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हाईकोर्ट : मेडिकल बोर्ड के दिव्यांगता प्रतिशत कम आकलन पर आरक्षण नहीं छीन सकते
Mon, 14 Sep 2026 03:23 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Mon, 14 Sep 2026 03:23 PM IST
सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि मेडिकल बोर्ड की ओर से दिव्यांगता का प्रतिशत कम आकलन करने के आधार पर अभ्यर्थी को आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता, जब सक्षम प्राधिकारी की ओर से जारी दिव्यांगता प्रमाणपत्र कायम है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट।
- फोटो : अमर उजाला।
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि मेडिकल बोर्ड की ओर से दिव्यांगता का प्रतिशत कम आकलन करने के आधार पर अभ्यर्थी को आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता, जब सक्षम प्राधिकारी की ओर से जारी दिव्यांगता प्रमाणपत्र कायम है। कोर्ट ने नीट-यूजी 2026 के एक अभ्यर्थी को उसके दिव्यांगता प्रमाणपत्र के आधार पर आरक्षण श्रेणी में सीट के लिए दावा करने की अनुमति दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने महाराजगंज निवासी आलोक कुमार गुप्ता की याचिका पर दिया।
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याची के पास 30 जून 2025 को जारी स्थायी दिव्यांगता प्रमाणपत्र था। इसमें उसे मानसिक बीमारी के कारण 55 प्रतिशत दिव्यांग बताया गया था। उसने नीट-यूजी 2026 की परीक्षा दी थी। आरक्षण का लाभ लेने के लिए उसे मेडिकल बोर्ड से पात्रता प्रमाणपत्र प्राप्त करना था। मेडिकल बोर्ड ने 12 अगस्त 2026 को जारी प्रमाणपत्र में याची को पढ़ाई के लिए सक्षम माना लेकिन दिव्यांगता 40 प्रतिशत से कम आंकी। याची ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी।
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याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि दिव्यांगता प्रमाणपत्र जारी करने वाली सक्षम संस्था के प्रमाणपत्र को चुनौती नहीं दी गई है। लिहाजा बाद में मेडिकल बोर्ड की ओर से दिव्यांगता प्रतिशत कम किए जाने के आधार पर उसे दिव्यांग श्रेणी के आरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम-2016 में दिव्यांगता प्रमाणपत्र जारी करने और उसके खिलाफ अपील की व्यवस्था है।
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कोर्ट ने पाया कि कई मामलों में मेडिकल बोर्ड ने अभ्यर्थियों को पढ़ाई के लिए सक्षम माना लेकिन उनकी दिव्यांगता को 40 प्रतिशत के बेंचमार्क से काफी कम बताया। खंडपीठ ने कहा कि इन मामलों में सक्षम प्राधिकारी की ओर से जारी दिव्यांगता प्रमाणपत्रों को चुनौती नहीं दी गई है। हाईकोर्ट ने याची को उसके मूल मेडिकल प्रमाणपत्र के आधार पर आरक्षण श्रेणी में सीट के लिए दावा करने की अनुमति दी।