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Talaq : पंद्रह सालों से अलग रह रहे डॉक्टर दंपती के तलाक को हाईकोर्ट ने किया मंजूर

Sat, 02 Mar 2024 01:21 PM IST
विनोद सिंह अमर उजला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 02 Mar 2024 01:21 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रेम विवाह पर चिंता व्यक्त करते हुए 15 सालों से अलग रह रहे डॉक्टर दंपती की तलाक की अपील को स्वीकार कर लिया। हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि पहले वैवाहिक रिश्तों में सम्मान और भावनाएं थीं, लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध ने इन्हें खत्म कर दिया है।

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High Court approves divorce of doctor couple living separately for fifteen years
तलाक। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगभग 15 वर्ष से एक-दूसरे से अलग रह रहे डॉक्टर दंपती के तलाक को मंजूरी दे दी। कोर्ट ने कहा, जिन रिश्तों में भावनाएं और सम्मान न हों, वो बोझिल होते हैं। ऐसे रिश्ते मानसिक क्रूरता के समान हैं। यह फैसला न्यायमूर्ति विवेक कुमार बिरला और न्यायमूर्ति डी.रमेश की खंडपीठ ने मुरादाबाद के कर्नल डॉ.मनोज कुमार गुप्ता की ओर से पारिवारिक न्यायालय की ओर से तलाक की डिक्री दिए जाने से इन्कार करने वाले आदेश के खिलाफ दाखिल अपील को स्वीकार करते हुए सुनाया।

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कोर्ट ने पल-पल में बनते और बिगड़ते प्रेम विवाह पर चिंता व्यक्त की। कहा, यह पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव है। एक दौर था, जब वैवाहिक रिश्तों में सम्मान और भावनाएं थीं, लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध ने इन्हें खत्म कर दिया है। मुरादाबाद निवासी सेना में डॉक्टर कर्नल मनोज कुमार गुप्ता ने वर्ष 2007 में एक महिला चिकित्सक से शादी की थी। वर्ष 2015 में उन्होंने मुरादाबाद के पारिवारिक न्यायालय में विवाह विच्छेद की अर्जी दाखिल की थी।

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2009 से अलग रह रहे थे दंपती

दलील दी थी कि बीते छह वर्ष (2009 से ) से वैचारिक मतभेद के कारण पत्नी अलग रह रही है, लेकिन पारिवारिक न्यायालय ने उनके पक्ष में तलाक की डिक्री पारित करने से इन्कार कर दिया था। पारिवारिक न्यायालय के आदेश से असंतुष्ट डॉक्टर ने वर्ष 2019 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अपीलार्थी के अधिवक्ता का कहना था कि पत्नी लगभग 15 वर्ष से अलग रह रही है। उनके बीच वैवाहिक रिश्ते को लेकर अब किसी भी तरह का भावनात्मक लगाव नहीं रह गया है।

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विवाह विच्छेद कानून में बदलाव की जरूरत

खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट की ओर से 2006 में नवीन कोहली के मामले का जिक्र करते हुए कहा, पति-पत्नी के बीच लंबी जुदाई भावनात्मक रिश्ते को मृतप्राय कर देती है। इसलिए पक्षकारों पर जबरदस्ती ऐसे रिश्ते का बोझ थोपना उनके विरुद्ध मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।

कोर्ट ने कहा, अब दौर बदल चुका है, रिश्ते में भावनाओं और सम्मान की जगह पाश्चात्य संस्कृति ने ले ली है। ऐसे में पहले से मौजूद विवाह विच्छेद कानून में तलाक के आधारों में संशोधन की भी जरूरत है। कोर्ट ने आश्चर्य भी जताया कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से नवीन कोहली मामले में स्थापित विधि व्यवस्था के बावजूद सरकार कानून में संशोधन पर विचार नहीं कर रही।

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कानून संशोधन पर विचार करे केंद्र सरकार

हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री के इस आदेश की प्रति केंद्र सरकार के विधि एवं न्याय मंत्रालय और विधि आयोग को भेजने का निर्देश दिया है, जिससे सरकार विवाह विच्छेद के आधारों में संशोधन पर विचार करे और तलाक के आधारों में यह भी जोड़े कि पति-पत्नी के अलग रहने की लंबी अवधि भी मानसिक क्रूरता है। इस आधार पर भी पीड़ित पक्षकार तलाक का हकदार हो और लंबे समय तक बोझिल रिश्ते को ढोने के लिए बाध्य न हो।

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