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पुरुब से निकलै सुरुजदेव लीन्हीं अरघा हमार
अमर उजाला ब्यूरो, प्रयागराज
Updated Thu, 15 Nov 2018 01:53 AM IST
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प्रयागराज
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो,प्रयागराज
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दीपावली के बाद से ही पल-पल प्रतीक्षा में बीता। पहले नहाय-खाय और फिर खरना से आरंभ छत्तीस घंटे का निर्जला व्रत बुधवार को उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया। साथ ही बेटे और पति सहित परिवार की मंगलकामना के लिए छठी मइया और सूर्यदेव से आशीष मांगा। अर्घ्य देने के साथ ही चार दिनी डाला छठ व्रत का संकल्प पूरा हुआ तो सूर्य की पहली किरण के साथ व्रतियों के चेहरे खिल उठे।
यमुना किनारे बरगद घाट, बलुआघाट, गऊघाट, किलाघाट से संगम, दशाश्वमेध घाट, सलोरी, द्रौपदी घाट सहित गंगा-यमुना के अन्य घाटों पर व्रती महिलाओं का जमावड़ा हुआ। सबसे ज्यादा व्रती महिलाएं संगम पर जुटीं। अधिकतर व्रती महिलाओं ने पीला, साफ-सुथरे या नए कपड़े पहने पर नवविवाहिताओं ने शादी वाला जोड़ा निकाला। ओढ़नी, चुन्नी के साथ पूरा साज-सिंगार भी वही रहा। सूर्य देव के निकलने से पहले ही घाट पर ईख लगाने, वेदी सजाने सहित पूजा की तैयारियां पूरी कर ली गई थीं।
पूर्व संध्या पर जहां वेदी बनाई गई थी, वही वेदी फिर सजाई गई। घुटना या कमर भर पानी में खड़ी होकर महिलाएं सूर्योदय की प्रतीक्षा करती रहीं। पहली किरण के साथ उन्होंने अर्घ्य दिया। हालांकि यह क्रम सूर्योदय के बाद भी कई घंटे तक जारी रहा। दरअसल जो जैसे-जैसे आता गया, घाट पर पूजा करके घर की ओर लौटता रहा। व्रतियों के चेहरे पर आस्था की दमक तो रही ही, परिवार के अन्य सदस्य भी खासा उत्साहित दिखे। वे महिलाएं भी पूजा में शामिल हुईं, जिन्होंने मनौती मान रखी थी पर उनकी पूजा किसी और को करनी थी।
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अर्घ्य के बाद घर लौटकर महिलाओं ने घर-परिवार के बड़े-बुजुर्गों के पांव छूकर आशीर्वाद लिया। फिर कोई मीठी चीज खाकर व्रत का पारण किया। इससे पहले गोसाई कमरे में कुल देवता के सामने डाला खोलकर रखा और सभी को प्रसाद बांटा गया। पूजा में फिर पूरा परिवार जुटा। परंपरानुसार पति पूजा का डाला सिर पर रखकर घाट तक लाए और पूजा के बाद वही घर तक ले भी गए। सूप के अग्रभाग में जलता हुआ दीपक ऊर्जा देता रहा।
व्रती महिलाओं का उत्साह ऐसा था कि जल पर सूर्यदेव के आभा बिखेरने से पहले ही वे घाटों पर पहुंच गई थीं। भोर से कई घंटे पहले भोर हुई। घाट की ओर जाने वाले रास्तों पर चहल-पहल बढ़ गई थी। परिवार के सदस्य तो साथ ही तैयार हुए, पड़ोस की व्रती महिलाओं को भी जल्द तैयार होकर साथ चलने के लिए चेताया गया। घर से व्रती महिलाएं परिवार के सदस्यों के साथ निकलीं तो अन्य व्रती महिलाएं भी संग हो लीं। परंपरा के जुड़ाव को बच्चे और बेटियां भी काफी उत्साहित रहीं। घर से घाट तक मंगलगीतों का सिलसिला जारी रहा।
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यमुना किनारे बरगद घाट, बलुआघाट, गऊघाट, किलाघाट से संगम, दशाश्वमेध घाट, सलोरी, द्रौपदी घाट सहित गंगा-यमुना के अन्य घाटों पर व्रती महिलाओं का जमावड़ा हुआ। सबसे ज्यादा व्रती महिलाएं संगम पर जुटीं। अधिकतर व्रती महिलाओं ने पीला, साफ-सुथरे या नए कपड़े पहने पर नवविवाहिताओं ने शादी वाला जोड़ा निकाला। ओढ़नी, चुन्नी के साथ पूरा साज-सिंगार भी वही रहा। सूर्य देव के निकलने से पहले ही घाट पर ईख लगाने, वेदी सजाने सहित पूजा की तैयारियां पूरी कर ली गई थीं।
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पूर्व संध्या पर जहां वेदी बनाई गई थी, वही वेदी फिर सजाई गई। घुटना या कमर भर पानी में खड़ी होकर महिलाएं सूर्योदय की प्रतीक्षा करती रहीं। पहली किरण के साथ उन्होंने अर्घ्य दिया। हालांकि यह क्रम सूर्योदय के बाद भी कई घंटे तक जारी रहा। दरअसल जो जैसे-जैसे आता गया, घाट पर पूजा करके घर की ओर लौटता रहा। व्रतियों के चेहरे पर आस्था की दमक तो रही ही, परिवार के अन्य सदस्य भी खासा उत्साहित दिखे। वे महिलाएं भी पूजा में शामिल हुईं, जिन्होंने मनौती मान रखी थी पर उनकी पूजा किसी और को करनी थी।
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अर्घ्य के बाद घर लौटकर महिलाओं ने घर-परिवार के बड़े-बुजुर्गों के पांव छूकर आशीर्वाद लिया। फिर कोई मीठी चीज खाकर व्रत का पारण किया। इससे पहले गोसाई कमरे में कुल देवता के सामने डाला खोलकर रखा और सभी को प्रसाद बांटा गया। पूजा में फिर पूरा परिवार जुटा। परंपरानुसार पति पूजा का डाला सिर पर रखकर घाट तक लाए और पूजा के बाद वही घर तक ले भी गए। सूप के अग्रभाग में जलता हुआ दीपक ऊर्जा देता रहा।
व्रती महिलाओं का उत्साह ऐसा था कि जल पर सूर्यदेव के आभा बिखेरने से पहले ही वे घाटों पर पहुंच गई थीं। भोर से कई घंटे पहले भोर हुई। घाट की ओर जाने वाले रास्तों पर चहल-पहल बढ़ गई थी। परिवार के सदस्य तो साथ ही तैयार हुए, पड़ोस की व्रती महिलाओं को भी जल्द तैयार होकर साथ चलने के लिए चेताया गया। घर से व्रती महिलाएं परिवार के सदस्यों के साथ निकलीं तो अन्य व्रती महिलाएं भी संग हो लीं। परंपरा के जुड़ाव को बच्चे और बेटियां भी काफी उत्साहित रहीं। घर से घाट तक मंगलगीतों का सिलसिला जारी रहा।