकारी माना जा रहा है।
महीने भर से शहर के हर मोहल्ले में स्थापित बुराई की प्रतीक होलिकाएं शनिवार की देर शाम तक लकड़ी और उपले से ऊंची की जाती रहीं। रविवार की शाम लोग घर-घर से होलिकाओं में विकारों को जलाने निकलेंगे। पुरोहितों की ओर से हवन-पूजन के बाद होलिकाओं में आग लगाई जाएगी। इसके बाद सोमवार को रंगों की होली खेली जाएगी।
भक्त प्रह्लाद से जुड़ी है होलिका दहन की परंपरा
मान्यता के अनुसार होलिका दहन की परंपरा पौराणिक काल में हिरण्यकश्यप राजा से जुड़ी हुई है। ज्योतिषाचार्य मंजरी पाठक बताती हैं कि किसी समय राजा हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को भगवान विष्णु की भक्ति से रोकने की कोशिश की थी। लेकिन, जब प्रह्लाद की भक्ति और गाढ़ी होती गई तब उसने अपनी बहन होलिका की गोद में अपने पुत्र को जलाकर मार डालने की योजना बनाई थी। होलिका को वरदान था कि आग लगने पर वह नहीं जल सकती थी। लेकिन, प्रह्लाद को गोद में लेकर बैठने के बाद वह खुद जल गई और भगवान ने अपने भक्त को बचा लिया था। तभी सो होलिका दहन की परंपरा सनातन संस्कृति में ऊंचे मानकों पर स्थापित है।