महत्वाकांक्षा के पीछे जेनेटिक कारण, चयन से पहले हो टेस्ट

अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Fri, 16 Oct 2015 01:36 AM IST
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इलाहाबाद (ब्यूरो)। हर्षद मेहता, चंद्रा स्वामी, यादव सिंह और अब अनिल यादव,  ऐसे नाम हैं जो महत्वाकांक्षा तथा इच्छाओं की पूर्ति के लिए जिस हद को पार कर गए हैं, उसे सामान्य व्यवहार नहीं कहा जा सकता है। ऐसे लोग निजी स्वार्थों की पूर्ति  और विलासितापूर्ण जीवन के चरम तक पहुंचने तथा अपनी जाति-वर्ग के लिए हर जोखिम उठाने को तैयार होते हैं। हैरत तो यह कि एक समय बाद वह आश्वस्त हो जाते हैं कि उन्हें कुछ होगा भी नहीं जबकि, आम आदमी उस हद को पार करना तो दूर, उस राह की ओर देखने से भी डरता है। दरअसल विशेषज्ञाें का मानना है कि इसके पीछे व्यक्ति विशेष के गलत अनुभवों की भूमिका तो है ही, जेनेटिक और मनोवैज्ञानिक कारण भी अहम हैं। ऐसे में लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष सहित ऐसे ही तमाम प्रमुख पदों पर नियुक्ति से पहले दावेदार का मनोवैज्ञानिक टेस्ट भी कराया जाना चाहिए।
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वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक और बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर जनक पांडेय कहते हैं, संविधान निर्माताओं ने भी नहीं सोचा होगा कि किसी संवैधानिक पद पर ऐसा संकट आएगा। इच्छाएं पूरी करने के लिए इस हद तक जाने के पीछे मनोवैज्ञानिक कारण भी है। जानकारों का मानना है कि अनिल यादव तथा उनकी सोच उक्त पद की योग्यता नहीं रखती। उनमें लोक सेवक के गुण नहीं थे। इसीलिए ऐसी परिस्थितियां पैदा र्हुइं। बेहतर होता यदि ऐसे पदों पर चयन से पहले डिग्रियों तथा चारित्रिक और मनोवैज्ञानिक परीक्षण भी किया जाता।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर विहैवियरल एंड कांग्निटिव साइंसेज के हेड प्रोफेसर नारायण श्रीनिवासन का कहना है कि अनुभव और जेनेटिक कारण व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित करते हैं। यह व्यक्ति पर निर्भर है जिससे वह महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। कई विभागों में महत्वपूर्ण पदों पर चयन के लिए मनोवैज्ञानिक टेस्ट का भी प्रावधान है। जाने-माने समाजशास्त्री इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर ए.सत्यनारायण कहते हैं, नौकरशाही और सत्ता के बीच ऐसा तालमेल खतरनाक होता है। माता-पिता की संस्कृति और परंपरा चली आ रही है। ऐसे लोगों का उदय इसी परंपरा की देन है। इच्छाओं की पूर्ति के लिए वे कुछ भी करने के लिए तैयार हैं जिससे ऐसे ही संकट खड़े होते हैं।
इलाहाबाद (ब्यूरो)। अनिल यादव के कार्यकाल में लोक सेवा आयोग की भर्तियों में जाति विशेष को नियमों के विपरीत जाकर लाभ पहुंचाने तथा अन्य नियुक्तिओं में भी उन्हीं को तवज्जो देने के आरोपों के बीच आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था पर सवाल खड़ा हो गया है। इस घटनाक्रम से यह साबित होता है कि जाति विशेष के लोगों को सभी नियमों को ताक पर रखकर लाभ पहुंचाया गया। जबकि, उन्हें आरक्षण का लाभ पहले से मिल रहा है। इससे अन्य वर्ग के लोगों पर दोहरी मार पड़ रही है। सरकारें ऐसे लोगों के बारे में भी नहीं सोच रही हैं जिनकी आर्थिक स्थिति काफी खराब है और आरक्षण के सही मायने में हकदार हैं। ऐसे लाचार लोग हर वर्ग में हैं, लेकिन इस तरह से दोहरी मार पड़ने से आहत बुद्धिजीवियों तथा युवाओं का बड़ा वर्ग आरक्षण पर पुनर्विचार के पक्ष में खड़ा हो गया है। उनका साफ तौर पर कहना है कि आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था से पात्र अभ्यर्थियों को लाभ नहीं मिल रहा है। इसलिए आरक्षण को नए सिरे से परिभाषित किए जाने की जरूरत है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग के प्रोफेसर जटाशंकर का कहना है कि 67 वर्षों में समाज का ढांचा बदल गया है। प्रोफेसर, आईएएस तथा अन्य प्रमुख पदों पर हर वर्ग के लोगों की बड़ी जमात है। आगे भी उन्हीं के बच्चों को आरक्षण का लाभ मिल रहा है। इसका दूसरा पक्ष है कि वास्तविक पात्र इससे वंचित हैं जबकि हर वर्ग में गरीब हैं। इसलिए अब जरूरी है कि जन्म के आधार पर नहीं बल्कि आर्थिक आधार पर आरक्षण हो। संवैधानिक तरीके से इसमें बदलाव के लिए विशेषज्ञों को पहल करनी चाहिए।

प्रतियोगी डॉ.राजेश माथुर का कहना है कि जो लोग एक बार लाभ पा चुके हैं उनके बच्चों को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए। ऐसा नहीं होने से उन बिरादरियों में भी सभी पद कुछ परिवारों के लिए आरक्षित हो गए हैं। जरूरी है कि आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को आरक्षण का लाभ मिले। आशीष मिश्रा का कहना है कि यह संविधान की मंशा के भी विपरीत है। जरूरी है कि आरक्षण को नए सिरे से परिभाषित किया जाए। ज्योति, अमित सिंह का कहना है कि गुजरात में पटेल आंदोलन के बाद इसे लेकर पूरे देश में बहस छिड़ गई है। अब इस पर सार्थक पहल की जरूरत है।

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