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गठिया रोग अब लाइलाज नहीं
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Mon, 23 Oct 2017 01:35 AM IST
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इलाहाबाद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की इलाहाबाद शाखा की ओर से आयोजित 20 वीं एएमए कॉन 2017 में जुटे चिकित्सकों ने अपने-अपने शोध पत्रों और अनुभवों के आधार पर दावा किया कि गठिया रोग अब लाइलाज नहीं है। विशेषज्ञों ने कहा कि चिकित्सा विज्ञान क्षेत्र में लगातार नई वैज्ञानिक पद्धतियां विकसित हो रही हैं, इसका लाभ आम लोगों तक पहुंचे। इस पर मंथन करने को यह आयोजन किया गया।
एएमए कॉन 2017 में देश भर के विभिन्न चिकित्सा संस्थानों से आए विशेषज्ञ चिकित्सकों ने अपने व्याख्यान दिए। इससे पहले मुख्य अतिथि आईएमए के राष्ट्रीय सचिव डॉ. आरएन टंडन एवं राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. अशोक अग्रवाल ने दीप जलाकर उद्घाटन किया। एएमए अध्यक्ष डॉ. अनिल शुक्ला ने अतिथियों का स्वागत करते हुए स्मृति चिह्न प्रदान किए। सचिव डॉ. त्रिभुवन सिंह ने एएमए की वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत की। आयोजन सचिव डॉ0 मनोज माथुर ने आभार व्यक्त किया।
अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त एवं भारत में रूयमैटोलॉजी के मार्गदर्शक डॉ. एएन मालवीया ने प्रो. बीएल अग्रवाल ओरेशन के अंतर्गत रूयूमैटाइड आर्थराइटिस पर विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने गठिया रोगियों के प्राथमिक लक्षणों की पहचान कर जल्दी इलाज शुरू करने के फायदे बताए। सर गंगा राम अस्पताल नई दिल्ली की पीडियाट्रिक रुयूमैटोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. सुजाता साहनी ने बच्चों में होने वाली गठिया रोग पर जानकारी दी। उन्होने कहा कि बच्चों का गठिया रोग अब लाइलाज नहीं है, आवश्यकता है कि समय रहते रोग की पहचान करें। दिल्ली से आए आर्थोर्पेिडक सर्जन डॉ. जे माहेश्वरी ने गठिया रोगों में सर्जरी के उपयोग पर प्रकाश डाला। उन्होंनेे जोड़ प्रत्यारोपण की उपयोगिता बताई।
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किंग जार्ज मेडिकल युनिवर्सिटी के प्रोफेसर अनुपम वाखलू ने ल्यूपस (एसएलई) के बारे में बताया कि यह एक आटोइम्यून बीमारी है, जो शरीर के विभिन्न हिस्सों को नुकसान पहुंचाती है, यह सिर्फ गांठों तक सीमित रहने वाली बीमारी नहीं है। इसका प्रभाव त्वचा, रुधिर, तंत्र, गुर्दा, मस्तिष्क, हृदय एवं फेफ ड़ों समेत पूरे शरीर पर पड़ता है।
केजीएमयू लखनऊ के हिमैटोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. एके त्रिपाठी ने डॉ. अनूप त्रिपाठी ओरेशन में ल्यूकीमिया के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि यदि कोई बुखार दो सप्ताह तक ठीक नही होता तो खून की जांच अवश्य करानी चाहिए, इससे ब्लड कैंसर की जल्दी पहचान हो सकती है। बीएचयू के प्रोफेसर डॉ. केके गुप्ता ने एनीमिया के होने वाले कारणों, निदान एवं उपचार पर जानकारी दी। इसके अलावा डॉं. संदीप उपाध्याय ने वास्कुलाइटिस, एम्स नई दिल्ली के डॉ. रंजन गुप्ता ने रीढ़ की गठिया में होने वाले नवीनतम उपचार पद्धति, केजीएमयू के डॉ. पुनीत कुमार ने यूरिक एसिड से होने वाली गठिया (गाउट) रोग पर व्याख्यान दिया। केजीएमयू के हिमैटोलॉजी विभाग के डॉ. एसपी वर्मा ने रक्त स्राव संबंधित बीमारियों एवं इनके कारणों पर जानकारी दी।
संगोष्ठी के अंतिम चरण में इलाहाबाद मेडिकल एसोसिएशन एवं इलाहाबाद ऑब्स एंड गाइनी के संयुक्त तत्वावधान में डॉ. पीसी महापात्रा ने मातृत्व विषय पर व्याख्यान दिया। संचालन डॉ. राधारानी घोष, डॉ. सुबोध जैन, डॉ. आशुतोष गुप्ता और डॉ. पारुल माथुर ने किया। इस मौके पर आयोजन सचिव डॉ. मनोज माथुर, अजीत चौरसिया, प्रो. एके गुप्ता, डॉ. वीके अग्रवाल, डॉ. शार्दूल सिंह, डॉ. जीएस सिन्हा, डॉ. एपी सिंह, डॉ. आरकेएस चौहान, डॉ. कमल सिंह, डॉ. राजेश कुमार मौर्या, डॉ. बीके मिश्रा, डॉ. युगांतर पांडेय, डॉ. अनूप चौहान, डॉ. अशोक कुमार आदि उपस्थित रहे।
