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मुहूर्त में किए गए संस्कार जीवन के लिए शुभ
prayagraj
Updated Wed, 14 Nov 2018 01:27 AM IST
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प्रयागराज। अखिल भारतीय संस्कृत शोध सम्मेलन में मंगलवार को सूर्योपासना के डाला छठ व्रत की महत्ता के साथ ही ज्योतिष में संस्कारों और मुहूर्तों के महत्व पर विस्तार से रोशनी डाली गई। विद्वानों ने मुहूर्त के अनुसार ही संस्कार कराने पर जोर दिया। ज्योतिष पर्व सूर्यषष्ठी समारोह के तहत यह कार्यक्रम सौदामिनी संस्कृत महाविद्यालय परिसर में हुआ।
दीप प्रज्ज्वलन के साथ दिन में 11 बजे सम्मेलन की शुरुआत हुई। बतौर मुख्य अतिथि गंगानाथ झा केंद्रीय संस्कृत विद्यापीठ के प्राचार्य प्रो एनआर कन्नन ने वेदों में सूर्य की महिमा को रेखांकित किया। उन्होंने द्वादश आदित्य के स्थान और उनके खगोलीय महत्व के बारे में जानकारी दी। बीएचयू के ज्योतिष्विद् प्रो. भगवत शरण शुक्ल ने कहा कि जीवन में संस्कारों के आधार पर ही व्यक्तित्व का निर्माण होता है। उन्होंने सनातनी संस्कृति में ज्योतिष शास्त्र के तहत वर्णित 16 संस्कारों पर प्रकाश डाला। उन्होंने जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कारों को ज्योतिष के आधार पर शुभ मुहूर्त में करने की सलाह दी।
बताया कि गर्भधारण भी शुभ मुहूर्त में करना चाहिए। इससे पैदा होने वाली संतान संस्कारी, योग्य और कर्मठ होती है। उन्होंने पुंसवन संस्कार, सीमंतोन्नयन संस्कार, जातकर्म संस्कार नामकरण संस्कार, निष्क्रमण संस्कार, अन्नप्राशन संस्कार, मुंडन संस्कार विद्यारंभ संस्कार, कर्णभेद संस्कार, यज्ञोपवीत संस्कार, वेदारंभ संस्कार, केशांत संस्कार, समावर्तन संस्कार, विवाह संस्कार और अंत्येष्ठि संस्कार की विधियों को बताया। इस मौके पर प्रकाश महाराज, डॉ. शालिग्राम त्रिपाठी, प्रो. रामहित त्रिपाठी, डॉ. वीरेंद्र कुमार तिवारी, घनश्याम द्विवेदी, डॉ. चिरंजीवी शर्मा, डॉ. शेष नारायण शुक्ल समेत तमाम विद्वान उपस्थित थे। अध्यक्षता डॉ. राम नरेश त्रिपाठी ने की। संचालन डॉ. शंभूनाथ त्रिपाठी अंशुल ने किया। महाविद्यालय की प्राचार्य अनामिका मिश्रा ने आगत अतिथियों का स्वागत किया।
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दीप प्रज्ज्वलन के साथ दिन में 11 बजे सम्मेलन की शुरुआत हुई। बतौर मुख्य अतिथि गंगानाथ झा केंद्रीय संस्कृत विद्यापीठ के प्राचार्य प्रो एनआर कन्नन ने वेदों में सूर्य की महिमा को रेखांकित किया। उन्होंने द्वादश आदित्य के स्थान और उनके खगोलीय महत्व के बारे में जानकारी दी। बीएचयू के ज्योतिष्विद् प्रो. भगवत शरण शुक्ल ने कहा कि जीवन में संस्कारों के आधार पर ही व्यक्तित्व का निर्माण होता है। उन्होंने सनातनी संस्कृति में ज्योतिष शास्त्र के तहत वर्णित 16 संस्कारों पर प्रकाश डाला। उन्होंने जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कारों को ज्योतिष के आधार पर शुभ मुहूर्त में करने की सलाह दी।
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बताया कि गर्भधारण भी शुभ मुहूर्त में करना चाहिए। इससे पैदा होने वाली संतान संस्कारी, योग्य और कर्मठ होती है। उन्होंने पुंसवन संस्कार, सीमंतोन्नयन संस्कार, जातकर्म संस्कार नामकरण संस्कार, निष्क्रमण संस्कार, अन्नप्राशन संस्कार, मुंडन संस्कार विद्यारंभ संस्कार, कर्णभेद संस्कार, यज्ञोपवीत संस्कार, वेदारंभ संस्कार, केशांत संस्कार, समावर्तन संस्कार, विवाह संस्कार और अंत्येष्ठि संस्कार की विधियों को बताया। इस मौके पर प्रकाश महाराज, डॉ. शालिग्राम त्रिपाठी, प्रो. रामहित त्रिपाठी, डॉ. वीरेंद्र कुमार तिवारी, घनश्याम द्विवेदी, डॉ. चिरंजीवी शर्मा, डॉ. शेष नारायण शुक्ल समेत तमाम विद्वान उपस्थित थे। अध्यक्षता डॉ. राम नरेश त्रिपाठी ने की। संचालन डॉ. शंभूनाथ त्रिपाठी अंशुल ने किया। महाविद्यालय की प्राचार्य अनामिका मिश्रा ने आगत अतिथियों का स्वागत किया।
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