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UP : हाईकोर्ट की टिप्पणी- राजशाही का दौर खत्म...अब जरूरी नहीं बड़े बेटे का बेटा ही राजा बने

Sun, 09 Nov 2025 09:55 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 09 Nov 2025 09:55 AM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अब देश में राजशाही का दौर खत्म हो चुका है। लोकतंत्र में जरूरी नहीं कि बड़े बेटे का बड़ा बेटा ही राजा बने। सार्वजनिक हित की किसी भी संस्था में वंशानुगत प्रणाली को मान्यता नहीं दी जा सकती।

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High Court comment  era of monarchy is over... now it is not necessary that the eldest son son
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अब देश में राजशाही का दौर खत्म हो चुका है। लोकतंत्र में जरूरी नहीं कि बड़े बेटे का बड़ा बेटा ही राजा बने। सार्वजनिक हित की किसी भी संस्था में वंशानुगत प्रणाली को मान्यता नहीं दी जा सकती। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने आगरा के आवागढ़ के शाही परिवार के दो बेटों में छिड़ी वर्चस्व की जंग का कानूनी हल निकाल दिया। कोर्ट ने आगरा के राजा बलवंत सिंह कॉलेज और बलवंत एजुकेशनल सोसाइटी के उपाध्यक्ष के पांच वर्ष के कार्यकाल को दो बराबर हिस्सों में दोनों चचेरे भाइयों में बांट दिया।

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बशर्ते उन्हें अपनी सदस्यता प्रदर्शित करने के लिए सोसाइटी के खाते में दो-दो लाख रुपये जमा करने होंगे। हालांकि, जब तक प्रबंध समिति का विधिवत गठन नहीं होता, तब तक प्रबंधन का संचालन-निगरानी की जिम्मेदारी सोसाइटी के पदेन अध्यक्ष जिला जज व डीएम आगरा को सौंपी है। शाही परिवार की ओर से राजा आवागढ़ के नाम पर बलवंत सिंह एजुकेशनल सोसाइटी बनाई गई थी। यह सोसाइटी आगरा के राजा बलवंत सिंह कॉलेज समेत कई अन्य नामी शैक्षिक संस्थानों का संचालन करती है। जिला जज सोसाइटी के पदेन अध्यक्ष हैं।

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उपाध्यक्ष के पद पर शाही परिवार के बड़े बेटे जितेंद्र पाल सिंह और अनिरुद्ध पाल सिंह के बीच दशकों से वर्चस्व की छिड़ी जंग हाईकोर्ट की दहलीज पर पहुंची है। कोर्ट ने मामले का निस्तारण करते हुए कहा कि अब राजा या वंशानुगत अधिकार के आधार पर सोसाइटी के पद नहीं बांटे जाएंगे। न ही शिक्षा के मंदिर को सत्ता और संपत्ति की अखाड़ा बनाने देंगे। कोर्ट ने बड़े भाई जितेंद्र पाल सिंह को एक दिसंबर 2025 से 31 मई 2028 व छोटे भाई अनिरुद्ध पाल सिंह को एक जून 2028 से 30 नवंबर 2030 तक उपाध्यक्ष के पद की जिम्मेदारी निभाने का आदेश दिया है।

राज्य सरकार को निर्देश

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में सोसाइटी की कोई वैधानिक समिति अस्तित्व में नहीं है। लिहाजा, राज्य सरकार सोसाइटी के बॉयलाज (उपनियमों) के मुताबिक एक जनवरी 2026 तक नया बोर्ड गठित कर सोसाइटी रजिस्ट्रार को सूचित करे।

कोर्ट की टिप्पणियां

  • दोनों भाई अपनी विरासत को आगे बढ़ाने के बजाय ‘राजा’ की उपाधि के लिए लड़ रहे हैं। शिक्षा का यह मंदिर सत्ता और संपत्ति का अखाड़ा नहीं बन सकता।
  • अब राजा आवागढ़ शाही जैसी कोई उपाधि मान्य नहीं है। कोई भी व्यक्ति सिर्फ जन्म या परंपरा के आधार पर सोसाइटी का उपाध्यक्ष नहीं बन सकता। इसमें सभी सदस्य बराबर का हक रखते हैं।
  • उपाध्यक्ष के कार्यकाल का भाइयों में बराबर बंटवारा परिवार, विरासत और संस्थान तीनों के हित में संतुलन स्थापित करेगा। पुराने मतभेदों को खत्म करने में मील का पत्थर साबित होगा।
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