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Prayagraj Sangam : प्रायश्चित, स्वाध्याय और संस्कार के लिए किया श्रावणी उपाकर्म, गूंजते रहे वैदिक मंत्र

Mon, 19 Aug 2024 12:17 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 19 Aug 2024 12:17 PM IST
सार

पौराणिक मान्यता के अनुसार श्रावणी धार्मिक स्वाध्याय के प्रचार का पर्व है। सद्ज्ञान, बुद्धि, विवेक और धर्म की वृद्धि के लिए इसे निर्मित किया गया, इसलिए इसे ब्रह्मपर्व भी कहते हैं। श्रावणी पर रक्षाबंधन बड़ा ही हृदयग्राही है। श्रावणी वैदिक पर्व है। प्राचीन काल में ऋषि-मुनि इसी दिन से वेद पारायण आरंभ करते थे।

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For self-purification, performed Shravani Upakarma while standing in the Ganges, invoking L
संगम के जल में खड़े होकर श्रावणी उपाकर्म करते बटुक और ब्राह्मण समाज के लोग। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

प्रायश्चित, स्वाध्याय और संस्कार के लिए श्रावणी सोमवार को ब्राह्मण समाज की ओर से श्रावणी उपाकर्म किया गया। संगम के जल में खड़े होकर विधि विधान से परंपरागत तरीके से पूजन अर्चन करते हुए नया यज्ञोपपीत धारण किया गया। इसमें बड़ी संख्या में बटुकों ने भी हिस्सा लिया। जाने-अनजाने में हुए पाप के लिए प्रायश्चित किया गया।हिमाद्री संकल्प के साथ विप्र समाज ने वैदिक कालीन परंपरा का निर्वहन किया। पूजन में उपस्थित सभी तीर्थपुरोहितों, विप्रों और बटुकों ने मंत्रोच्चार के साथ पंचगव्य से स्नान कर भस्म लेपन किया।

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ब्राह्मणों ने किया वेद परंपरा का पालन

पौराणिक मान्यता के अनुसार श्रावणी धार्मिक स्वाध्याय के प्रचार का पर्व है। सद्ज्ञान, बुद्धि, विवेक और धर्म की वृद्धि के लिए इसे निर्मित किया गया, इसलिए इसे ब्रह्मपर्व भी कहते हैं। श्रावणी पर रक्षाबंधन बड़ा ही हृदयग्राही है। श्रावणी वैदिक पर्व है। प्राचीन काल में ऋषि-मुनि इसी दिन से वेद पारायण आरंभ करते थे। इसे ‘उपाकर्म’ कहा जाता था। वेद का अर्थ है-सद्ज्ञान और ऋषि का तात्पर्य है वे आप्त महामानव जिनकी अपार करुणा के फलस्वरूप वह सुलभ-सरल हो सका। सद्ज्ञान का वरण जितना आवश्यक है और जिनसे वह प्राप्त हुआ था, जिनके परिश्रम, त्याग, तप व करूणा से सुगम हो सका, उनके द्रष्टा ऋषि-मनीषियों को भी उतना ही श्रद्धास्पद मानना चाहिए एवं उनके प्रति हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए।

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सद्कर्म का संकल्प

श्रावणी पर्व पर द्विजत्व के संकल्प का नवीनीकरण किया जाता है। उसके लिए परंपरागत ढंग से तीर्थ अवगाहन, दशस्नान, हिमाद्रि संकल्प एवं तर्पण आदि कर्म किए जाते हैं। श्रावणी के कर्मकाण्ड में पाप-निवारण के लिए हेमाद्रि संकल्प कराया जाता है, जिसमें भविष्य में पातकों, उपपातकों और महापातकों से बचने, परद्रव्य अपहरण न करने, परनिंदा न करने, आहार-विहार का ध्यान रखने, हिंसा न करने , इंद्रियों का संयम करने एवं सदाचरण करने की प्रतिज्ञा ली जाती है।










