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हिंदी को संवारा-सजाया, दिग्गजों को रास्ता भी दिखाया
ब्यूरो/अमर उजाला इलाहाबाद
Updated Sat, 09 May 2015 02:10 AM IST
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इलाहाबाद। साहित्य में हिंदी का प्रयोग भारतेंदु युग से ही शुरू हो गया था लेकिन गद्य की रचनाएं हिंदी खड़ी बोली और काव्य की रचनाएं ब्रज भाषा में हुआ करती थीं लेकिन आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी को परिष्कृत रूप दिया और व्याकरणबद्ध किया। आचार्य द्विवेदी ने 1903 में सरस्वती पत्रिका के संपादन की शुरुआत की और तत्कालीन रचनाकारों की मान्यताओं को बड़ी ही शालीनता से बदल दिया। कविताएं हिंदी में लिखी जाने लगीं। गद्य की रचना का परिदृश्य भी बदल गया।
आचार्य द्विवेदी का इलाहाबाद से सीधा जुड़ाव सरस्वती पत्रिका के संपादन के साथ शुरू हुआ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रो. मुश्ताक अली बताते हैं कि द्विवेदी इलाहाबाद में लगातार नहीं रहे लेकिन जब वह यहां आते थे तो इंडियन प्रेस के संस्थापक सीवाई चिंतामणि के यहां रुका करते थे। उनका जन्म रायबरेली जिले केदौलतपुर गांव में संवत् 1921 वैशाख शुक्ल चार (नौ मई 1864) को हुआ। शुरूआती शिक्षा गांव के मदरसे में हुई। हाईस्कूल में अंग्रेजी में पढ़ाई करने केलिए उन्नाव केपुरवा कस्बे में एंग्लो वर्नाक्यूलर टाउन, इसके फतेहपुर और फिर उन्नाव गए। इसके बाद वह अपने पिता के पास बंबई चले गए।
दोस्तों के कहने पर रेलवे में नौकरी कर ली। रेलवे में नौकरी के दौरान अजमेर, हर्दा, खंडवा, हुशंगाबाद, इटारसी, जबलपुर, कानपुर, झांसी सहित कई जिलों में विभिन्न पदों पर उनकी तैनाती रही। फि बाबू श्याम सुंदरदास की सलाह पर आचार्य द्विवेदी को सरस्वती पत्रिका का संपादन सौंपा गया। इसी केसाथ ही हिंदी साहित्य में द्विवेदी युग की शुरूआत हो गई। वह हिंदी केसाथ अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू, फारसी, बांग्ला सहित कई भाषाओं केजानकार थे।
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आचार्य द्विवेदी ने 1905 में ‘भाषा और व्याकरण’ नामक शीर्षक से एक लेख लिखा, जिसमें उन्होंने कहा कि बहुत समय से हिंदी भाषा लिखी जा रही है, पर उसका एक भी सर्वमान्य व्याकरण अभी तक नहीं बना है। इसका परिणाम है कि पचास वर्ष पुरानी भाषा आजकल की भाषा से मेल नहीं खाती। एक लेखक एक तरह से लिखता है तो दूसरा लेखक दूसरी तरह से। इसी तरह अखबारों की भाषा भी मेल नहीं खाती है। इससे हिंदी भाषा को अनस्थिरता प्राप्त हो गई है और बहुत संभव है कि यही दशा बनी रही तो आज से सौ साल बाद के लोग आजकल की भाषा केबहुत से वाक्यों को नहीं समझ सकें।
उनके दो योग्य उत्तराधिकारी पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी और पंडित देवी दत्त शुक्ल कहते हैं कि हिंदी साहित्य में द्विवेदी युग न होता तो आज हिंदी न जाने किस रूप में होती। आचार्य द्विवेदी की बदौलत हिंदी समुन्नत है। उन्हाेंने इसे साहित्यिक रूप देकर, लोकव्यापी बनाया। राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त, मुंशी प्रेमचंद, संपादकाचार्य पंडित बाबूराव विष्णु पराड़कर ने उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को एतिहासिक करार दिया था।
- आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की ‘काव्यमंजूषा’ नामक पुस्तक में कई कविताएं प्रकाशित हुईं। ‘कुमारसम्भवसार’, ‘नैषधचरितचर्चा’, ‘विक्रमांकदेवचरतचर्चा’, ‘कालिदास की निरंकुशता’, संपत्ति शास्त्र, नामक पुस्तकें लिखीं। जॉन स्टुअर्ट मिल की ‘लिबर्टी’ की अनुवादित पुस्तक ‘स्वाधीनता’ एवं तत्ववेत्ता हर्बट स्पेंसर की ‘एजुकेशन’ नामक अनुवादित पुस्तक ‘शिक्षा’ भी उन्हीं रचना में शामिल है। इसके अलावा महाभारत, रघुवंश, लार्ड बेकन के मुख्य निबंधों का अनुवाद उन्होंने बेकनविचाररत्नावली नामक पुस्तक में किया। इविवि के प्रो. मुश्ताक अहमद के मुताबिक आचार्य द्विवेदी ने कुल 150 गद्य एवं कविताओं की रचना की।
आधुनिक हिंदी खड़ी बोली के लब्ध प्रतिष्ठित सरस्वती पत्रिका के जरिये आचार्य द्विवेदी ने हिंदी को जो योगदान दिया वह अतुलनीय है। उन्होंने सरस्वती को एक मानक के रूप में स्थापित किया। यहां तक कि महाप्राण निराला की मुक्त छंद की एक कविता ‘जूही की कली’ को भी उन्होंने लौटा दिया था। दरअसल, जो कोई भी द्विवेदी के मानक पर खरा नहीं उतरता था उसे वह सजह ही अस्वीकार कर देते थे।
नरेश मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार
हिंदी की खड़ी बोली को आचार्य द्विवेदी ने ऐसा अद्भुत मानक दिया कि उसने हिंदी खड़ी बोली को संवार दिया। आचार्य द्विवेदी ने हिंदी खड़ी बोली को मानकी कृत रूप दिया। आचार्य द्विवेदी के पहले कविता की भाषा ब्रज थी लेकिन उन्होंने कविता के लिए भी खड़ी बोली का प्रयोग शुरू किया। उन्होंने कवियों को समसामयिक समस्याओं पर भी कलम चलाने की प्रेरणा दी। पुराने विषयों को भी समसामयिकता से जोड़ा।
प्रो. राजेंद्र कुमार, वरिष्ठ आलोचक
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी युग प्रवर्तक साहित्यकार हैं। वस्तुत: उन्होंने हिंदी साहित्य की कई पीढ़ियों को परिमार्जित किया। उनकी पत्रिका सरस्वती को सही मायनों में गंगा और यमुना के साथ अदृश्य सरस्वती कहा जा सकता है। सरस्वती के बहाने उन्होंने हिंदी साहित्य के क्षेत्र में अद्भुत योगदान दिया। उन्होंने हिंदी साहित्य को एक नई परिभाषा दी।
यश मालवीय, सुपरिचित गीतकार
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपने लेखन और संपादन से हिंदी खड़ी बोली को संवारने का अद्भुत काम किया। उन्होंने साहित्य को संस्कारित किया। उनका सबसे बड़ा योगदान यह कि उन्होंने अपने समय के महत्वपूर्ण लेखकों, रचनाकारों को पहचानकर हिंदी जगत से उनका परिचय कराया। उन्होंने साहित्य मेें साहित्य से इतर विषयों को भी जगह दी।
अजामिल, वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार
‘आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेजी की प्रवृत्ति प्रारंभ से ही साहित्य की ओर थी। इसके पूर्व हिंदी साहत्य में भाषा का प्रयोग अव्यवस्थित रूप में होता था। व्याकरण की त्रुटियां प्राय: सर्वत्र मिला करती थीं। संवत 1960 में उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर इंडियन प्रेस इलाहाबाद से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका सरस्वती का संपादन भार ग्रहण कर लिया था। यह समय हिंदी साहित्य के इतिहास में एक युग प्रवर्तक वर्ष के रूप में जाना जाता है। ऐसे महा आचार्य को हमारा कोटि-कोटि प्रमाण।’
