हाईकोर्ट : भगवान शिव पर अपमानजनक टिप्पणी करने वाले को नहीं मिली राहत, डिवाइडर को शिवलिंग बताकर उड़ाया था मजाक
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसल का जिक्र करते हुए इस बात पर जोर दिया कि बोलने की स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है और इसे दूसरों की भावनाओं का उल्लंघन करने के लाइसेंस के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। वर्तमान मामले में शिवलिंग पर की गई टिप्पणी स्पष्ट रूप से दूसरे समुदाय की धार्मिक भावनाओं के प्रति दुर्भावनापूर्ण इरादे को दर्शाती है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोशल मीडिया पर भगवान शिव की अपमानजनक तस्वीरें पोस्ट कर अपमान करने के आरोपी की मुकदमे रद्द करने की अर्जी को अस्वीकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि धार्मिक भावना नागरिकों के लिए अत्यधिक महत्व रखती है। इन भावनाओं को अपमानित करना व्यक्तियों की गरिमा और धार्मिक मान्यताओं का अपमान है।
धार्मिक मान्यताओं का मजाक और उपहास करना हमारे लोकतांत्रिक समाज के मूलभूत मूल्यों को कमजोर करते हैं। ऐसे में न्यायपालिका का दायित्व है कि वह संदेश दे कि इस तरह के आचरण को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और उचित कानूनी परिणाम भुगतने होंगे। कोर्ट ने आगे कहा कि धार्मिक मान्यताओं को बदनाम करना या अपमान करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग है। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की कोर्ट ने यह टिप्पणी की।मामले में ओवैस खान पर चार जून 2022 को पुलिस स्टेशन छर्रा, जिला अलीगढ़ में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के आरोप में मुकदमा दर्ज किया गया था।
आरोप है कि सोशल मीडिया पर आरोपी ने जानबूझकर भगवान शिव की अपमान जनक तस्वीरें पोस्ट की थीं। उन्होंने सड़क पर बने डिवाइडर को शिवलिंग बताते हुए उपहास किया था। साथ ही हिंदू समाज पर अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया था। ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में संज्ञान लेते हुए समन जारी किया है। आरोपी ने दर्ज मुकदमों और ट्रायलकोर्ट के कार्रवाई को रद्द करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल की।
याची के वकील ने कहा- मोबाइल हैक कर की गई थी पोस्ट
आवेदक के वकील ने कहा कि आवेदक को झूठा फंसाया गया है, क्योंकि उसने खुद टिप्पणी पोस्ट नहीं की है, बल्कि यह टिप्पणी उसके अकाउंट को हैक करने के बाद की गई है। आगे कहा कि कथित टिप्पणी कोई अपराध नहीं है, बल्कि यह एक सहज बयान है। आवेदक के खिलाफ कोई प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता है और इसलिए शुरू की गई सभी कार्यवाही रद्द कर दी जानी चाहिए। वहीं, अपर शासकीय अधिवक्ता शशिधर पांडे ने आवेदन का पुरजोर विरोध किया और तर्क दिया कि जांच के बाद इस मामले में आरोप पत्र दायर किया गया है। कहा कि आवेदक की टिप्पणी अपमानजनक थी और इससे धार्मिक भावना को ठेस पहुंची थी। इसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
बोलने की स्वतंत्रता का इस्तेमाल दूसरे के अपमान के लिए नहीं हो सकता
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसल का जिक्र किया, जिसमें इस बात पर जोर दिया कि बोलने की स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है और इसे दूसरों की भावनाओं का उल्लंघन करने के लाइसेंस के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। आगे कहा कि वर्तमान मामले में शिवलिंग पर की गई टिप्पणी स्पष्ट रूप से आवेदक द्वारा दूसरे समुदाय की धार्मिक भावनाओं के प्रति दुर्भावनापूर्ण इरादे को दर्शाती है। इस तरह की कार्रवाई को भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत निहित अधिकार का जामा नहीं पहनाया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि मुकदमा पूरी तरह से गुण-दोष के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए, इसलिए, सीआरपीसी की धारा 482 के तहत दायर तत्काल आवेदन पर विचार नहीं किया जा सकता है और आवेदन खारिज कर दिया।