High Court : हाईकोर्ट ने 51 साल पहले एसिड अटैक मामले में सजा को जेल में बिताई अवधि में बदला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 51 साल पहले एसिड अटैक मामले में कहा कि मुकदमे की देरी में आरोपी की कोई भूमिका न हो, तो उसे उसकी सजा नहीं मिलनी चाहिए।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 51 साल पहले एसिड अटैक मामले में कहा कि मुकदमे की देरी में आरोपी की कोई भूमिका न हो, तो उसे उसकी सजा नहीं मिलनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित एवं निष्पक्ष न्याय का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। साथ ही कोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए कारावास की सजा को पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर दिया।
यह आदेश न्यायमूर्ति अचल सचदेव ने बस्ती निवासी कैलाश यादव और सुखराम तेली की याचिका आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए दिया।आरोपी कैलाश यादव और सुखराम तेली के खिलाफ बस्ती के टेटरी बाजार थाने में पीड़ित के पिता की तहरीर पर 1975 में एसिड अटैक के आरोप में एफआईआर दर्ज हुई थी। सह-आरोपी कैलाश यादव की अपील के दौरान मृत्यु हो चुकी है।
अभियोजन के अनुसार दो-तीन नवंबर 1975 की रात में रामदयाल अपने घर के बाहरी कमरे में लालटेन की रोशनी में पढ़ रहे थे। आरोप है कि सुखराम तेली के उकसाने पर कैलाश यादव ने उन पर मिट्टी के बर्तन से तेजाब फेंक दिया। जिससे उनके चेहरे, आंख, गर्दन, सीने, पेट और जांघ पर जलने की चोटें आईं।
सत्र न्यायालय ने 1983 में दोनों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए चार-चार साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। कोर्ट ने कहा कि गंभीर चोट का अपराध संदेह से परे सिद्ध नहीं हो सका। लेकिन ज्वलनशील पदार्थ से हमला करने और आधी रात को चोट पहुंचाने की तैयारी के साथ घर में घुसने का अपराध सिद्ध है।
कोर्ट ने कहा कि एसिड अथवा अन्य ज्वलनशील पदार्थ से हमला अत्यंत गंभीर अपराध है। ऐसे मामलों में प्रोबेशन (अच्छे आचरण पर रिहाई) का लाभ देने से समाज में गलत संदेश जाएगा और अपराधों के प्रति निवारक प्रभाव कमजोर पड़ेगा। इसलिए आरोपी को प्रोबेशन का लाभ नहीं दिया जा सकता।
हालांकि, कोर्ट ने कहा कि घटना को पांच दशक से अधिक बीत चुके हैं। अपील 1983 से लंबित थी। आरोपी पूरे समय जमानत पर रहा और उसके विरुद्ध किसी अन्य आपराधिक मामले का रिकॉर्ड भी नहीं है। कोर्ट ने कारावास की सजा को पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित करते हुए 40 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि जुर्माने की राशि जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को पीड़ित प्रतिकर और विधिक सहायता के लिए उपलब्ध कराई जाए।