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करबला में दफनाए गए अकीदत के फूल
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sat, 22 Sep 2018 01:16 AM IST
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इलाहाबाद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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अबकी बड़ा और बुड्ढा ताजिया सहित तमाम जुलूस भले ही नहीं निकले लेकिन यौमे आशूरा दसवीं मुहर्रम को गमे हुसैन की सदाएं उसी जोश के साथ बुलंद हुईं। सिर पर हरी और लाल पट्टियां बांधे गमे हुसैन में शरीक बच्चे, युवा और बुजुर्ग ‘या अली, या हुसैन’ की सदाओं के साथ करबला पहुंचे। फूलों की गाड़ियों के साथ हुसैनियों का हुजूम उमड़ा। कीडगंज, दरियाबाद, रानीमंडी, रसूलपुर से लेकर करबला तक का पूरा शहर गमे हुसैन मनाने में मशगूल रहा। हर ओर या अली, या हुसैन की सदाएं फिजा में गूंजतीं रहीं।
पैगंबरे इस्लाम हजरत मुहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन और उनके 71 साथियों की करबला में शहादत की याद में शुक्रवार को रवायत के मुताबिक बुड्ढा और बड़ा ताजिया सहित शहर के तमाम ताजियों के अतिरिक्त अलम, मेहंदी, झूला जुलूसों के अकीदत के फूल करबला के अतिरिक्त धूमनगंज, बेगमसराय, सदर बाजार-राजापुर, अशोक नगर, छोटा बघाड़ा, बड़ा बघाड़ा करबला में दफन किए गए। तकरीबन 27 मोहल्लों के ताजियादारों की ओर से निकाले गए कुल 62 अलम, ताजिया, मेहंदी, झूला आदि के फूल शामिल रहे।
रवायतन सबसे पहले बुड्ढ़ा ताजिया, फिर झूले के फूल और फिर बड़ा ताजिया के फूल करबला पहुंचे, जहां नम आंखों से अकीदत के फूलों को दफनाया गया। बाकी अलग-अलग मोहल्लों के फूल बारी-बारी से आते और करबला में दफनाए जाते रहे। सुबह से ही शुरू यह सिलसिला शाम तक जारी रहा। शहर के अलग-अलग मोहल्लों से अकीदतमंदों के हुजूम के साथ फूलों से लदी गाडियां खुल्दाबाद चौराहा, हिम्मतगंज फाटक पार करने के बाद अल्लामाई तिराहा (मछली मंडी) होते हुए पुलिस चौकी पहुंचीं। यहां से बाएं मुडकर जीटी रोड से होते हुए सभी गाड़ियां करबला पहुंचीं, जहां अकीदत के फूलों को दफनाया गया।
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फूलों को करबला में दफन करने के बाद शहीदे आजम की यादों सहित सब्र और इंसानियत का सबक लेकर लेकर अकीदतमंद घरों की ओर लौटे। अंत में अमन के लिए दुआएं भी मांगी गईं। जुलूस के रास्तों पर अलग ही मंजर रहा। रास्ते के दोनों ओर खड़े लोगों और मकानों के बारजों पर बैठी महिलाओं, बच्चों ने बेताबी से पूरा मंजर देखा। इमामबाड़ों से लेकर करबला तक हुसैन के शैदाइयों की कतारें लगी रहीं। फूलों को दफनाने, जुलूस और करबला के करीब इंतजाम में असरार नियाजी, हफीज खान, मजरुल हक, निसार खां, डॉ.मोहम्मद असलम, शमीम अहमद, गुलजार अहमद, मोहम्मद रफीक सहित बड़ी संख्या में अकीदतमंद शामिल थे।
गुलामाने पंजतन एकता कमेटी की ओर से संरक्षक हाजी मुश्ताक अहमद की देखरेख में करेली लेबर चौराहा ढाल के नीचे से ताजियादार सैयद कमरुद्दीन, जावेद अख्तर अंसारी की सरपरस्ती में लकी की मेहंदी के फूलों को करबला ले जाया गया। बाद में शीरनी रखकर लोगों ने नियाज और फातिहा पढ़ी। अमन के लिए दुआएं भी मांगी गईं।
