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Exclusive: विदेशी परिधानों में रावण, खादी वस्त्रों में सजते थे राम
Mon, 12 Oct 2020 10:13 AM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Mon, 12 Oct 2020 10:13 AM IST
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रामलीला
- फोटो : अमर उजाला
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शहर की रामलीलाओं का स्वतंत्रता आंदोलन से गहरा नाता रहा है। तब पजावा, कटरा और दारागंज की रामलीलाओं की झांकियों में ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचार पर आधारित स्वांग रचाए जाते थे। एक से दूसरे मुहल्लों में जाने वाली आकर्षक चौकियों में राष्ट्रीय घटनाक्रमों पर आधारित जुल्म को प्रदर्शित किया जाता था। उस दौर में शहर की लीलाओं के दल में अत्याचार के प्रतीक रावण को ब्रिटिश सैनिक के शूट-बूट में और राम, लक्ष्मण, सीता की चौकियां खादी वस्त्रों में सजाए जाने का उल्लेख मिलता है।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जनजागरूकता पैदा करने के लिए चलायमान लीलाएं शुरू करने के प्रमाण मिलते हैं। रामलीलाओं केदल उन दिनों अंग्रेजी सरकार के खिलाफ जन जागरूकता पैदा करने और लोगों को वास्तविकता से परिचित कराने का माध्यम बनाए गए। प्रयागराज की नंदिनी गुप्तू ने अपनी पुस्तक ‘बीसवीं सदी की शुरुआत में शहरी गरीबों की राजनीति’ में इसका बखूबी उल्लेख किया है।
वह लिखती हैं कि तब राष्ट्रीयता पर आधारित झांकियां और हिंदू प्रतीकों को लाग-विमान के रूप में निकाला जाता था। उन्होंने उस दौर की रामलीलाओं के स्वांगों के स्वरूपों का विस्तार से वर्णन किया है। गुप्तू की पुस्तक के अनुसार तब चौकियों में भारत माता, महात्मा गांधी, शिवाजी और झांसी की रानी की बड़ी-बड़ी तस्वीरों वाली चौकियां सजाई जाती थीं।
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राम, लक्ष्मण और सीता को खादी वस्त्रों में और रावण को विदेशी परिधानों में दिखाया जाता था। रामलीलाओं के शोधकर्ता अमित मालवीय के अनुसार वर्ष 1920 में दारागंज के रामदल में महात्मा गांधी की चौकी निकाली गई थी। तब उस चौकी का संदेश था- वतन की खातिर शीश कटा दो...। इसी तरह 1920 में भारत माता की चौकी बनाकर निकाली गई थी। इसके अलावा दारागंज के भरत मिलाप के समय लीला के दौरान की राज मुकुट और वीर अभिमन्यु जैसे मंचन स्वतंत्रता आंदोलन की शौर्य प्रस्तुतियों केहिस्सा बनते थे।
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स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जनजागरूकता पैदा करने के लिए चलायमान लीलाएं शुरू करने के प्रमाण मिलते हैं। रामलीलाओं केदल उन दिनों अंग्रेजी सरकार के खिलाफ जन जागरूकता पैदा करने और लोगों को वास्तविकता से परिचित कराने का माध्यम बनाए गए। प्रयागराज की नंदिनी गुप्तू ने अपनी पुस्तक ‘बीसवीं सदी की शुरुआत में शहरी गरीबों की राजनीति’ में इसका बखूबी उल्लेख किया है।
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वह लिखती हैं कि तब राष्ट्रीयता पर आधारित झांकियां और हिंदू प्रतीकों को लाग-विमान के रूप में निकाला जाता था। उन्होंने उस दौर की रामलीलाओं के स्वांगों के स्वरूपों का विस्तार से वर्णन किया है। गुप्तू की पुस्तक के अनुसार तब चौकियों में भारत माता, महात्मा गांधी, शिवाजी और झांसी की रानी की बड़ी-बड़ी तस्वीरों वाली चौकियां सजाई जाती थीं।
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राम, लक्ष्मण और सीता को खादी वस्त्रों में और रावण को विदेशी परिधानों में दिखाया जाता था। रामलीलाओं के शोधकर्ता अमित मालवीय के अनुसार वर्ष 1920 में दारागंज के रामदल में महात्मा गांधी की चौकी निकाली गई थी। तब उस चौकी का संदेश था- वतन की खातिर शीश कटा दो...। इसी तरह 1920 में भारत माता की चौकी बनाकर निकाली गई थी। इसके अलावा दारागंज के भरत मिलाप के समय लीला के दौरान की राज मुकुट और वीर अभिमन्यु जैसे मंचन स्वतंत्रता आंदोलन की शौर्य प्रस्तुतियों केहिस्सा बनते थे।
- कटरा की रामलीला के दल में हमेशा राष्ट्रीय परिदृश्यों को दिखाया जाता रहा है। 1857 से पहले ही भरद्वाज आश्रम के पास रहने वाले संत बैजू गोस्वामी ने इस लीला का शुरुआत की थी। तब स्वतंत्रता आंदोलन पर आधारित ही स्वांग रचाए जाते थे। गोपाल बाबू जायसवाल-सचिव, कटरा रामलीला।
- प्रयागराज की रामलीलाओं में स्वतंत्रता आंदोलन के संघर्षों की गाथा हमेशा आकर्षण का केंद्र रही है। इसका उल्लेख कई पुस्तकों और राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित जर्नल में भी मिलता है। अमित मालवीय- रामलीला के शोधकर्ता।