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पहले बीटेक, फिर आईएएस की ललक से लग रहा झटका
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Fri, 27 May 2016 01:32 AM IST
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- फोटो : ias officer
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प्रशासनिक अफसरों को मिली ताकत और चकाचौंध कर देने वाली लाइफ स्टाइल के प्रभाव में इंजीनियरिंग और मेडिकल के विद्यार्थी भी हैं। बीटेक और एमबीबीएस के बाद सिविल सेवा में जाने का न सिर्फ क्रेज बढ़ा है, बल्कि चयनितों की सूची में इनका दबदबा है। अब तो यह स्थिति है कि मेधावी बीटेक की पढ़ाई इसलिए कर रहे हैं ताकि उन्हें सिविल सेवा के लिए एक विषय मिल जाए। इस प्रवृत्ति की वजह से देश को दोहरा नुकसान हो रहा है। इंजीनियर और डॉक्टर तैयार करने में एक तरफ जहां सरकार के लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं, वहीं पढ़ाई के बाद इनके आईएएस बन जाने से इन क्षेत्रों से होनहार भी छिन जा रहे हैं। इसे लेकर पूरी व्यवस्था में बदलाव को लेकर फिर बहस छिड़ी है।
देश में पूरा शक्ति प्रशासनिक अफसरों को दी गइ है। बड़े-बड़े बंगले, नीली बत्ती तथा अन्य सुविधाएं युवाओं को आकर्षित कर रही हैं। ऐसे में भ्रष्टाचार ने इन पदों के ग्लैमर को और बढ़ा दिया है। भ्रष्टाचार में लिप्त आईएएस अफसरों के घरों से करोड़ों रुपये मिलने की लगातार शिकायतें मिल रही हैं। विडंबना यह भी है कि किसी भी विभाग में शीर्ष पर बैठे इंजीनियर और डॉक्टर को भी एक आईएएस के निर्देशन में काम करना होता है। यह मांग लगातार की जाती रही है कि विभाग के सबसे अनुभवी को ही शीर्ष पर बिठाया जाए और आईएएस सहयोगी हों लेकिन ऐसा नहीं हो रहा।
इन वजहों से आईआईटीज, एम्स जैसे संस्थानों से निकले मेधावी भी आईएएस के आकर्षण को छोड़ नहीं पा रहे। मोतीलाल नेहरू मेडिकल कालेज के पूर्व प्राचार्य डॉ.पीसी सक्सेना का कहना है कि सिर्फ एमबीबीएस की पढ़ाई के बाद बहुत अच्छा कॅरियर नहीं है और आगे की पढ़ाई में बहुत समय जाता है। वहीं आईएएस के पास बहुत पॉवर है। मेडिकल के क्षेत्र में भी नीति आईएएस बनाएगा। ऐसी ही वजहों से इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई के बाद युवा सिविल सेवा को चुनते हैं। निश्चित रूप से इससे देश का काफी नुकसान है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के जेके इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर जेए अंसारी कहते हैं, यहां आईएएस सबसे अधिक पॉवरफुल है।
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प्रमोशन के अवसर भी अधिक हैं। सचिव, प्रमुख सचिव आदि बनेंगे। इसके अलावा इंजीनियरिंग और मेडिकल के क्षेत्र में काम का भी अधिक दबाव है। सो इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई के बाद भी युवा आईएएस बनना चाहते हैं। आईआईटीज तथा प्रतिष्ठित मेडिकल कालेजों में दाखिला पाने वाले मेधावी होते हैं। बीटेक के विद्यार्थियों को सिविल सेवा के लिए एक विषय भी मिल जाता है। इसलिए सिविल सेवा में सफल होने वालों में भी इनकी संख्या अधिक है। यह हर तरह से नुकसान है लेकिन किसी से अवसर नहीं छीना जा सकता। व्यवस्था में व्यापक बदलाव की जरूरत है।
इंजीनियर और डॉक्टर बनाने में सरकार लाखों रुपये खर्च करती है। आईआईटी में बीटेक की पढ़ाई कर रहे एक छात्र पर तकरीबन 24 लाख रुपये खर्च होते हैं। कमोवेश इतनी ही राशि अन्य इंजीनियरिंग कालेजों में खर्च होती है। आईआईटी, एनआईटी तथा अन्य सरकारी इंजीनियरिंग कालेजों में फीस चार से पांच लाख रुपये ली जाती है। एक इंजीनियर तैयार करने के लिए सरकार लाखों रुपये संस्थान को देती है। डॉ.पीसी सक्सेना कहते हैं, सिर्फ एमबीबीएस की पढ़ाई में 25 से 50 लाख रुपये तक खर्च होते हैं।
