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सराफा कारोबारियों की हड़ताल से कारीगर बेजार
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Wed, 16 Mar 2016 01:48 AM IST
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एक्साइज ड्यूटी खत्म करने की मांग को लेकर सराफा कारोबारियों की दो मार्च से चल रही हड़ताल का सीधा असर छोटे व्यापारियों और कारीगरों पर पड़ रहा है। हड़ताल के कारण अब तक करोड़ों का कारोबार प्रभावित हो चुका है। इससे सरकार को राजस्व की भी हानि हो रही है। हड़ताल के कारण कारीगरों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा होगा गया है। हालांकि सराफा एसोसिएशन उनके लिए खाने-पीने की व्यवस्था कर रहा है, लेकिन वह भी कुछ समय के लिए ही संभव है, क्योंकि बड़े कारोबारी भी एक सीमा से अधिक नहीं खर्च कर सकते। ऐसा इसलिए भी कि बंदी के दौरान उन्हें अपना परिवार भी चलाना है।
मीरगंज में सोने-चांदी के कारीगर संतोष वर्मा, जमुना वर्मा एवं संतोष शुक्ला के सामने लगातार बंदी से गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। यह कारीगर दुकानों से सोना-चांदी लाकर उसे आकार देते हैं, बदले में उन्हें दैनिक भुगतान किया जाता है। जमुना चौक में एक ज्वैलरी शॉप में कारीगर हैं और वह ज्वैलरी की कारीगरी के साथ कटाई-छंटाई, मरम्मत, ज्वैलरी सफाई आदि का भी काम करते हैं। इसके बदले मिलने वाले रकम से वह अपने परिवार का खर्च चलाते हैं, लेकिन पिछले 13 दिनों से चल रही हड़ताल के कारण संतोष, जमुना जैसे हजारों कारीगरों के सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। शुरू में दो-तीन बंदी के दौरान तो किसी तरह परिवार का खर्च चल गया, लेकिन अब उनके सामने रोजमर्रा जरूरत की वस्तुएं खरीदने का भी संकट खड़ा हो रहा है। हालांकि सराफा एसोसिएशन रोज कमाने-खाने वाले ऐसे कारीगरों के लिए अभी खाने-पीने की व्यवस्था कर रहा है, लेकिन हड़ताल और लंबी खिंची तो एसोसिएशन के सामने भी समस्या खड़ी हो जाएगी।
दुकानें बंद होने के कारण रेहन रखने का धंधा भी पूरी तरह बंद है। इसकी वजह से ऐसे जरूरतमंद भी परेशान हैं, जो रुपयों की व्यवस्था के लिए सोना गिरवी रखते हैं। काफी ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने पहले गिरवी रखा और अब उसे छुड़ाना चाहते हैं। अल्लापुर के राकेश सिंह उन्हीं में एक हैं, जिन्होंने करीब दो माह पहले वहीं के एक साहूकार के पास ज्वैलरी गिरवी रखकर रुपये लिए। अब वह रुपये अदाकर ज्वैलरी वापस लेना चाहते हैं, लेकिन दुकान बंद होने के कारण ऐसा नहीं कर पा रहे। ऐसे में उन्हें ब्याज बढ़ने की चिंता सता रही है।
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सराफा कारोबारियों की हड़ताल का असर विवाह जैसे आयोजनों पर खास नहीं पड़ा, क्योंकि ज्यादातर लोग ऐसे मौकों के लिए ज्वैलरी आदि की व्यवस्था काफी पहले से कर लेते हैं। तेलियरगंज के सुरेश श्रीवास्तव के बेटे का विवाह छह मार्च को हुआ। उन्होंने अपनी बहू के लिए ज्वैलरी विवाह से करीब 20-25 दिन पहले ही खरीद ली। इसी तरह साधारण परिवार की राजरूपपुर निवासी नीलिमा वर्मा ने विवाह में अपनी बेटी को देने के लिए ज्वैलरी खरीदने का सिलसिला करीब दो माह पहले से शुरू कर दिया था। उनका कहना है कि सोना जैसी कीमत वस्तु एक साथ नहीं खरीद सकते तो कई बार में थोड़ी-थोड़ी खरीदारी की। ऐसे परिवार भी काफी हैं जो अपनी परिचित शॉप से ही ज्वैलरी खरीदते हैं सो विवाह जैसे अवसर पर उन्हें खास दिक्कत नहीं हुई, क्योंकि नियमित ग्राहक होने के कारण दुकानदार ने उन्हें ज्वैलरी उपलब्ध करा दी।
सराफा व्यापारियों की मूल समस्या एक प्रतिशत एक्साइज ड्यूटी है और वह यह टैक्स किसी भी तरह से देने को तैयार नहीं हैं। सराफा कारोबारी अतुल चोपड़ा का कहना है कि 80 के दशक में गोल्ड कंट्रोल एक्ट में व्यापारियों को काफी प्रताड़ित किया गया। इसलिए दोबारा ऐसा नहीं होने देना चाहते। इससे इंस्पेक्टर राज को बढ़ावा मिलेगा। कारीगर काम नहीं कर सकेंगे, क्योंकि उन्हें सर्वे और छापेमारी का डर सताता रहेगा। कहा कि इसके एवज में व्यापारी राजस्व की भरपाई को भी तैयार हैं। अगर सरकार इसकी वजह से कालाबाजारी खत्म करना चाहती है तो व्यापारी उसके लिए भी पूरी पारदर्शित के साथ तैयार हैं। इसके लिए बीच का रास्ता यह है कि सरकार और सराफा एसोसिएशन के पदाधिकारी बैठकर मंथन करें और एक्साइज ड्यूटी के स्थान पर सिंगल प्वाइंट टैक्स लगाने का निर्णय करें।
