हाईकोर्ट ने कहा : मीसाबंदी राजनीतिक बंदी, न कि अपराधी, 92 वर्षीय सेनानी को डीएम जारी करें प्रमाणपत्र
यह फैसला न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति सुरेंद्र सिंह प्रथम की खंडपीठ ने हमीरपुर जिला में आपातकाल के दौरान मीसा बंदी रहे 92 वर्षीय कांग्रेसी नेता रहे मो. राशिद खान की ओर से लोकतंत्र सेनानी सम्मान का प्रमाणपत्र जारी करने की मांग वाली याचिका को स्वीकार करते हुए सुनाया।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि आपातकाल के दौरान मीसा बंदी राजनीतिक बंदी थे, न कि अपराधी। उन्हें लोकतंत्र सेनानी सम्मान अधिनियम के अंतर्गत मिलने वाले लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि उन्हें देश की आंतरिक सुरक्षा कायम रखने के लिए जेल भेजा गया था।
यह फैसला न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति सुरेंद्र सिंह प्रथम की खंडपीठ ने हमीरपुर जिला में आपातकाल के दौरान मीसा बंदी रहे 92 वर्षीय कांग्रेसी नेता रहे मो. राशिद खान की ओर से लोकतंत्र सेनानी सम्मान का प्रमाणपत्र जारी करने की मांग वाली याचिका को स्वीकार करते हुए सुनाया।
महोबा निवासी मो. राशिद खान को 1975 में लागू आपातकाल के दौरान सरकार ने मीसा कानून के तहत हमीरपुर की जिला जेल में 23 जुलाई 1976 से 5 मार्च 1977 तक निरुद्ध किया था। 5 मार्च 1977 को उन्हें पैरोल पर रिहा किया गया। फिर, मीसा कानून खत्म हो गया और दोबारा जेल नहीं जाना पड़ा।
सपा सरकार ने दिया था लोकतंत्र सेनानी का दर्जा
2016 में अखिलेश सरकार ने मीसा बंदियों को लोकतंत्र सेनानी का दर्जा दे दिया। इसके बाद राशिद ने डीएम हमीरपुर के समक्ष प्रमाणपत्र जारी करने की अर्जी दी, लेकिन जेल में रहने के कारण दागी बताते हुए डीएम ने प्रमाणपत्र देने से मना कर दिया। इसके खिलाफ वह 2019 में हाईकोर्ट पहुंचे।
अधिवक्ता मनीष द्विवेदी ने दलील दी कि याची राजनीतिक बंदी था। उन्हें ''''खराब चरित्र'''' के लिए आंतरिक सुरक्षा रखरखाव अधिनियम, 1971 के तहत पकड़ा गया था। यह अधिनियम सियासी आधार के अलावा हिरासत में लिए गए किसी भी व्यक्ति पर लागू नहीं होता। कोर्ट ने दलील मानते हुए कहा कि डीएम और मंडलायुक्त चित्रकूट धाम के आदेश में राजनीतिक विरोध-प्रदर्शन के अलावा अन्य मामले का कोई साक्ष्य नहीं है। कोर्ट ने याची को तीन महीने के भीतर प्रमाणपत्र जारी करते हुए सभी लाभ देने का आदेश दिया।