यह सृष्टि नियंता के संकल्प से उपजी है। हर व्यक्ति अपने लिए एक नई सृष्टि करता है। यह सृष्टि यदि ईश्वरीय योजना के अनुकूल हुई, तब तो कल्याणकारी  परिणाम उपजते हैं, अन्यथा अनर्थ का सामना करना पड़ता है। अपनी सृष्टि में चाहने, सोचने तथा करने में कहीं भी  विकार आया हो, तो उसे हटाने तथा नई शुरुआत करने के लिए हिमाद्रि संकल्प करते हैं। ऐसी क्रिया और भावना ही कर्मकांड का प्राण है।

ब्रह्मा, वेद एवं ऋषियों का आह्वान

श्रावणी पर्व पर सामान्य देवपूजन के अतिरिक्त विशेष पूजन के अन्तर्गत ब्रह्मा, वेद एवं ऋषियों का आह्वान किया जाता है। ब्रह्मा सृष्टि कर्ता हैं। ब्राह्मीचेतना का वरण करने एवं अनुशासन के पालन करने से ही अभीष्ट की प्राप्ति हो सकती है। उस विधा को अपनाने, जानने एवं अभ्यास में लाने वाले ही श्रेष्ठता के प्रतीक-पर्याय होते हैं। इस पर्व पर ज्ञान के अवतरण की वेदों के रूप में अभ्यर्थना की जाती है। ज्ञान से ही विकास का आरंभ होता है। अज्ञान ही अवनति का मूल है। अज्ञान से अशांति पनपती और अशक्ति अभाव को जन्म देती है। ज्ञान का प्रत्यक्षीकरण करने के लिए वेदपूजन किया जाता है।

ऋषि पूजन का महत्व

ऋषि पूजन के पीछे उच्चतम आदर्श की परिकल्पना निहित है। ऋषि जीवन ने ही महानतम जीवनश्चर्या का विकास और अभ्यास करने में सफलता पाई थी। ऋषि जीवन आंतरिक समृद्धि एवं ऐश्वर्य का प्रतीक है। यह सौम्य  जीवन के सुख और मधुरता का पर्याय है। आज के समाज की भटकन का कारण ऋषित्व का घनघोर अभाव है। इस पूजन से इन्हीं तत्त्वों की वृद्धि की कामना की जाती है। 

वेदमंत्रो से अभिमंत्रित रक्षासूत्र

रक्षाबंधन का पर्व भी इसी दिन मनाया जाता है। रक्षासूत्रों को ऋषि, मुनि, ब्राह्मण वेदमंत्रों से अभिमंत्रित करते थे। तप और त्याग की शक्ति का मिलन एवं वेदमंत्रों के साथ योग-संयोग अति प्रभावशाली होता है। इस क्रम में श्रेष्ठ आचार्य अपने यजमानों को रक्षासूत्र बांधते हैं।

प्रकृति से जुड़ाव

रक्षाबंधन पूज्य श्रद्धास्पद व्यक्तियों अथवा कन्याओं से कराया जाता है। श्रावणी और रक्षाबंधन की स्मृति को प्रगाढ़ करने के लिए वृक्षारोपण का भी प्रावधान है। वृक्ष परोपकार के प्रतीक हैं, जो बिना कुछ मांगे हमको  शीतल छाया, फल और हरियाली प्रदान करते हैं। मानव जीवन के ये करीब के सहयोगी हैं और सदैव हमारी सेवा में तत्पर रहते हैं। अतः हमें भी इनकी सेवा तथा देखभाल करनी चाहिए। 

सामूहिक कल्याण की भावना

शास्त्रोक्त  मान्यता है कि अनुकूल मौसम में वृक्षारोपण करने पर अनंत गुणा पुण्य लाभ होता है। अतः श्रावणी पर्व से अपने जीवन को सत्पथ पर बढ़ाने, रक्षासूत्र द्वारा नारी के प्रति पवित्रता का भाव रखने तथा वृक्षारोपण द्वारा इन भावनाओं को क्रियाओं में परिणत करने का संकल्प लिया जाता है जो कि इस पर्व का प्राण है। इसे हम सबको पूरा करना चाहिए। इसी में हमारी पर्व परंपरा के साथ-साथ सामूहिक कल्याण निहित है।

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