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पिया मेहंदी मंगाई द मोती झील से

Mon, 22 Aug 2016 03:09 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Mon, 22 Aug 2016 03:09 AM IST
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Henna drank from the lake called the pearl
allahabad
इलाहाबाद। संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से उत्तर मध्य सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित 15 दिनी कार्यशाला के समापन पर प्रतिभागियों ने कजरी के हर रंग से मंच को सजाया तो माटी की मिठास हर किसी को मुग्ध करती रही। ‘लोक कला के रंग कजरी के संग’ में परंपरागत कजरी की अलग-अलग शैलियों की प्रस्तुतियां मंच को समृद्ध करती रहीं।
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जानेमाने लोक गायक लल्लन सिंह गहमरी की देेखरेख में कजरी के विविध रंगों से सजी शाम का आकर्षण रहीं प्रख्यात कजरी गायिका उर्मिला श्रीवास्तव जिन्होंने ‘पिया मेहंदी मंगाई द मोती झील से, जाइके साइकील से ना’, ‘रिमझिम बरसे सवनवा’ जैसी प्रस्तुतियों से मंत्रमुग्ध किया। कामता प्रसाद ने निर्गुण शैली में सजी कजरी ‘सखिया जइसन सजना तोर ओइसन मोर बा’ सुनाया।
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इसके अतिरिक्त कजरी को अर्थ देतीं कलाकार रंजना त्रिपाठी, निशा श्रीवास्तव, सुषमा मौर्या, उर्वशी मौर्या ने ‘कहंवा से आवेलें राम धनुधरिया, पड़ेला झीर-झीर बुनिया’ सुनाकर तालियां बटोरीं। इसी क्रम में बिजली यादव, बबलू राम दीवाना, पांचू राम पाल, रागिनी चंद्रा आदि ने भी कजरी के विविध रंगों से बखूबी परिचित कराया। सोनाली चक्रवर्ती, सुजाता केसरी ने लोकनृत्य प्रस्तुत कर समा बांधा। हारमोरियम पर अनिल मासूम, बांसुरी पर रविशंकर, तबला पर पंकज श्रीवास्तव और ढोलक पर नगीना ने संगत किया। संयोजन धीरज अग्रवाल, मंच संचालन वंदना श्रीवास्तव ने किया।
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 सम्मानित हुए लोक कलाकार
समारोह में लोकगीत एवं लोक कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने के लिए  लोककलाविद् अतुल यदुवंशी, हजारी लाल चौहान, बद्री चंचल, अमिता श्रीवास्तव को स्मृति चिन्ह एवं प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया।


कम नहीं होने वाला कजरी का क्रेज
0 प्रसिद्ध कजरी गायिका उर्मिला श्रीवास्तव ने कहा
प्रसिद्ध कजरी गायिका उर्मिला श्रीवास्तव रविवार को संगमनगरी पहुंचीं तो यहां से उनका लगाव और कजरी के नए-पुराने चेहरों से जुड़ाव साफ दिखा। ‘अमर उजाला’ से मुलाकात में बोलीं, कजरी का क्रेज कभी कम नहीं होने वाला है। आज भी कजरी के श्रोता दुनिया भर मे हैं। यह अलग बात है कि नए जमाने के युवाओं को शास्त्रीय संगीत के बजाय फ्यूजन म्युजिक अधिक लुभा रहा है। जहां तक कजरी की दुनिया है तो माटी की सोंधी खुशबू में रची बसी कजरी में इतनी धुनें हैं कि उन सभी पर काम करने के लिए एक पूरा युग भी कम है। कजरी में नयापन लाने की कोई जरूरत नहीं है, इससे उसमें हल्कापन ही आएगा, मिठास कम होगी, बस, इसे तो साधने और साधने की जरूरत है।
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