सिविल सेवा का पिछले पांच वर्षों का परिणाम देखें तो इंजीनियरिंग और मेडिकल बैकग्राउंड के अभ्यर्थी मेरिट लिस्ट के साथ पूरी सूची में छाए हुए हैं। इनमें भी बीटेक अभ्यर्थियों की संख्या अधिक है। अंग्रेजी बैकग्राउंड तथा इंजीनियरिंग के छात्रों के इस तरह से सफल होने को लेकर पूरे देश में शोर मचा। इसके बाद सिविल सेवा के परीक्षा प्रारूप में बदलाव की एक बार फिर पहल की गई है। इसके लिए कमेटी भी बनाई गई है जिसे अगस्त में रिपोर्ट देना है।
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देश में पूरा शक्ति प्रशासनिक अफसरों को दी गइ है। बड़े-बड़े बंगले, नीली बत्ती तथा अन्य सुविधाएं युवाओं को आकर्षित कर रही हैं। ऐसे में भ्रष्टाचार ने इन पदों के ग्लैमर को और बढ़ा दिया है। भ्रष्टाचार में लिप्त आईएएस अफसरों के घरों से करोड़ों रुपये मिलने की लगातार शिकायतें मिल रही हैं। विडंबना यह भी है कि किसी भी विभाग में शीर्ष पर बैठे इंजीनियर और डॉक्टर को भी एक आईएएस के निर्देशन में काम करना होता है। यह मांग लगातार की जाती रही है कि विभाग के सबसे अनुभवी को ही शीर्ष पर बिठाया जाए और आईएएस सहयोगी हों लेकिन ऐसा नहीं हो रहा।
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इन वजहों से आईआईटीज, एम्स जैसे संस्थानों से निकले मेधावी भी आईएएस के आकर्षण को छोड़ नहीं पा रहे। मोतीलाल नेहरू मेडिकल कालेज के पूर्व प्राचार्य डॉ.पीसी सक्सेना का कहना है कि सिर्फ एमबीबीएस की पढ़ाई के बाद बहुत अच्छा कॅरियर नहीं है और आगे की पढ़ाई में बहुत समय जाता है। वहीं आईएएस के पास बहुत पॉवर है। मेडिकल के क्षेत्र में भी नीति आईएएस बनाएगा। ऐसी ही वजहों से इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई के बाद युवा सिविल सेवा को चुनते हैं। निश्चित रूप से इससे देश का काफी नुकसान है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के जेके इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर जेए अंसारी कहते हैं, यहां आईएएस सबसे अधिक पॉवरफुल है।
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प्रमोशन के अवसर भी अधिक हैं। सचिव, प्रमुख सचिव आदि बनेंगे। इसके अलावा इंजीनियरिंग और मेडिकल के क्षेत्र में काम का भी अधिक दबाव है। सो इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई के बाद भी युवा आईएएस बनना चाहते हैं। आईआईटीज तथा प्रतिष्ठित मेडिकल कालेजों में दाखिला पाने वाले मेधावी होते हैं। बीटेक के विद्यार्थियों को सिविल सेवा के लिए एक विषय भी मिल जाता है। इसलिए सिविल सेवा में सफल होने वालों में भी इनकी संख्या अधिक है। यह हर तरह से नुकसान है लेकिन किसी से अवसर नहीं छीना जा सकता। व्यवस्था में व्यापक बदलाव की जरूरत है।
इंजीनियर और डॉक्टर बनाने में सरकार लाखों रुपये खर्च करती है। आईआईटी में बीटेक की पढ़ाई कर रहे एक छात्र पर तकरीबन 24 लाख रुपये खर्च होते हैं। कमोवेश इतनी ही राशि अन्य इंजीनियरिंग कालेजों में खर्च होती है। आईआईटी, एनआईटी तथा अन्य सरकारी इंजीनियरिंग कालेजों में फीस चार से पांच लाख रुपये ली जाती है। एक इंजीनियर तैयार करने के लिए सरकार लाखों रुपये संस्थान को देती है। डॉ.पीसी सक्सेना कहते हैं, सिर्फ एमबीबीएस की पढ़ाई में 25 से 50 लाख रुपये तक खर्च होते हैं।
सिविल सेवा का पिछले पांच वर्षों का परिणाम देखें तो इंजीनियरिंग और मेडिकल बैकग्राउंड के अभ्यर्थी मेरिट लिस्ट के साथ पूरी सूची में छाए हुए हैं। इनमें भी बीटेक अभ्यर्थियों की संख्या अधिक है। अंग्रेजी बैकग्राउंड तथा इंजीनियरिंग के छात्रों के इस तरह से सफल होने को लेकर पूरे देश में शोर मचा। इसके बाद सिविल सेवा के परीक्षा प्रारूप में बदलाव की एक बार फिर पहल की गई है। इसके लिए कमेटी भी बनाई गई है जिसे अगस्त में रिपोर्ट देना है।