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रद्दी कॉपियों को बेचने में लाखों का हेरफेर

Sun, 12 Aug 2018 12:15 AM IST
अमर उजाला ब्यूूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूूरो, इलाहाबाद Updated Sun, 12 Aug 2018 12:15 AM IST
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froud in raw material
allahabad university
 इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि) में प्रवेश परीक्षा की रद्दी बुकलेट और वार्षिक परीक्षा की रद्दी बुकलेट बेचने में लाखों का हेरफेर हुआ। रद्दी बुकलेट की नीलामी की प्रक्रिया पर प्रधान निदेशक केंद्रीय लेखा परीक्षा, लखनऊ की ब्रांच शाखा इलाहाबाद ने ऑडिट आपत्ति लगाई है और कुछ बिंदुओं पर इविवि प्रशासन से जवाब भी मांगा है। ऑडिट में यह बात सामने आई है कि इविवि प्रशासन और ठेकेदार ने निविदा की शर्तों का पालन नहीं किया और ठेकेदार ने लाखों रुपये का भुगतान भी नहीं किया।
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इविवि में प्रवेश परीक्षा 2014-15 की बुकलेट और वार्षिक परीक्षा 2013-14 की उपयोग की जा चुकीं उत्तर पुस्तिकाओं को बेचने के लिए निविदा हुई थी और निविदा नीलामी के लिए एक समिति का गठन किया गया था। समिति की 22 अप्रैल 2016 को हुई बैठक में तय हुआ था कि नीलामी की दर वेबसाइट पर अपलोड की जाएगी। कमेटी ने पूर्व में नीलाम की गईं पुरानी उत्तर पुस्तिकाओं में घटतौली की आशंका को देखते हुए यह निर्णय भी लिया कि ठेकेदार की ओर से विश्वविद्यालय परिसर में किराये पर इलेक्ट्रॉनिक तौल मशीन लगाई जाएगी और इन्हें तौलने का कार्य कुलसचिव एवं परीक्षा नियंत्रक के प्रतिनिधियों की देखरेख में किया जाएगा। निविदा शरद ट्रेडर कंपनी को मिली।
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ऑडिट टीम ने जांच में पाया कि कॉपियां तौलवाने के लिए विश्वविद्यालय से बाहर ले जाई गईं। जिन वाहनों पर कॉपियां रखी गईं, उन वाहनों का कोई गेट पास भी नहीं बनाया गया जबकि, इसकी जिम्मेदारी स्टेट अफसर की होती है। ऐसे में तत्कालीन स्टेट अफसर की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। ऑडिट में यह भी सामने आया है कि 11.45 रुपये प्रति किलो की दर से 65305 किलो बुकलेट का मूल्य सात लाख 47 हजार 742 रुपये और 24.52 रुपये प्रति किलो की दर से 16850 किलो उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्य चार लाख 13 हजार 162 रुपये यानी कुल 11 लाख 60 हजार 904 रुपये होता है जबकि शरद ट्रेडिंग कंपनी ने विश्वविद्यालय के खाते में सात लाख 32 हजार 654 रुपये ही जमा कराए। ऐसे में बाकी लाखों रुपये का हिसाब नहीं मिल रहा है। इसके अलावा ठेकेदार ने निविदा शर्तों के विपरीत सिक्योरिटी मनी के रूप में 50 हजार रुपये भी जमा नहीं किए।
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‘ऑडिट आपत्ति का जवाब दिया जा रहा है। इसकी जांच भी की जाएगी कि रद्दी कॉपियों को बेचने में कमेटी के निर्णय का अनुपालन हुआ या नहीं।’ प्रो. हर्ष कुमार, पीआरओ, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
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