आईएमए के राष्ट्रीय सचिव डॉ. आर.एन. टंडन ने अपने संबोधन में कहा कि सरकार को किसी भी कानून के बनाने एवं लागू करते समय छोटे अस्पताल एवं एकल चिकित्सक प्रणाली का ध्यान रखने की विशेष जरूरत है, क्योंकि आज भी 80 प्रतिशत चिकित्सा सुविधा इन्हीं चिकित्सकों और अस्पतालों द्वारा की जाती है। उन्होंने कहा कि आईएमए चिकित्सकों के इस पक्ष को सरकार के समक्ष उठाने के लिए कटिबद्ध है।
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एएमए कॉन 2017 में देश भर के विभिन्न चिकित्सा संस्थानों से आए विशेषज्ञ चिकित्सकों ने अपने व्याख्यान दिए। इससे पहले मुख्य अतिथि आईएमए के राष्ट्रीय सचिव डॉ. आरएन टंडन एवं राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. अशोक अग्रवाल ने दीप जलाकर उद्घाटन किया। एएमए अध्यक्ष डॉ. अनिल शुक्ला ने अतिथियों का स्वागत करते हुए स्मृति चिह्न प्रदान किए। सचिव डॉ. त्रिभुवन सिंह ने एएमए की वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत की। आयोजन सचिव डॉ0 मनोज माथुर ने आभार व्यक्त किया।
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अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त एवं भारत में रूयमैटोलॉजी के मार्गदर्शक डॉ. एएन मालवीया ने प्रो. बीएल अग्रवाल ओरेशन के अंतर्गत रूयूमैटाइड आर्थराइटिस पर विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने गठिया रोगियों के प्राथमिक लक्षणों की पहचान कर जल्दी इलाज शुरू करने के फायदे बताए। सर गंगा राम अस्पताल नई दिल्ली की पीडियाट्रिक रुयूमैटोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. सुजाता साहनी ने बच्चों में होने वाली गठिया रोग पर जानकारी दी। उन्होने कहा कि बच्चों का गठिया रोग अब लाइलाज नहीं है, आवश्यकता है कि समय रहते रोग की पहचान करें। दिल्ली से आए आर्थोर्पेिडक सर्जन डॉ. जे माहेश्वरी ने गठिया रोगों में सर्जरी के उपयोग पर प्रकाश डाला। उन्होंनेे जोड़ प्रत्यारोपण की उपयोगिता बताई।
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किंग जार्ज मेडिकल युनिवर्सिटी के प्रोफेसर अनुपम वाखलू ने ल्यूपस (एसएलई) के बारे में बताया कि यह एक आटोइम्यून बीमारी है, जो शरीर के विभिन्न हिस्सों को नुकसान पहुंचाती है, यह सिर्फ गांठों तक सीमित रहने वाली बीमारी नहीं है। इसका प्रभाव त्वचा, रुधिर, तंत्र, गुर्दा, मस्तिष्क, हृदय एवं फेफ ड़ों समेत पूरे शरीर पर पड़ता है।
केजीएमयू लखनऊ के हिमैटोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. एके त्रिपाठी ने डॉ. अनूप त्रिपाठी ओरेशन में ल्यूकीमिया के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि यदि कोई बुखार दो सप्ताह तक ठीक नही होता तो खून की जांच अवश्य करानी चाहिए, इससे ब्लड कैंसर की जल्दी पहचान हो सकती है। बीएचयू के प्रोफेसर डॉ. केके गुप्ता ने एनीमिया के होने वाले कारणों, निदान एवं उपचार पर जानकारी दी। इसके अलावा डॉं. संदीप उपाध्याय ने वास्कुलाइटिस, एम्स नई दिल्ली के डॉ. रंजन गुप्ता ने रीढ़ की गठिया में होने वाले नवीनतम उपचार पद्धति, केजीएमयू के डॉ. पुनीत कुमार ने यूरिक एसिड से होने वाली गठिया (गाउट) रोग पर व्याख्यान दिया। केजीएमयू के हिमैटोलॉजी विभाग के डॉ. एसपी वर्मा ने रक्त स्राव संबंधित बीमारियों एवं इनके कारणों पर जानकारी दी।
संगोष्ठी के अंतिम चरण में इलाहाबाद मेडिकल एसोसिएशन एवं इलाहाबाद ऑब्स एंड गाइनी के संयुक्त तत्वावधान में डॉ. पीसी महापात्रा ने मातृत्व विषय पर व्याख्यान दिया। संचालन डॉ. राधारानी घोष, डॉ. सुबोध जैन, डॉ. आशुतोष गुप्ता और डॉ. पारुल माथुर ने किया। इस मौके पर आयोजन सचिव डॉ. मनोज माथुर, अजीत चौरसिया, प्रो. एके गुप्ता, डॉ. वीके अग्रवाल, डॉ. शार्दूल सिंह, डॉ. जीएस सिन्हा, डॉ. एपी सिंह, डॉ. आरकेएस चौहान, डॉ. कमल सिंह, डॉ. राजेश कुमार मौर्या, डॉ. बीके मिश्रा, डॉ. युगांतर पांडेय, डॉ. अनूप चौहान, डॉ. अशोक कुमार आदि उपस्थित रहे।
आईएमए के राष्ट्रीय सचिव डॉ. आर.एन. टंडन ने अपने संबोधन में कहा कि सरकार को किसी भी कानून के बनाने एवं लागू करते समय छोटे अस्पताल एवं एकल चिकित्सक प्रणाली का ध्यान रखने की विशेष जरूरत है, क्योंकि आज भी 80 प्रतिशत चिकित्सा सुविधा इन्हीं चिकित्सकों और अस्पतालों द्वारा की जाती है। उन्होंने कहा कि आईएमए चिकित्सकों के इस पक्ष को सरकार के समक्ष उठाने के लिए कटिबद्ध है।