हाईकोर्ट : पूर्व मंत्री की मौत पर मुआवजा बढ़ाने की मांग खारिज, कहा- हैसियत से नहीं, साक्ष्य से तय होगी आय
Allahabad High Court : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मोटर दुर्घटना मुआवजे के एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की सामाजिक या पेशेवर हैसियत उसकी आय तय करने का आधार नहीं हो सकती। आय का निर्धारण केवल रिकॉर्ड पर उपलब्ध विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। कोर्ट ने पूर्व कैबिनेट मंत्री नंदलाल सिंह पटेल की मौत के मामले में मुआवजा बढ़ाने की मांग वाली अपील खारिज कर दी।
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मोटर दुर्घटना मुआवजे से जुड़े एक मामले में कहा कि किसी व्यक्ति की सामाजिक या पेशेवर हैसियत को उसकी आय तय करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। आय का निर्धारण रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए। इस टिप्पणी संग कोर्ट ने पूर्व कैबिनेट मंत्री नंदलाल सिंह पटेल की मौत पर ट्रिब्यूनल की ओर से तय मुआवजे को बढ़ाने की मांग में दायर अपील खारिज कर दी।
यह आदेश न्यायमूर्ति अनिल कुमार-दशम की एकल पीठ ने प्रयागराज की कमला देवी की प्रथम अपील पर दिया। याची मृतक की आश्रित हैं। इलाहाबाद-रायबरेली मार्ग पर 15 मई 1999 को हादसे में नंदलाल की मौत हो गई थी। मोटर दुर्घटना ट्रिब्यूनल ने उनकी वार्षिक आय 90 हजार रुपये मानकर 7,84,500 रुपये मुआवजा निर्धारित किया था। याची ने कम बताते हुए मुआवजा बढ़ाने की मांग में हाईकोर्ट में अपील दायर की।
आयकर रिटर्न अंतिम साक्ष्य नहीं
याची की ओर से दलील दी गई कि नंदलाल सिंह पटेल प्रदेश सरकार के पूर्व कैबिनेट मंत्री के साथ ही अधिवक्ता भी थे। उनकी आय 1.60 लाख रुपये सालाना बनती है। आयकर रिटर्न में यही आय दर्शायी गई थी। उनकी पेशेवर व सामाजिक हैसियत के अनुरूप ट्रिब्यूनल ने कम आय तय की है। कोर्ट ने कहा कि आयकर रिटर्न दाखिल कर देने से उसमें दर्ज आय हर मामले में निर्णायक रूप से साबित नहीं हो जाती।
कोर्ट ने कहा मुआवजा न्यायसंगत होना चाहिए
इस मामले में 1.60 लाख रुपये की आय के समर्थन में कोई संतोषजनक साक्ष्य नहीं था। इसके विपरीत ट्रिब्यूनल ने 90 हजार रुपये वार्षिक आय पहले ही निर्धारित की थी, जो उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर स्वयं अधिक मानी गई। इसलिए मुआवजा बढ़ाने का कोई आधार नहीं है।
कोर्ट ने भविष्य की संभावनाओं, व्यक्तिगत खर्च में कटौती और अन्य मदों में वृद्धि की मांग भी स्वीकार नहीं की। कहा कि मुआवजा न्यायसंगत और उचित होना चाहिए। प्रत्येक मद को यांत्रिक ढंग से बढ़ाना जरूरी नहीं है। अंततः कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के मुआवजा आदेश में हस्तक्षेप से इन्कार कर दिया।