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पुरखों की कब्रों पर चरागां, इबादत में गुजारी रात

Fri, 12 May 2017 01:55 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो,इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो,इलाहाबाद Updated Fri, 12 May 2017 01:55 AM IST
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Grazing at the tombs of the ancestors, living night in idol
culture
माहे शाबान की चौदहवीं शब यानी बृहस्पतिवार को अकीदत और एहतराम से निजात का पर्व शबेबरात मनाया गया। अपने पुरखों की याद में घरों और कब्रिस्तानों में मोमबत्तियां, अगरबत्तियां जलाकर चरागां किया गया। फूल चढ़ाए और फातिहा किया। परिजनों ने अपने पुरखों की कब्र पर पहुंचकर उनकी मगफिरत के लिए दुआएं भी मांगीं। कई जगहों पर पटाखे भी छुड़ाए गए।
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फातिहा के बाद सलामती, रोजी, रोजगार में बरकत के लिए मस्जिदों में फजिर की नमाज तक आमाल भी किए गए। पुरखों, पैगंबरों, इमामों की इबादत में पूरी रात गुजारी गई। फातिहा के लिए घरों में तरह-तरह के हलुए भी बनाए गए।
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शहर के रसूलपुर-तुलसीपुर बड़ी करबला, छोटी करबला, बहादुरगंज, बैरहना, अकबरपुर, हसन मंजिल-अटाला, दरियाबाद, कालाडांडा, अकेलवा आम, दारागंज, अल्लापुर, कटरा, राजापुर, बेली, मेहंदौरी, बघाड़ा आदि कब्रिस्तानों में बिजली की झालरें सजाकर रोशनी की गई। चरागां सुन्नत है, ऐसे में अपने पुरखों की कब्रों पर चरागां के बाद लोग दूसरे कब्रिस्तान भी गए। चरागां और फातिहा के सिलसिले में तमाम कब्रिस्तानों के करीब पूरी रात चहल-पहल रही।
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मान्यता है कि शबे बरात पर अल्लाह पाक रूहों को आजाद करते हैं। पुरखे अपने परिजनों से मिलने और उन्हें दुआएं देने के लिए जन्नत से जमीं पर आते हैं। उनके आने की खुशी में ही मगरिब की नमाज के बाद शुरू हुआ चरागां का सिलसिला पूरी रात जारी रहा।

शबे बरात पर फातेहा के लिए मेवों के साथ तरह-तरह के हलुए बनाए गए। कहा जाता है, जंग के दौरान रसूल अल्लाह का एक दांत ‘मैदान-ए-जंग’ में शहीद हो गया था, सो उनकी सहूलियत के लिए ही हलुआ तैयार किया गया और बाद में फातेहा के लिए इसका ही इस्तेमाल किया जाने लगा।

अपने पुरखों की कब्रों पर चरागां केलिए तमाम परिजन दूर-दूर से आए। दरियाबाद कब्रिस्तान में कोचीन से आए एहतेशाम हुसैन और चेन्नई से आए नाजिम हुसैन ने कहा, शबे बरात पर आने के लिए कई महीने पहले ही तैयारी की थी। इसी तरह कालाडांडा कब्रिस्तान में बेनीगंज के बशारत हुसैन मुंबई और करेली के युसूफ कमाल कोलकाता से खास तौर पर चरागां केलिए पहुंचे।


मशहूर शायर अकबर इलाहाबादी की कालाडांडा स्थित कब्र भी रोशन हुई। उनके प्रपौत्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सैयद इब्राहिम रिज़वी अपने बेटों यूनुस और जकारिया के साथ अकबर की कब्र पर पहुंचे। वहां उन्होंने कुरानपाक की तिलावत के बाद अगरबत्तियां जलाकर दुआएं मांगीं। इसी तरह उन्हें खिराजे अकीदत पेश करने के लिए कई और भी पहुंचे।
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