पृथ्वीनाथ पांडेय, साहित्यकार
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आचार्य द्विवेदी का इलाहाबाद से सीधा जुड़ाव सरस्वती पत्रिका के संपादन के साथ शुरू हुआ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रो. मुश्ताक अली बताते हैं कि द्विवेदी इलाहाबाद में लगातार नहीं रहे लेकिन जब वह यहां आते थे तो इंडियन प्रेस के संस्थापक सीवाई चिंतामणि के यहां रुका करते थे। उनका जन्म रायबरेली जिले केदौलतपुर गांव में संवत् 1921 वैशाख शुक्ल चार (नौ मई 1864) को हुआ। शुरूआती शिक्षा गांव के मदरसे में हुई। हाईस्कूल में अंग्रेजी में पढ़ाई करने केलिए उन्नाव केपुरवा कस्बे में एंग्लो वर्नाक्यूलर टाउन, इसके फतेहपुर और फिर उन्नाव गए। इसके बाद वह अपने पिता के पास बंबई चले गए।
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दोस्तों के कहने पर रेलवे में नौकरी कर ली। रेलवे में नौकरी के दौरान अजमेर, हर्दा, खंडवा, हुशंगाबाद, इटारसी, जबलपुर, कानपुर, झांसी सहित कई जिलों में विभिन्न पदों पर उनकी तैनाती रही। फि बाबू श्याम सुंदरदास की सलाह पर आचार्य द्विवेदी को सरस्वती पत्रिका का संपादन सौंपा गया। इसी केसाथ ही हिंदी साहित्य में द्विवेदी युग की शुरूआत हो गई। वह हिंदी केसाथ अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू, फारसी, बांग्ला सहित कई भाषाओं केजानकार थे।
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आचार्य द्विवेदी ने 1905 में ‘भाषा और व्याकरण’ नामक शीर्षक से एक लेख लिखा, जिसमें उन्होंने कहा कि बहुत समय से हिंदी भाषा लिखी जा रही है, पर उसका एक भी सर्वमान्य व्याकरण अभी तक नहीं बना है। इसका परिणाम है कि पचास वर्ष पुरानी भाषा आजकल की भाषा से मेल नहीं खाती। एक लेखक एक तरह से लिखता है तो दूसरा लेखक दूसरी तरह से। इसी तरह अखबारों की भाषा भी मेल नहीं खाती है। इससे हिंदी भाषा को अनस्थिरता प्राप्त हो गई है और बहुत संभव है कि यही दशा बनी रही तो आज से सौ साल बाद के लोग आजकल की भाषा केबहुत से वाक्यों को नहीं समझ सकें।
उनके दो योग्य उत्तराधिकारी पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी और पंडित देवी दत्त शुक्ल कहते हैं कि हिंदी साहित्य में द्विवेदी युग न होता तो आज हिंदी न जाने किस रूप में होती। आचार्य द्विवेदी की बदौलत हिंदी समुन्नत है। उन्हाेंने इसे साहित्यिक रूप देकर, लोकव्यापी बनाया। राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त, मुंशी प्रेमचंद, संपादकाचार्य पंडित बाबूराव विष्णु पराड़कर ने उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को एतिहासिक करार दिया था।
- आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की ‘काव्यमंजूषा’ नामक पुस्तक में कई कविताएं प्रकाशित हुईं। ‘कुमारसम्भवसार’, ‘नैषधचरितचर्चा’, ‘विक्रमांकदेवचरतचर्चा’, ‘कालिदास की निरंकुशता’, संपत्ति शास्त्र, नामक पुस्तकें लिखीं। जॉन स्टुअर्ट मिल की ‘लिबर्टी’ की अनुवादित पुस्तक ‘स्वाधीनता’ एवं तत्ववेत्ता हर्बट स्पेंसर की ‘एजुकेशन’ नामक अनुवादित पुस्तक ‘शिक्षा’ भी उन्हीं रचना में शामिल है। इसके अलावा महाभारत, रघुवंश, लार्ड बेकन के मुख्य निबंधों का अनुवाद उन्होंने बेकनविचाररत्नावली नामक पुस्तक में किया। इविवि के प्रो. मुश्ताक अहमद के मुताबिक आचार्य द्विवेदी ने कुल 150 गद्य एवं कविताओं की रचना की।
आधुनिक हिंदी खड़ी बोली के लब्ध प्रतिष्ठित सरस्वती पत्रिका के जरिये आचार्य द्विवेदी ने हिंदी को जो योगदान दिया वह अतुलनीय है। उन्होंने सरस्वती को एक मानक के रूप में स्थापित किया। यहां तक कि महाप्राण निराला की मुक्त छंद की एक कविता ‘जूही की कली’ को भी उन्होंने लौटा दिया था। दरअसल, जो कोई भी द्विवेदी के मानक पर खरा नहीं उतरता था उसे वह सजह ही अस्वीकार कर देते थे।
नरेश मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार
हिंदी की खड़ी बोली को आचार्य द्विवेदी ने ऐसा अद्भुत मानक दिया कि उसने हिंदी खड़ी बोली को संवार दिया। आचार्य द्विवेदी ने हिंदी खड़ी बोली को मानकी कृत रूप दिया। आचार्य द्विवेदी के पहले कविता की भाषा ब्रज थी लेकिन उन्होंने कविता के लिए भी खड़ी बोली का प्रयोग शुरू किया। उन्होंने कवियों को समसामयिक समस्याओं पर भी कलम चलाने की प्रेरणा दी। पुराने विषयों को भी समसामयिकता से जोड़ा।
प्रो. राजेंद्र कुमार, वरिष्ठ आलोचक
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी युग प्रवर्तक साहित्यकार हैं। वस्तुत: उन्होंने हिंदी साहित्य की कई पीढ़ियों को परिमार्जित किया। उनकी पत्रिका सरस्वती को सही मायनों में गंगा और यमुना के साथ अदृश्य सरस्वती कहा जा सकता है। सरस्वती के बहाने उन्होंने हिंदी साहित्य के क्षेत्र में अद्भुत योगदान दिया। उन्होंने हिंदी साहित्य को एक नई परिभाषा दी।
यश मालवीय, सुपरिचित गीतकार
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपने लेखन और संपादन से हिंदी खड़ी बोली को संवारने का अद्भुत काम किया। उन्होंने साहित्य को संस्कारित किया। उनका सबसे बड़ा योगदान यह कि उन्होंने अपने समय के महत्वपूर्ण लेखकों, रचनाकारों को पहचानकर हिंदी जगत से उनका परिचय कराया। उन्होंने साहित्य मेें साहित्य से इतर विषयों को भी जगह दी।
अजामिल, वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार
‘आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेजी की प्रवृत्ति प्रारंभ से ही साहित्य की ओर थी। इसके पूर्व हिंदी साहत्य में भाषा का प्रयोग अव्यवस्थित रूप में होता था। व्याकरण की त्रुटियां प्राय: सर्वत्र मिला करती थीं। संवत 1960 में उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर इंडियन प्रेस इलाहाबाद से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका सरस्वती का संपादन भार ग्रहण कर लिया था। यह समय हिंदी साहित्य के इतिहास में एक युग प्रवर्तक वर्ष के रूप में जाना जाता है। ऐसे महा आचार्य को हमारा कोटि-कोटि प्रमाण।’
पृथ्वीनाथ पांडेय, साहित्यकार