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शुरुआत से रही संजीव में नेतृत्व क्षमता
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Fri, 31 Jul 2015 01:58 AM IST
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इलाहाबाद। मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एमएनएनआईटी) के पुराछात्र संजीव चतुर्वेदी ने एशिया का नोबेल पुरस्कार कहे जाने वाले रेमन मैग्सेसे पुरस्कार जीतकर संस्थान का नाम रोशन किया है। संजीव ने 1995 में संस्थान से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया था। लखनऊ के मूल निवासी संजीव को इससे पहले राष्ट्रीय स्तर पर अनेक सम्मान मिल चुके हैं। इससे पहले संस्थान से बीटेक करने वाले दीप जोशी को 2009 में यह सम्मान मिल चुका है। दीप और संजीव दोनों को लीक से अलग हटकर काम करने के लिए यह सम्मान मिला। दीप को सामुदायिक नेतृत्व जबकि 2015 में संजीव चतुर्वेदी को उभरते नेतृत्व के लिए यह सम्मान दिया गया।
एमएनएनआईटी के पुराछात्र संजीव को एशिया का सर्वोच्च पुरस्कार दिए जाने के बाद संस्थान में उल्लास का माहौल है। इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग के डॉ.आरके सिंह का कहना है कि 1995 में संस्थान मोतीलाल नेहरू रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज के रूप में जाना जाता था। तब इंजीनियरिंग में प्रवेश पाना बहुत कठिन था। संजीव ने उस दौर में बीटेक में प्रवेश लिया था। उसमें शुरुआत से ही नेतृत्व क्षमता थी, वह मेधावी होने के साथ संस्थान और कक्षा में नियमित उपस्थिति रहता था। नौकरी में आने के बाद संजीव की ईमानदारी के चर्चे रहे, अब उसे अपने काम के लिए इतना बड़ा सम्मान मिला है, यह गर्व की बात है।
फिलहाल शिमला में केन्द्र सरकार के प्रोजेक्ट निदेशक और संजीव के सहपाठी रहे कानपुर के कमल कांत का कहना है कि संजीव इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान ही संस्थान से जुड़ी सोशल एक्टिविटी में बढ़ चढ़कर शामिल होता था। उसमें नेतृत्व क्षमता थी, वह पढ़ने में मेधावी था, छात्र जीवन से ही वह कुछ अलग करने की चर्चा मित्रों से करता रहता था। पढ़ाई के अतिरिक्त वह देश-प्रदेश की गतिविधियों को लेकर भी अपडेट रहता, चर्चा करता। वह डेलीगेसी में रहकर पढ़ाई कर रहा था, इसलिए छात्रावास से जुड़ी गतिविधि में उसकी भागीदारी कम थी। अब संजीव को मैग्सेसे पुरस्कार मिलना सुखद है।
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एमएनएनआईटी के पुराछात्र संजीव को एशिया का सर्वोच्च पुरस्कार दिए जाने के बाद संस्थान में उल्लास का माहौल है। इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग के डॉ.आरके सिंह का कहना है कि 1995 में संस्थान मोतीलाल नेहरू रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज के रूप में जाना जाता था। तब इंजीनियरिंग में प्रवेश पाना बहुत कठिन था। संजीव ने उस दौर में बीटेक में प्रवेश लिया था। उसमें शुरुआत से ही नेतृत्व क्षमता थी, वह मेधावी होने के साथ संस्थान और कक्षा में नियमित उपस्थिति रहता था। नौकरी में आने के बाद संजीव की ईमानदारी के चर्चे रहे, अब उसे अपने काम के लिए इतना बड़ा सम्मान मिला है, यह गर्व की बात है।
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फिलहाल शिमला में केन्द्र सरकार के प्रोजेक्ट निदेशक और संजीव के सहपाठी रहे कानपुर के कमल कांत का कहना है कि संजीव इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान ही संस्थान से जुड़ी सोशल एक्टिविटी में बढ़ चढ़कर शामिल होता था। उसमें नेतृत्व क्षमता थी, वह पढ़ने में मेधावी था, छात्र जीवन से ही वह कुछ अलग करने की चर्चा मित्रों से करता रहता था। पढ़ाई के अतिरिक्त वह देश-प्रदेश की गतिविधियों को लेकर भी अपडेट रहता, चर्चा करता। वह डेलीगेसी में रहकर पढ़ाई कर रहा था, इसलिए छात्रावास से जुड़ी गतिविधि में उसकी भागीदारी कम थी। अब संजीव को मैग्सेसे पुरस्कार मिलना सुखद है।
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