चकिया करबला से इतर हुए दफन
0 आठ मेहंदी, तीन अलम, एक झूला/धूमनगंज करबला
0 पांच मेहंदी, तीन अलम, दो झूला/बेगमसराय करबला
0 दो मेहंदी/सदर बाजार-राजापुर करबला
0 एक मेहंदी/कर्नलगंज करबला
अबकी कानूनी अड़चनों से कई जुलूस, ताजिये नहीं सजे, निकले। इसमें दरियाबाद के सात ताजिया, धूमनगंज, नीवां, पीएसी गेट के पीछे आदि के ताजिये शामिल हैं। दरअसल ये सभी मुहर्रम जुलूस वाली किताब में तो शामिल हैं लेकिन प्रशासन के त्योहार रजिस्टर में नहीं शामिल थे। ऐसे में प्रशासन ने इनके लिए अनुमति नहीं दी। मुहर्रम पर करबला जाने वाले रास्तों पर लाल, हरी पट्टियां और खिलौनों वाली तलवारें सड़क किनारे पटरियों और ठेलों पर बिकीं। बच्चों के लिए करबला के पास मेले जैसा माहौल रहा, जहां बच्चों ने अपने लिए खेल-खिलौने खरीदे और मनपसंद चीजें खाईं।
दसवीं मुहर्रम पर करबला तक पहुंचने वाले जुलूसों को नियंत्रित करने के लिए खुल्दाबाद चौराहे और करबला सहित कई जगहों पर नियंत्रण कक्ष बनाए गए थे। यहां से फूल वाली गाड़ियों सहित लंगर ले जाने वाली गाड़ियों को जाने या रुकने के लिए जरूरी हिदायतें दी जाती रहीं। नागरिक सुरक्षा कोर के स्वयंसेवकों ने भी मदद की। मुहर्रम के दौरान चौक, नखासकोहना, गुरुद्वारा खुल्दाबाद, हिम्मतगंज आदि जगहों पर लंगर और पीने के पानी का इंतजाम किया गया था। इस काम में गैर मुस्लिम संस्थाओं ने भी शिरकत करते हुए अकीदतमंदों का ख्याल रखा। गुरुद्वारा के सामने तो लंगर और पानी लेने के लिए होड़ मची रही। कई संस्थाओं की ओर से कैंप लगाकर लंगर बांटा गया। जैक सेवा ट्रस्ट की ओर से हिम्मतगंज में शिविर लगाकर जायरीन को पानी, बिस्किट, चाय आदि का वितरण किया गया। सदस्यों ने खोये हुए बच्चों को उनके परिजनों से भी मिलवाया। शिविर में सिराज खान, शाहिद हसन, महमूद खान, नदीन खां, आरपी सिन्हा, चांद, शिवचंद्र कुशवाहा, मो अजमल, वसीम उल्ला अंसारी, धर्मेंद्र सिंह आदि शमिल थे।
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पैगंबरे इस्लाम हजरत मुहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन और उनके 71 साथियों की करबला में शहादत की याद में शुक्रवार को रवायत के मुताबिक बुड्ढा और बड़ा ताजिया सहित शहर के तमाम ताजियों के अतिरिक्त अलम, मेहंदी, झूला जुलूसों के अकीदत के फूल करबला के अतिरिक्त धूमनगंज, बेगमसराय, सदर बाजार-राजापुर, अशोक नगर, छोटा बघाड़ा, बड़ा बघाड़ा करबला में दफन किए गए। तकरीबन 27 मोहल्लों के ताजियादारों की ओर से निकाले गए कुल 62 अलम, ताजिया, मेहंदी, झूला आदि के फूल शामिल रहे।
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रवायतन सबसे पहले बुड्ढ़ा ताजिया, फिर झूले के फूल और फिर बड़ा ताजिया के फूल करबला पहुंचे, जहां नम आंखों से अकीदत के फूलों को दफनाया गया। बाकी अलग-अलग मोहल्लों के फूल बारी-बारी से आते और करबला में दफनाए जाते रहे। सुबह से ही शुरू यह सिलसिला शाम तक जारी रहा। शहर के अलग-अलग मोहल्लों से अकीदतमंदों के हुजूम के साथ फूलों से लदी गाडियां खुल्दाबाद चौराहा, हिम्मतगंज फाटक पार करने के बाद अल्लामाई तिराहा (मछली मंडी) होते हुए पुलिस चौकी पहुंचीं। यहां से बाएं मुडकर जीटी रोड से होते हुए सभी गाड़ियां करबला पहुंचीं, जहां अकीदत के फूलों को दफनाया गया।
