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High Court: बालिग बेटियों को बंधक बनाना व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन, दोनों बहनों को 25 लाख मुआवजा दे सरकार
Wed, 12 Aug 2026 06:53 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Wed, 12 Aug 2026 06:53 PM IST
सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने धर्म परिवर्तन करने वाली सगी बहनों को पिता की ओर से हिरासत में रखने को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन बताया। कोर्ट ने कहा कि बालिग को अपनी आस्था, धर्म, निवास और जीवन से जुड़े फैसले स्वयं लेने का अधिकार है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट।
- फोटो : अमर उजाला।
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने धर्म परिवर्तन करने वाली सगी बहनों को पिता की ओर से हिरासत में रखने को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन बताया। कोर्ट ने कहा कि बालिग को अपनी आस्था, धर्म, निवास और जीवन से जुड़े फैसले स्वयं लेने का अधिकार है। माता-पिता अपनी संतान के धार्मिक या व्यक्तिगत फैसलों से असहमत हो सकते हैं, लेकिन उनकी स्वतंत्रता नहीं छीन सकते।
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इस टिप्पणी संग कोर्ट ने दोनों बहनों को अपनी पसंद के स्थान व व्यक्ति के साथ रहने की स्वतंत्रता दी। साथ ही पिता और प्रदेश सरकार को संयुक्त रूप से 25 लाख रुपये दोनों को मुआवजा देने का आदेश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकल पीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर दिया है। आगरा निवासी सगी बहनों की ओर से बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई थी। उसमें कहा गया था कि दोनों ने स्वेच्छा से इस्लाम धर्म अपना लिया है। इससे नाराज माता-पिता ने उन्हें अवैध रूप से बंधक बना रखा है। कोर्ट के आदेश पर पुलिस ने दोनों को पेश किया तो बताया कि उन्होंने अपनी इच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया है।
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एक बहन ने कहा कि मैं 35 वर्ष की है, जूलॉजी में एमएससी, एमफिल और बीएड कर चुकी हूं। मैंने धर्म परिवर्तन का निर्णय मानसिक शांति और आध्यात्मिक संतुष्टि के लिए लिया था। दोनों बहनों के अनुसार पिता उनके फैसले से सहमत नहीं थे। उन्हें वापस हिंदू धर्म अपनाने के लिए दबाव डालते रहे। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें जबरन घर में रोका गया। बाहर जाने और अपनी पसंद से जीवन जीने की स्वतंत्रता नहीं दी गई।
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कोर्ट ने पाया कहा कि दोनों बहनें बालिग हैं। अपने जीवन के फैसले लेने में सक्षम हैं। ऐसे में बालिग व्यक्ति का अपनी इच्छा से धर्म अपनाना या बदलना उसकी व्यक्तिगत स्वायत्तता और गरिमा से जुड़ा अधिकार है। कोर्ट ने पिता की ओर से उनकी स्वतंत्रता सीमित करने को गैरकानूनी मानते हुए पिता और राज्य को संयुक्त रूप से 25 लाख रुपये मुआवजा आठ सप्ताह में देने का आदेश दिया।