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मीरगंज में सोने-चांदी के कारीगर संतोष वर्मा, जमुना वर्मा एवं संतोष शुक्ला के सामने लगातार बंदी से गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। यह कारीगर दुकानों से सोना-चांदी लाकर उसे आकार देते हैं, बदले में उन्हें दैनिक भुगतान किया जाता है। जमुना चौक में एक ज्वैलरी शॉप में कारीगर हैं और वह ज्वैलरी की कारीगरी के साथ कटाई-छंटाई, मरम्मत, ज्वैलरी सफाई आदि का भी काम करते हैं। इसके बदले मिलने वाले रकम से वह अपने परिवार का खर्च चलाते हैं, लेकिन पिछले 13 दिनों से चल रही हड़ताल के कारण संतोष, जमुना जैसे हजारों कारीगरों के सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। शुरू में दो-तीन बंदी के दौरान तो किसी तरह परिवार का खर्च चल गया, लेकिन अब उनके सामने रोजमर्रा जरूरत की वस्तुएं खरीदने का भी संकट खड़ा हो रहा है। हालांकि सराफा एसोसिएशन रोज कमाने-खाने वाले ऐसे कारीगरों के लिए अभी खाने-पीने की व्यवस्था कर रहा है, लेकिन हड़ताल और लंबी खिंची तो एसोसिएशन के सामने भी समस्या खड़ी हो जाएगी।
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दुकानें बंद होने के कारण रेहन रखने का धंधा भी पूरी तरह बंद है। इसकी वजह से ऐसे जरूरतमंद भी परेशान हैं, जो रुपयों की व्यवस्था के लिए सोना गिरवी रखते हैं। काफी ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने पहले गिरवी रखा और अब उसे छुड़ाना चाहते हैं। अल्लापुर के राकेश सिंह उन्हीं में एक हैं, जिन्होंने करीब दो माह पहले वहीं के एक साहूकार के पास ज्वैलरी गिरवी रखकर रुपये लिए। अब वह रुपये अदाकर ज्वैलरी वापस लेना चाहते हैं, लेकिन दुकान बंद होने के कारण ऐसा नहीं कर पा रहे। ऐसे में उन्हें ब्याज बढ़ने की चिंता सता रही है।
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सराफा कारोबारियों की हड़ताल का असर विवाह जैसे आयोजनों पर खास नहीं पड़ा, क्योंकि ज्यादातर लोग ऐसे मौकों के लिए ज्वैलरी आदि की व्यवस्था काफी पहले से कर लेते हैं। तेलियरगंज के सुरेश श्रीवास्तव के बेटे का विवाह छह मार्च को हुआ। उन्होंने अपनी बहू के लिए ज्वैलरी विवाह से करीब 20-25 दिन पहले ही खरीद ली। इसी तरह साधारण परिवार की राजरूपपुर निवासी नीलिमा वर्मा ने विवाह में अपनी बेटी को देने के लिए ज्वैलरी खरीदने का सिलसिला करीब दो माह पहले से शुरू कर दिया था। उनका कहना है कि सोना जैसी कीमत वस्तु एक साथ नहीं खरीद सकते तो कई बार में थोड़ी-थोड़ी खरीदारी की। ऐसे परिवार भी काफी हैं जो अपनी परिचित शॉप से ही ज्वैलरी खरीदते हैं सो विवाह जैसे अवसर पर उन्हें खास दिक्कत नहीं हुई, क्योंकि नियमित ग्राहक होने के कारण दुकानदार ने उन्हें ज्वैलरी उपलब्ध करा दी।
सराफा व्यापारियों की मूल समस्या एक प्रतिशत एक्साइज ड्यूटी है और वह यह टैक्स किसी भी तरह से देने को तैयार नहीं हैं। सराफा कारोबारी अतुल चोपड़ा का कहना है कि 80 के दशक में गोल्ड कंट्रोल एक्ट में व्यापारियों को काफी प्रताड़ित किया गया। इसलिए दोबारा ऐसा नहीं होने देना चाहते। इससे इंस्पेक्टर राज को बढ़ावा मिलेगा। कारीगर काम नहीं कर सकेंगे, क्योंकि उन्हें सर्वे और छापेमारी का डर सताता रहेगा। कहा कि इसके एवज में व्यापारी राजस्व की भरपाई को भी तैयार हैं। अगर सरकार इसकी वजह से कालाबाजारी खत्म करना चाहती है तो व्यापारी उसके लिए भी पूरी पारदर्शित के साथ तैयार हैं। इसके लिए बीच का रास्ता यह है कि सरकार और सराफा एसोसिएशन के पदाधिकारी बैठकर मंथन करें और एक्साइज ड्यूटी के स्थान पर सिंगल प्वाइंट टैक्स लगाने का निर्णय करें।