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फूलों को करबला में दफन करने के बाद शहीदे आजम की यादों सहित सब्र और इंसानियत का सबक लेकर लेकर अकीदतमंद घरों की ओर लौटे। अंत में अमन के लिए दुआएं भी मांगी गईं। जुलूस के रास्तों पर अलग ही मंजर रहा। रास्ते के दोनों ओर खड़े लोगों और मकानों के बारजों पर बैठी महिलाओं, बच्चों ने बेताबी से पूरा मंजर देखा। इमामबाड़ों से लेकर करबला तक हुसैन के शैदाइयों की कतारें लगी रहीं। फूलों को दफनाने, जुलूस और करबला के करीब इंतजाम में असरार नियाजी, हफीज खान, मजरुल हक, निसार खां, डॉ.मोहम्मद असलम, शमीम अहमद, गुलजार अहमद, मोहम्मद रफीक सहित बड़ी संख्या में अकीदतमंद शामिल थे।
गुलामाने पंजतन एकता कमेटी की ओर से संरक्षक हाजी मुश्ताक अहमद की देखरेख में करेली लेबर चौराहा ढाल के नीचे से ताजियादार सैयद कमरुद्दीन, जावेद अख्तर अंसारी की सरपरस्ती में लकी की मेहंदी के फूलों को करबला ले जाया गया। बाद में शीरनी रखकर लोगों ने नियाज और फातिहा पढ़ी। अमन के लिए दुआएं भी मांगी गईं।
चकिया करबला से इतर हुए दफन
0 आठ मेहंदी, तीन अलम, एक झूला/धूमनगंज करबला
0 पांच मेहंदी, तीन अलम, दो झूला/बेगमसराय करबला
0 दो मेहंदी/सदर बाजार-राजापुर करबला
0 एक मेहंदी/कर्नलगंज करबला
अबकी कानूनी अड़चनों से कई जुलूस, ताजिये नहीं सजे, निकले। इसमें दरियाबाद के सात ताजिया, धूमनगंज, नीवां, पीएसी गेट के पीछे आदि के ताजिये शामिल हैं। दरअसल ये सभी मुहर्रम जुलूस वाली किताब में तो शामिल हैं लेकिन प्रशासन के त्योहार रजिस्टर में नहीं शामिल थे। ऐसे में प्रशासन ने इनके लिए अनुमति नहीं दी। मुहर्रम पर करबला जाने वाले रास्तों पर लाल, हरी पट्टियां और खिलौनों वाली तलवारें सड़क किनारे पटरियों और ठेलों पर बिकीं। बच्चों के लिए करबला के पास मेले जैसा माहौल रहा, जहां बच्चों ने अपने लिए खेल-खिलौने खरीदे और मनपसंद चीजें खाईं।
दसवीं मुहर्रम पर करबला तक पहुंचने वाले जुलूसों को नियंत्रित करने के लिए खुल्दाबाद चौराहे और करबला सहित कई जगहों पर नियंत्रण कक्ष बनाए गए थे। यहां से फूल वाली गाड़ियों सहित लंगर ले जाने वाली गाड़ियों को जाने या रुकने के लिए जरूरी हिदायतें दी जाती रहीं। नागरिक सुरक्षा कोर के स्वयंसेवकों ने भी मदद की। मुहर्रम के दौरान चौक, नखासकोहना, गुरुद्वारा खुल्दाबाद, हिम्मतगंज आदि जगहों पर लंगर और पीने के पानी का इंतजाम किया गया था। इस काम में गैर मुस्लिम संस्थाओं ने भी शिरकत करते हुए अकीदतमंदों का ख्याल रखा। गुरुद्वारा के सामने तो लंगर और पानी लेने के लिए होड़ मची रही। कई संस्थाओं की ओर से कैंप लगाकर लंगर बांटा गया। जैक सेवा ट्रस्ट की ओर से हिम्मतगंज में शिविर लगाकर जायरीन को पानी, बिस्किट, चाय आदि का वितरण किया गया। सदस्यों ने खोये हुए बच्चों को उनके परिजनों से भी मिलवाया। शिविर में सिराज खान, शाहिद हसन, महमूद खान, नदीन खां, आरपी सिन्हा, चांद, शिवचंद्र कुशवाहा, मो अजमल, वसीम उल्ला अंसारी, धर्मेंद्र सिंह आदि शमिल थे।